प्रोजेक्ट 77: भारतीय नौसेना का वो सीक्रेट हथियार जो समंदर में चीन का काल बनेगा

विशाखापत्तनम के एक गुप्त डॉकयार्ड में एक ऐसा शक्तिशाली प्रोजेक्ट आकार ले रहा है, जिसने बीजिंग और इस्लामाबाद की नींद उड़ा दी है। यह है 10,000 टन वजनी एक स्टील का दानव, जिसकी ताकत को दुनिया की महाशक्तियां भी अपने जासूसी उपग्रहों से भांपने की कोशिश कर रही हैं। पर्दे के पीछे तैयार हो रहा यह महाविनाशक कोई और नहीं, बल्कि 24 ब्रह्मोस और निर्भय मिसाइलों से लैस भारत की नई न्यूक्लियर सबमरीन है। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि प्रोजेक्ट 77 की सिर्फ एक पनडुब्बी, सतह पर आए बिना, 1500 किमी दूर बैठे दुश्मन के नौसैनिक अड्डे को मिनटों में मलबे के ढेर में बदल सकती है? यह भारतीय नौसेना का वो घातक ब्लूप्रिंट है, जिसे अब तक बेहद गोपनीय रखा गया था।

BARC के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा 190 MW का ‘न्यूक्लियर हार्ट’ विकसित किया है, जो इस पनडुब्बी को अगले 30 सालों तक बिना रुके समंदर की गहराइयों में राज करने की शक्ति देगा। क्या दुनिया को भारत की इस गुप्त तकनीक का अंदाजा है? प्रोजेक्ट 77 केवल एक पनडुब्बी नहीं, बल्कि एक ‘मदर शिप’ है, जिसके भीतर से ‘जलकपि’ नामक अंडरवाटर ड्रोन निकलकर दुश्मन की पनडुब्बियों का शिकार करेगा। 1.2 लाख करोड़ रुपये के निवेश के साथ यह भारत का सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण रक्षा प्रोजेक्ट है। आखिर क्यों सरकार ने प्रोजेक्ट 75 अल्फा को प्रोजेक्ट 77 में बदलकर इसकी मारक क्षमता को दोगुना कर दिया? आइए जानते हैं भारत के इस नए ब्रह्मास्त्र की पूरी कहानी।

आज के बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य में, विशेष रूप से हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में, समुद्री प्रभुत्व किसी भी देश के लिए सुपरपावर बनने की अनिवार्य शर्त है। साल 2026 के वर्तमान दौर में, जब चीन की नौसेना (PLAN) लगातार घुसपैठ कर रही है और जिबूती से लेकर ग्वादर तक अपने ठिकाने बना रही है, तब भारत का प्रोजेक्ट 77 एक रणनीतिक गेम-चेंजर के रूप में उभरा है। यह भारत को वैश्विक नौसैनिक शक्ति बनाने का सबसे बड़ा महाअभियान है।

प्रोजेक्ट 77, जिसे पहले प्रोजेक्ट 75 अल्फा कहा जाता था, भारतीय नौसेना के लिए स्वदेशी रूप से विकसित की जा रही SSN (न्यूक्लियर-पावर्ड अटैक सबमरीन) का कार्यक्रम है। इसके तहत 6 घातक और साइलेंट न्यूक्लियर अटैक पनडुब्बियां बनाई जा रही हैं। इस निर्णय ने नौसेना की रणनीति को ‘डिफेंसिव’ से बदलकर ‘एग्रेसिव’ कर दिया है। अब भारत केवल अपनी सीमाओं की रक्षा नहीं करेगा, बल्कि दुश्मन के घर में घुसकर खतरे को उसके जन्मस्थान पर ही खत्म करने की क्षमता रखेगा।

शुरुआत में प्रोजेक्ट 75 अल्फा के तहत 6000 टन की पनडुब्बियों की योजना थी। लेकिन चीन की बढ़ती ताकत को देखते हुए, नौसेना ने अपनी आवश्यकताओं को दोबारा परिभाषित किया और प्रोजेक्ट 77 के तहत इसे 10,000 टन का विशाल रूप दिया। अब यह आकार और शक्ति में अमेरिकी ‘वर्जीनिया क्लास’ और रूसी ‘यासेन क्लास’ पनडुब्बियों को टक्कर देने के लिए तैयार है।

पारंपरिक डीजल-इलेक्ट्रिक (SSK) पनडुब्बियों को बैटरी चार्ज करने के लिए बार-बार सतह पर आना पड़ता है, जिससे वे दुश्मन के रडार की पकड़ में आ सकती हैं। इसके विपरीत, प्रोजेक्ट 77 की SSN पनडुब्बी परमाणु ऊर्जा से चलती है, जिससे यह महीनों तक बिना सतह पर आए 25-30 नॉट्स की गति से गश्त कर सकती है। यह मलक्का स्ट्रेट से लेकर अदन की खाड़ी तक भारत की अदृश्य ढाल बनेगी।

प्रोजेक्ट 77 का सबसे बड़ा रहस्य इसका 190 MW का कॉम्पैक्ट लाइट वाटर रिएक्टर है। अरिहंत क्लास के 83 MW रिएक्टर के मुकाबले यह दोगुने से भी अधिक शक्तिशाली है। 45 प्रतिशत हाईली एनरिच्ड यूरेनियम (HEU) के उपयोग के कारण इसे 30 साल के पूरे सेवाकाल में कभी भी रिफ्यूलिंग की आवश्यकता नहीं होगी।

शोर को कम करने के लिए इसमें पारंपरिक प्रोपेलर की जगह स्वदेशी ‘पंप-जेट प्रोपल्शन’ तकनीक का उपयोग किया जा रहा है। यह तकनीक पनडुब्बी के शोर को 100 डेसिबल से भी कम कर देती है, जिससे यह समंदर की लहरों के बीच दुश्मन के सोनार के लिए पूरी तरह अदृश्य हो जाती है।

गहरे समुद्र के भीषण दबाव को झेलने के लिए डीआरडीओ और मिधानी ने विशेष ‘HY-130’ और ‘DMR 249A’ ग्रेड स्टील का विकास किया है। यह पनडुब्बी को 400 मीटर से अधिक की गहराई तक गोता लगाने में सक्षम बनाता है, जहाँ इसे ढूंढना लगभग नामुमकिन है।

इस पनडुब्बी में अत्याधुनिक सोनार सिस्टम लगाए गए हैं, जिनमें फ्लैंक ऐरे और टोड ऐरे सोनार शामिल हैं। टोड ऐरे सोनार एक लंबी केबल पर बंधे सेंसर होते हैं जो पनडुब्बी के पीछे चलते हैं, ताकि पीछे से आने वाले किसी भी छिपे हुए खतरे का पता लगाया जा सके।

मारक क्षमता की बात करें तो इसके मध्य भाग में 24 वर्टिकल लॉन्च सिस्टम (VLS) ट्यूब्स हैं। इसका मुख्य हथियार ब्रह्मोस-ER (Extended Range) होगा, जो 800 किलोमीटर तक मार कर सकता है। मैक 3 की गति के कारण दुश्मन का एयर डिफेंस इसके सामने बेअसर साबित होगा।

जमीनी लक्ष्यों के लिए इसमें 1500 किमी रेंज वाली LR-LACM क्रूज मिसाइल होगी। भविष्य में यह हाइपरसोनिक ब्रह्मोस-2 को भी दागने में सक्षम होगी। साथ ही, वरुणास्त्र जैसे भारी वजन वाले टॉरपीडो इसे समुद्र का बेताज बादशाह बनाते हैं।

प्रोजेक्ट 77 के साथ डीआरडीओ का ‘जलकपि XLUUV’ ड्रोन भी तैनात होगा। यह 20 टन का ऑटोनॉमस ड्रोन पनडुब्बी से निकलकर दुश्मन के इलाके में रेकी करेगा और माइंस बिछाने या उन्हें नष्ट करने का काम करेगा। यह तकनीक युद्ध के मैदान को पूरी तरह बदल देगी।

यह प्रोजेक्ट विशाखापत्तनम के शिप बिल्डिंग सेंटर में ‘मेक इन इंडिया’ के तहत विकसित हो रहा है। L&T, मझगांव डॉक, और BHEL जैसी कंपनियां मिलकर इसमें 90 प्रतिशत तक स्वदेशी उपकरणों का उपयोग कर रही हैं।

अक्टूबर 2024 में सरकार ने शुरुआती 2 पनडुब्बियों के लिए 40,000 करोड़ रुपये को मंजूरी दी थी। 2026 तक निर्माण कार्य तेज हो जाएगा और 2035 तक ये भारतीय नौसेना में शामिल होकर देश की समुद्री सुरक्षा को अभेद्य बना देंगी।

आज वाशिंगटन के थिंक टैंक्स भी प्रोजेक्ट 77 की सराहना कर रहे हैं। हालांकि अमेरिका ने तकनीकी हस्तांतरण में हिचकिचाहट दिखाई, लेकिन भारत ने अपनी स्वदेशी क्षमता से यह सिद्ध कर दिया है कि वह समंदर का नया बॉस बनने के लिए तैयार है। यह अजेय ब्रह्मास्त्र भविष्य के किसी भी युद्ध में दुश्मन के अस्तित्व को मिटाने की शक्ति रखता है।

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