भारत-नेपाल सुस्ता सीमा विवाद: नारायणी नदी के तटबंध पर क्यों बढ़ा तनाव? जानें पूरी सच्चाई

भारत और नेपाल के संबंधों में एक बार फिर सुस्ता सीमा को लेकर कड़वाहट देखी जा रही है। नवलपरासी पश्चिम में नारायणी नदी के तट पर बनाए गए एक छोटे से मिट्टी के तटबंध ने दोनों देशों के बीच कूटनीतिक हलचल तेज कर दी है। काठमांडू से लेकर दिल्ली तक बैठकों का सिलसिला जारी है और आरोप-प्रत्यारोप का दौर फिर शुरू हो गया है। प्रश्न यह उठता है कि क्या यह महज बाढ़ नियंत्रण का एक प्रयास था या इसके पीछे कोई गहरी कूटनीतिक मंशा है? आइए, इस घटनाक्रम के सभी पहलुओं को गहराई से समझते हैं।

नारायणी नदी के प्रवाह के कारण सुस्ता का यह क्षेत्र लंबे समय से विवादित रहा है। हाल ही में नेपाली मीडिया ने रिपोर्ट दी कि भारतीय सुरक्षाकर्मी कथित तौर पर नेपाली क्षेत्र में आए और ग्रामीणों द्वारा निर्मित अस्थाई बांध को हटा दिया। इस खबर के बाद काठमांडू का राजनीतिक तापमान बढ़ गया और दिल्ली स्थित नेपाली दूतावास ने भारत के विदेश मंत्रालय के समक्ष औपचारिक विरोध दर्ज कराया है। नेपाली पक्ष का दावा है कि यह बांध मानसून में बस्तियों को बचाने का एकमात्र सहारा था।

वहीं, भारतीय पक्ष का दृष्टिकोण अलग है। भारत ने स्पष्ट किया है कि सुस्ता एक विवादित क्षेत्र है और 1988 के समझौते के अनुसार, यहाँ यथास्थिति (Status Quo) बनाए रखना अनिवार्य है। जब भी यहाँ किसी प्रकार के निर्माण की कोशिश होती है, तो सुरक्षा एजेंसियां सतर्क हो जाती हैं। भारत का रुख संयमपूर्ण रहा है और नई दिल्ली ने संदेश दिया है कि स्थानीय मुद्दों को द्विपक्षीय संबंधों के बीच में लाकर राष्ट्रीय एजेंडा नहीं बनाया जाना चाहिए।

सुस्ता की भौगोलिक स्थिति को देखें तो नारायणी नदी के बदलते मार्ग ने सीमांकन और ज़मीन के मालिकाना हक को जटिल बना दिया है। ‘सुस्ता बचाओ अभियान’ के कार्यकर्ताओं का कहना है कि नदी के कटाव से हर साल भारी नुकसान होता है। नेपाल का तर्क है कि स्थायी सुरक्षा दीवार न होने के कारण ग्रामीण स्वयं सुरक्षा के इंतजाम करने को मजबूर हैं। हालांकि, बॉर्डर प्रोटोकॉल और अंतरराष्ट्रीय समझौतों का उल्लंघन होने पर सुरक्षा बल हस्तक्षेप करने के लिए प्रतिबद्ध होते हैं।

भारत और नेपाल के बीच सुस्ता और कालापानी जैसे मुद्दे दशकों पुराने हैं। 2014 में इन मसलों को सुलझाने के लिए बाउंड्री वर्किंग ग्रुप के गठन पर सहमति बनी थी, लेकिन पिछले दस वर्षों में कोई निर्णायक बैठक नहीं हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक दोनों देश मेज पर बैठकर इन सीमा विवादों का कोई ठोस और स्थायी समाधान नहीं निकालते, तब तक ज़मीनी स्तर पर ऐसी छिटपुट झड़पें होती रहेंगी।

वर्तमान में सुस्ता क्षेत्र में भारतीय सीमा सुरक्षा बल (SSB) और नेपाल की सशस्त्र पुलिस बल के बीच समन्वय से स्थिति शांत है। स्थानीय अधिकारियों ने मामले को शांत कर लिया है, लेकिन कूटनीतिक स्तर पर सुलग रही यह चिंगारी हमें सचेत करती है। एक तरफ स्थानीय लोगों की परेशानियां हैं और दूसरी तरफ राष्ट्रीय संप्रभुता का सवाल। अब देखना होगा कि काठमांडू और नई दिल्ली इस विवाद को सुलझाने के लिए भविष्य में क्या कदम उठाते हैं।

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