रामगंजमंडी/नीमच: भारत के औषधीय बाजार और कृषि क्षेत्र में एक क्रांतिकारी नीतिगत बदलाव का गहरा प्रभाव दिखाई दे रहा है। आयुर्वेद का आधार माने जाने वाले अश्वगंधा की खेती करने वाले किसानों की माली हालत में जबरदस्त सुधार हुआ है। इस सकारात्मक बदलाव की मुख्य वजह कोई मौसम या कर्ज माफी नहीं, बल्कि आयुष मंत्रालय और भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) का वह सख्त निर्णय है, जिसने अश्वगंधा की पत्तियों के व्यावसायिक उपयोग पर पाबंदी लगा दी है। इस फैसले ने न केवल मिलावटखोरी के सिंडिकेट को ध्वस्त कर दिया है, बल्कि किसानों को उनकी मेहनत का वास्तविक और लाभकारी मूल्य दिलाने का मार्ग भी प्रशस्त किया है।
आयुर्वेदिक पद्धति में केवल अश्वगंधा की जड़ों को ही औषधीय रूप से प्रभावी माना गया है। इसके बावजूद, पिछले कुछ समय से मुनाफाखोरी के चक्कर में कंपनियां पत्तियों का धड़ल्ले से इस्तेमाल कर रही थीं। नीमच और रामगंजमंडी जैसी प्रमुख मंडियों के 2025-26 के आंकड़े बताते हैं कि जहां जड़ों का भाव 23,000 रुपये प्रति क्विंटल था, वहीं पत्तियां मात्र 650 रुपये प्रति क्विंटल में उपलब्ध थीं। इसी भारी अंतर का लाभ उठाकर कई दवा निर्माता महंगी जड़ों के स्थान पर सस्ती पत्तियों की मिलावट कर रहे थे। यह न केवल किसानों के साथ आर्थिक अन्याय था, बल्कि आम जनता की सेहत के साथ भी खिलवाड़ था, क्योंकि शोध में पत्तियों के सेवन को स्वास्थ्य के लिए असुरक्षित पाया गया है।

बाजार की इस गड़बड़ी और स्वास्थ्य जोखिमों को देखते हुए सरकार ने इसी साल अप्रैल में ऐतिहासिक कदम उठाए। 15 अप्रैल को आयुष मंत्रालय ने दवाओं में केवल जड़ों के उपयोग को अनिवार्य कर दिया, वहीं 16 अप्रैल को FSSAI ने फूड सप्लीमेंट्स में पत्तियों के उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया। इस दोहरे प्रहार ने बाजार से सस्ता और मिलावटी विकल्प रातों-रात खत्म कर दिया। अब नीमच और रामगंज जैसी मंडियों में निर्यातकों और बड़ी कंपनियों के बीच शुद्ध सफेद जड़ों को खरीदने की होड़ मची है। मांग इतनी अधिक है कि किसानों की उपज हाथों-हाथ बिक रही है।

किसानों के अनुसार, जो जड़ें पहले 250 से 350 रुपये प्रति किलो बिकती थीं, अब उनका भाव 400 रुपये के पार पहुंच गया है। इससे किसानों को प्रति एकड़ लगभग 30,000 से 35,000 रुपये की अतिरिक्त आय हो रही है। इस नीतिगत निर्णय ने खेती के तरीके को भी बेहतर बनाया है। पहले पत्तियों के लालच में अधिक सिंचाई से जड़ें खराब हो जाती थीं, लेकिन अब किसान केवल गुणवत्तापूर्ण जड़ों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। इससे जड़ों का वजन और औषधीय गुण दोनों बढ़े हैं। साथ ही, अब किसान खुद जड़ों की ग्रेडिंग कर रहे हैं, जिससे उन्हें मंडी में प्रीमियम दाम मिल रहे हैं।

अश्वगंधा अब सीमांत किसानों के लिए एक भरोसेमंद नकदी फसल बन चुकी है। अमेरिका और यूरोप में भारतीय अश्वगंधा की बढ़ती मांग के बीच इस गुणवत्ता सुधार से वैश्विक बाजार में भारत की साख और मजबूत होगी। स्थानीय किसानों का कहना है, “सालों से मिलावटी पत्तियों ने हमारी असली मेहनत को दबा रखा था। सरकार के इस फैसले से ‘पत्ती गई और प्रगति आई’ है। आज किसान गर्व के साथ शुद्ध अश्वगंधा उगा रहा है और उसे उसका सही हक मिल रहा है।”

अश्वगंधा बाजार में आया यह बदलाव इस बात का प्रमाण है कि सही नीतियां सीधे किसानों की समृद्धि और उपभोक्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करती हैं। इस फैसले ने साबित कर दिया है कि जब सिस्टम की कमियों पर प्रहार होता है, तो उसका लाभ सीधे देश के अन्नदाता को मिलता है।

