दिसंबर के महीने में शेख हसीना की वतन वापसी की तारीख तय होना और ठीक उसी वक्त बांग्लादेश की 500 से ज्यादा गारमेंट फैक्ट्रियों का जलकर राख हो जाना, क्या यह सिर्फ मजदूरों का आक्रोश है या दिल्ली के किसी सेफ हाउस से लिखी गई बांग्लादेश में नई बगावत की शुरुआत है? ढाका के गृह मंत्री का कैमरे के सामने आकर कांपती आवाज में बॉर्डर पार का नाम लेना, क्या अपनी प्रशासनिक नाकामी छुपाने की कोशिश है या फिर सत्ता की कुर्सी को सेना के बूटों की आहट सुनाई दे चुकी है? क्या 12500 टके की भूख अचानक 10 लाख मजदूरों के हाथ में पत्थर बन गई, या फिर सड़कों पर उतरी इस उग्र भीड़ के पीछे अवामी लीग के वही अरबपति खड़े हैं जिनके बैंक खाते कल तक सीज पड़े थे? क्या भारत से पंगा लेकर इंडिया आउट का शोर मचाने वाले तारिक रहमान को भारत ने बिना एक भी गोली चलाए, सिर्फ प्याज, बिजली और डॉलर की नब्ज दबाकर वेंटिलेटर पर धकेल दिया है?
ढाका के आसमान में जलते सपनों का धुआं
ढाका के उत्तर में बसे गाजीपुर, सावर और अशुलिया के आसमान में फैला काला धुआं केवल जलते हुए टायरों का नहीं है। यह दक्षिण एशिया की सबसे तेज भागती रही अर्थव्यवस्था के जलते हुए सपनों का मंजर है। बांग्लादेश की इकॉनमी की रीढ़ माना जाने वाला रेडीमेड गारमेंट्स सेक्टर, जो पूरे देश की कुल एक्सपोर्ट कमाई का 80 परसेंट से ज्यादा हिस्सा अकेले संभालता है, आज 1971 के बाद के सबसे भयानक संकट में फंसा हुआ है। 500 से ज्यादा मॉडर्न गारमेंट फैक्ट्रियों के मुख्य दरवाजों पर भारी ताले लटके हैं। लाठियों और पत्थरों से लैस 10 लाख से ज्यादा मजदूर सड़कों पर उतर चुके हैं। पुलिस चौकियों को फूंका जा रहा है और बख्तरबंद गाड़ियां लेकर बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश के जवान गश्त कर रहे हैं। अगस्त 2024 के तख्तापलट के बाद बना अंतरिम ढांचा और फिर लंदन से रिमोट कंट्रोल के जरिए उभरी तारिक रहमान की सत्ता अब उस दलदल में समा रही है, जहां से निकलने का कोई रास्ता नजर नहीं आता।
इस पूरे बवाल की शुरुआत गाजीपुर और अशुलिया के इंडस्ट्रियल बेल्ट से हुई, जहां कई दिनों से जारी हिंसक झड़पों ने पूरे ढाका संभाग का चक्का जाम कर दिया है। यह गुस्सा अचानक नहीं भड़का। न्यूनतम वेतन की बातचीत टूटने के बाद पुलिसिया सख्ती ने आग में घी का काम किया। एक 10 साल के मासूम बच्चे की पुलिस गोलीबारी में मौत की खबर ने बारूद के ढेर पर चिंगारी लगा दी। गाजीपुर और मयमनसिंह क्लस्टर में हालात इतने बेकाबू हो गए कि 276 बड़ी और मध्यम फैक्ट्रियों में अनिश्चितकालीन ताला लगाना पड़ा। जारा, एच एंड एम और गैप जैसे ग्लोबल ब्रांड्स के कपड़ों की सिलाई के शोर से गूंजने वाली 185 फैक्ट्रियां आज वीरान पड़ी हैं। जब लोकल पुलिस के पैर उखड़ गए, तो सरकार को दंगा-रोधी गियर के साथ पैरामिलिट्री फोर्स को मैदान में उतारना पड़ा। वाटर कैनन और आंसू गैस के गोले दागे जा रहे हैं, लेकिन भूखे और गुस्से से भरे मजदूर पीछे हटने का नाम नहीं ले रहे हैं।
12500 टके की भूख और महंगाई का टॉर्चर
इस भयंकर बगावत के पीछे जीने लायक न्यूनतम मजदूरी का वो गणित है, जिसने पूरे देश को जला दिया है। मौजूदा समय में मजदूरों को सिर्फ 12500 टका मिल रहा है, जिसकी वैल्यू डॉलर के मुकाबले सिर्फ 105 डॉलर रह गई है। मजदूरों की सीधी मांग 30 हजार टका महीना करने की है। पिछले दो सालों में चावल, दाल, कुकिंग ऑयल और गैस सिलेंडर के दामों में 60 से 90 परसेंट तक की भारी बढ़ोतरी हो चुकी है। इस तनख्वाह में चार लोगों के परिवार का 15 दिन का खाना जुटाना भी नामुमकिन है। फैक्ट्री मालिकों ने साफ चेतावनी दे दी है कि अगर हिंसा नहीं रुकी, तो वे नो वर्क नो पे के तहत पूरे देश की फैक्ट्रियों में अनिश्चितकालीन कामबंदी लागू कर देंगे।
यह केवल कानून और व्यवस्था का फेलियर नहीं है। बांग्लादेश बीते 40 साल की सबसे भयानक आर्थिक मंदी के चंगुल में फंस चुका है। आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक के आंकड़ों के मुताबिक, बांग्लादेश की जीडीपी ग्रोथ गिरकर महज 2.2 से 3.4 परसेंट के बीच सिमट चुकी है। साल 2021 में जो विदेशी मुद्रा भंडार लगभग 48 अरब डॉलर के पीक पर था, वह आज घटकर 18 अरब डॉलर के क्रिटिकल लेवल पर आ गया है। विदेशी मुद्रा की भारी किल्लत के चलते जरूरी दवाओं और पेट्रोलियम के आयात पर प्रतिबंध लगा दिए गए हैं। एलएनजी और कोयले का आयात रुकने से इंडस्ट्रियल इलाकों में 10 से 14 घंटे की पावर कट हो रही है। विदेशी खरीदार तेजी से अपने ऑर्डर बांग्लादेश से समेट रहे हैं। वियतनाम को भारी मात्रा में ऑर्डर्स ट्रांसफर हो चुके हैं। और इसका सबसे बड़ा फायदा भारत के टेक्सटाइल हब्स जैसे तिरुपुर, नोएडा और सूरत को मिल रहा है, जहां बीते चार महीनों में गारमेंट ऑर्डर्स में 25 परसेंट तक की शानदार बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
अवामी लीग का सिंडिकेट और अंदरूनी खूनी खेल
जब देश के भीतर नीतियां फेल होने लगती हैं, तो सत्ता में बैठे लोग हमेशा बाहरी दुश्मन का हौव्वा खड़ा करते हैं। ढाका के हुक्मरान आरोप लगा रहे हैं कि यह सारी आगजनी सीमा पार बैठे लोगों की साजिश है। लेकिन असली सच्चाई कुछ और ही है। बांग्लादेश के गारमेंट सेक्टर की 40 परसेंट बड़ी फैक्ट्रियों के मालिक या तो अवामी लीग के पूर्व नेता रहे हैं या उनके करीबी उद्योगपति। नई सरकार ने जब इनके बैंक अकाउंट्स फ्रीज किए, तो फैक्ट्रियों में वेतन बांटने में देरी होने लगी। दूसरी तरफ नई सत्ता समर्थित लोकल गुंडों और सिंडिकेट्स ने इन फैक्ट्रियों के झूट यानी वेस्ट कपड़े के स्क्रैप बिजनेस पर जबरन कब्जा करने के लिए तोड़फोड़ शुरू करवा दी। यह सिर्फ मजदूरों का दर्द नहीं, बल्कि पुराने और नए सिंडिकेट के बीच अरबों टके के अवैध कारोबार पर खूनी कब्जे की जंग है।
इंडिया आउट का नारा बना गले की फांस
लंदन के पॉश इलाके से रिमोट कंट्रोल सरकार चलाने वाले तारिक रहमान की विदेश नीति बुरी तरह औंधे मुंह गिर चुकी है। सत्ता में आने से पहले उन्होंने इंडिया आउट का नारा देकर तालियां तो बटोरीं, लेकिन सरकार में आते ही यह नारा उनके गले की फांस बन गया। बांग्लादेश अपनी रोजमर्रा की जरूरतों जैसे प्याज, चीनी, गेहूं और दाल के लिए पूरी तरह भारत पर निर्भर है। जैसे ही भारत से सप्लाई चेन सुस्त हुई, ढाका के बाजारों में त्राहि-त्राहि मच गई। बिजली के मोर्चे पर भारत से मिलने वाली 2000 मेगावाट बिजली का भारी बिल जब बांग्लादेश नहीं चुका पाया, तो ब्लैकआउट का खतरा सिर पर मंडराने लगा। भारत से दूरी बनाकर ढाका बीजिंग की गोद में जा बैठा, लेकिन चीन बिना मुनाफे के फूटी कौड़ी नहीं देता। चीन ने सामरिक संपत्तियों पर संप्रभु नियंत्रण की ऐसी कड़ी शर्तें थोप दीं कि हुक्मरानों के हाथ-पांव फूल गए।
शेख हसीना का मास्टरस्ट्रोक और सेना की खामोशी
इस पूरे ड्रामे के केंद्र में पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना हैं, जिन्होंने दिसंबर के महीने में वतन लौटने का खुला ऐलान कर रखा है। 16 दिसंबर 1971 का दिन बांग्लादेश का मुक्ति दिवस है। शेख हसीना इसी ऐतिहासिक तारीख के भावनात्मक ज्वार पर सवार होकर मौजूदा हुकूमत को घेरने की तैयारी में हैं। ढाका के हुक्मरानों की नींद उड़ी हुई है कि अगर शेख हसीना एयरपोर्ट पर उतरती हैं, तो वे क्या करेंगे। गिरफ्तार किया तो लाखों कार्यकर्ता ढाका को बंधक बना लेंगे, और छोड़ दिया तो सरकार का इकबाल उसी पल खत्म हो जाएगा।
नई दिल्ली का कूटनीतिक दिमाग इस पूरे खेल को बहुत पहले भांप चुका था। भारत के नेतृत्व ने एक बेहद सोची-समझी रणनीतिक चुप्पी अपनाई। दिल्ली को कोई सेना भेजने की जरूरत नहीं पड़ी, सिर्फ ट्रेड, एनर्जी और डिप्लोमैटिक दबाव के जरिए ढाका की नब्ज पर ऐसा कसाव लाया कि अंतरिम व्यवस्था खुद ब खुद घुटनों पर आ गई। आज ढाका दुनिया भर की खुफिया एजेंसियों का नया अखाड़ा बन चुका है। भारत की रॉ, पाकिस्तान की आईएसआई, चीन की एमएसएस और अमेरिका की सीआईए वहां अपने-अपने मोहरे सेट कर रही हैं।
इस तबाही के बीच ढाका कैंटोनमेंट के भीतर जनरल वकार-उज-जमान की रहस्यमयी खामोशी सबसे बड़ा सवाल है। सेना की तोपें और टैंक बैरकों के भीतर इसलिए चुप हैं क्योंकि एक प्रोफेशनल फौज अपने ही देश के भूखे मजदूरों पर सीधे गोलियां नहीं चला सकती। बांग्लादेशी सेना के लिए यूएन पीसकीपिंग मिशन्स से मिलने वाला विदेशी फंड और ग्लोबल रेपुटेशन सबसे बड़ी दौलत है। ह्यूमन राइट्स का उल्लंघन हुआ तो इंटरनेशनल बैन लग जाएंगे। इसलिए ढाका के सत्ता गलियारों में फुसफुसाहट तेज है कि सेना 2007 की तर्ज पर किसी टेक्नोक्रेट सरकार को आगे लाकर सत्ता की बागडोर अपने हाथ में लेने की फुलप्रूफ तैयारी कर रही है।





