चिकन नेक के पास ड्रैगन की नई घेरेबंदी: पाकिस्तान के बाद अब बांग्लादेश को J-10CE फाइटर जेट्स बेचेगा चीन, भारत के लिए बढ़ा खतरा

भारत की सीमाओं पर एक अत्यंत गंभीर और संवेदनशील भू-राजनीतिक खेल शुरू हो गया है। एक ओर जहां पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान अपनी नापाक साजिशों से बाज नहीं आ रहा, वहीं अब पूर्वी सीमा पर भी खतरे के बादल मंडराने लगे हैं। चीन यानी ड्रैगन अब सीधे तौर पर भारत की रणनीतिक घेरेबंदी करने की एक गहरी योजना पर काम कर रहा है। यह कोई साधारण कदम नहीं है, बल्कि इसका सीधा प्रभाव भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और विशेष रूप से हमारे सबसे संवेदनशील क्षेत्र, सिलीगुड़ी कॉरिडोर यानी ‘चिकन नेक’ पर पड़ने वाला है। ताजा रिपोर्ट्स के अनुसार, चीन अब पाकिस्तान के बाद अपने अत्याधुनिक फाइटर जेट्स भारत के पड़ोसी देश बांग्लादेश में तैनात करने की तैयारी में है। अपनी विस्तारवादी नीतियों के लिए कुख्यात चीन की नजरें अब बंगाल की खाड़ी और भारत की पूर्वी सीमाओं पर टिक गई हैं।

रक्षा और रणनीतिक जगत से आ रही यह खबर हर भारतीय को सतर्क कर देने वाली है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, बांग्लादेश और चीन के बीच इसी महीने J-10CE मल्टीरोल फाइटर जेट्स को लेकर एक बड़ा रक्षा समझौता होने की संभावना है। इस डील के तहत बांग्लादेश, चीन से कम से कम 24 J-10CE लड़ाकू विमान खरीदने की तैयारी कर रहा है। यह महज एक सैन्य सौदा नहीं है, जिसकी कीमत लगभग 2.2 अरब डॉलर आंकी जा रही है। असल में इस भारी-भरकम सौदे के जरिए चीन अगले एक दशक, यानी 2035-36 तक बांग्लादेश में अपना पूरा मिलिट्री इकोसिस्टम स्थापित करने की फिराक में है।

अब यह समझना आवश्यक है कि यह मिलिट्री इकोसिस्टम क्या है और इससे भारत को क्या खतरा है? जब कोई देश किसी दूसरे देश से फाइटर जेट खरीदता है, तो केवल विमान ही नहीं आते। उनके साथ रडार सिस्टम, मेंटेनेंस यूनिट्स, स्पेयर पार्ट्स, एयरबेस इंफ्रास्ट्रक्चर और एवियोनिक्स का पूरा सेटअप आता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि चीन के इंजीनियर्स, रडार ऑपरेटर्स और ट्रेनर्स अब बांग्लादेश के एयरबेस पर स्थायी रूप से मौजूद रहेंगे। इसका सीधा अर्थ है कि भारत की पूर्वी सीमा के बिल्कुल पास चीनी सैन्य विशेषज्ञों का जमावड़ा शुरू हो जाएगा, जो भारत के खिलाफ एक रणनीतिक घेरेबंदी है।

रक्षा विशेषज्ञों ने इस पर गहरी चिंता जताई है। उनका मानना है कि भारत के लिए असली चुनौती केवल ये 24 विमान नहीं हैं, क्योंकि भारतीय वायुसेना किसी भी हवाई खतरे से निपटने में विश्व स्तर पर सक्षम है। मुख्य चिंता बांग्लादेश की जमीन पर पनपने वाला वह चीनी सेटअप है, जिसे चीन भविष्य में अपने एक ‘फॉरवर्ड बेस’ के रूप में इस्तेमाल कर सकता है।

J-10CE फाइटर जेट की असलियत पर गौर करें तो चीन काफी समय से अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसे बेचने की कोशिश कर रहा है। जब से भारत के बेड़े में ‘राफेल’ शामिल हुआ है, चीन और पाकिस्तान दोनों की बेचैनी बढ़ गई है। राफेल एक ऐसा ‘गेम चेंजर’ प्लेटफॉर्म है जिसका मुकाबला करने में ये दोनों देश फिलहाल सक्षम नहीं हैं। इसी के जवाब में चीन ने यह नैरेटिव सेट करने की कोशिश की कि उसका J-10CE राफेल को टक्कर दे सकता है, लेकिन दुनिया का कोई भी समझदार देश चीन के इस प्रचार के झांसे में नहीं आया।

विगत वर्षों में भारत के सैन्य अभियानों और राफेल की बढ़ती धाक ने चीनी हथियारों के दावों की पोल खोल दी है। पाकिस्तान ने भी भारतीय राफेल के डर से ही J-10CE विमान खरीदे थे। हालांकि, राफेल की इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर क्षमता और उसकी मेटियोर मिसाइल की रेंज के सामने चीनी विमान कहीं नहीं टिकते। फिर भी, अपनी डिफेंस इंडस्ट्री को सहारा देने और भारत पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए चीन अब बांग्लादेश का उपयोग मोहरे के रूप में कर रहा है।

भारत के सैन्य रणनीतिकारों के लिए यह एक ‘टू-फ्रंट वॉर’ (दो मोर्चों पर युद्ध) जैसी स्थिति पैदा कर सकता है। यदि बांग्लादेश भी चीनी J-10CE को शामिल करता है, तो भारत को पश्चिम और पूर्व दोनों सीमाओं पर एक ही तरह के चीनी एवियोनिक्स, हथियार प्रणालियों और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम का सामना करना होगा। यह स्थिति युद्ध की स्थिति में भारतीय वायुसेना के लिए रणनीतिक दबाव बढ़ा सकती है।

सबसे क्रिटिकल पॉइंट ‘सिलीगुड़ी कॉरिडोर’ यानी चिकन नेक है। यह संकरा जमीनी रास्ता पूर्वोत्तर राज्यों को शेष भारत से जोड़ता है। चीन की हमेशा से मंशा रही है कि इस हिस्से पर नजर रखी जाए। बांग्लादेशी एयरबेस सिलीगुड़ी कॉरिडोर से काफी करीब हैं। यदि वहां चीनी फाइटर जेट्स और शक्तिशाली रडार तैनात होते हैं, तो वे हमारे एयरस्पेस में काफी अंदर तक निगरानी कर सकेंगे और विमानों की आवाजाही को ट्रैक करेंगे, जो भारत की संप्रभुता के लिए बड़ी चुनौती है।

इसके अतिरिक्त, चीन ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ रणनीति के तहत बंगाल की खाड़ी में अपना दबदबा बढ़ा रहा है। म्यांमार और श्रीलंका के बाद अब बांग्लादेश में चीन के बढ़ते सैन्य फुटप्रिंट भारत के लिए सिरदर्द हैं। बांग्लादेश में हालिया राजनीतिक अस्थिरता का फायदा उठाकर चीन उसे अपनी रक्षा प्रणालियों पर निर्भर बनाना चाहता है, ताकि भविष्य में उसकी कूटनीति को भी प्रभावित किया जा सके।

लेकिन भारत इस खतरे से अनभिज्ञ नहीं है। हमारी वायुसेना और सैन्य एजेंसियां J-10CE के रडार सिग्नेचर और चीन की डिप्लॉयमेंट रणनीति का सूक्ष्म अध्ययन कर रही हैं। हमारे पास राफेल जैसे घातक विमान हैं जो किसी भी चीनी चुनौती को आसमान में ही खत्म करने की क्षमता रखते हैं। साथ ही, स्वदेशी तेजस मार्क-1A और सुखोई-30 MKI का अपग्रेडेशन हमारी ताकत को और अधिक बढ़ा रहा है।

भारत अपने पूर्वी सेक्टर में एयर डिफेंस नेटवर्क को लगातार मजबूत कर रहा है। S-400 एयर डिफेंस सिस्टम की तैनाती और नए रडार नेटवर्क के जरिए आसमान की हर हरकत पर नजर रखी जा रही है। चीनी विमानों और तकनीक के बावजूद, भारतीय पायलटों का युद्ध कौशल और प्रशिक्षण उन्हें किसी भी परिस्थिति में श्रेष्ठ साबित करता है।

निष्कर्षतः, ड्रैगन चाहे जितनी भी कूटनीतिक चालें चल ले, आधुनिक भारत अपनी सुरक्षा को लेकर कोई समझौता नहीं करेगा। चीन की ये साजिशें हमें अपनी रणनीतियों को और भी अधिक आक्रामक और अभेद्य बनाने के लिए प्रेरित कर रही हैं। राष्ट्र की सुरक्षा सर्वोपरि है और हमारी सेनाएं हर चुनौती को विफल करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।

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