चीन की दुखती रग पर भारत का प्रहार, डोभाल के वियतनाम प्लान से बीजिंग में मचा हड़कंप

चीन की दुखती रग पर भारत का प्रहार, डोभाल के वियतनाम प्लान से बीजिंग में मचा हड़कंप

अरुणाचल प्रदेश की बर्फीली चोटियों पर जब पीएलए की तोपों की हलचल अचानक तेज हो रही थी, ठीक उसी रात भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की मौजूदगी हनोई के सीक्रेट कमरों में दर्ज होती है। बंद दरवाजों के पीछे एक ऐसा रणनीतिक खाका खिंच रहा था, जिसने बीजिंग के सुरक्षा गलियारों में अचानक रेड अलर्ट बजा दिया। तवांग, यांग्त्से और असाफिला के मोर्चे पर जब चीन अपनी आक्रामकता दिखा रहा था, उसे लगा कि भारत अपनी उत्तरी सीमाओं को बचाने में ही उलझा रहेगा। लेकिन नई दिल्ली ने चाल ऐसी चली जिसने चीन के पूरे डिफेंस नेटवर्क को हिलाकर रख दिया। भारत सीधे उस इलाके में जा पहुंचा, जिसे चीन अपना निजी तालाब समझता है।

हनोई के राष्ट्रपति भवन और पब्लिक सिक्योरिटी मिनिस्ट्री के भीतर 1 और 2 नवंबर को घंटों तक जो गोपनीय बैठकें चलीं, वो कोई आम डिप्लोमैटिक फॉर्मेलिटी नहीं थीं। अजीत डोभाल ने वियतनाम के सुप्रीम लीडर तो लाम और पब्लिक सिक्योरिटी मिनिस्टर के साथ जो दस्तावेज साइन किए हैं, वे रियल-टाइम स्ट्रैटेजिक इंटेलिजेंस शेयरिंग से जुड़े हैं। वियतनाम का पब्लिक सिक्योरिटी मंत्रालय देश की पूरी खुफिया मशीनरी चलाता है। इनके साथ भारत का एनक्रिप्टेड डेटा लिंक जुड़ने का सीधा मतलब यह है कि समंदर, जमीन और हवा में चीन की हर हरकत अब पलक झपकते ही दोनों देशों के वॉर रूम की स्क्रीन पर फ्लैश होगी।

दक्षिण चीन सागर और मलक्का डिलेमा का खौफ युद्ध नीति का सबसे बड़ा उसूल है—जब दुश्मन सामने से घेरे, तो उसके सबसे नाजुक हिस्से पर स्ट्राइक करो। चीन हमेशा भारत को टू-फ्रंट वॉर (Two-front War) की धमकी देता रहा है। लेकिन आज भारत ने बीजिंग के सामने वही टू-फ्रंट वॉर की दुविधा खड़ी कर दी है। चीन का 80% क्रूड ऑयल और समंदर का व्यापार इसी साउथ चाइना सी से होकर गुजरता है। इसे चीन के पूर्व राष्ट्रपति हू जिंताओ ने 2003 में ‘मलक्का डिलेमा’ कहा था।

इस इलाके का भूगोल बहुत दिलचस्प है। मलक्का स्ट्रेट के वेस्टर्न पॉइंट पर भारत का अंडमान-निकोबार एक अभेद्य दीवार की तरह खड़ा है। वहीं मलक्का के ठीक बाहर, साउथ चाइना सी के किनारे पर वियतनाम एक ऐसे ‘अनसिंकेबल एयरक्राफ्ट कैरियर’ की तरह तैनात है, जो चीन की आंखों में चुभता है। अगर हिमालय में तनाव बढ़ा, तो समंदर में चीन की एनर्जी सप्लाई लाइन सीधे निशाने पर आ जाएगी। भारत ने अब डिफेंसिव मोड छोड़ दिया है, और यह ‘एक्टिव डिटरेंस’ का नया युग है।

स्पेस इंटेलिजेंस: अंतरिक्ष से समंदर पर नजर डील की सबसे बड़ी धुरी वो राज है जिसे चीन दुनिया से छुपाना चाहता है। चीन साउथ चाइना सी में कभी सामने से जंग नहीं लड़ता, वो ‘ग्रे-जोन वारफेयर’ (Gray-zone Warfare) खेलता है। चीनी युद्धपोत आगे नहीं आते, बल्कि उनकी जगह मैरीटाइम मिलिशिया और कोस्ट गार्ड के विशाल जहाज वियतनाम के समंदर में घुसपैठ करते हैं। ये जहाज अपना AIS (ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम) बंद कर देते हैं। रडार से गायब हो चुके इन जहाजों को डार्क वेसल्स (Dark Vessels) कहते हैं।

वियतनाम के पास विशाल सैटेलाइट नेटवर्क नहीं है, और यहीं एंट्री होती है भारत की स्पेस पावर की। ISRO के पास अंतरिक्ष में Cartosat, RISAT और EMISAT जैसे खतरनाक सैटेलाइट्स का नेटवर्क है। इनमें सिंथेटिक अपर्चर रडार (SAR) लगा है। इसका मतलब है कि घने बादलों, भारी बारिश और रात के घुप अंधेरे में भी, समंदर की सतह पर तैरती एक छोटी नाव भी इस रडार से बच नहीं सकती। भारतीय नौसेना के GSAT रुक्मिणी सैटेलाइट्स समंदर की हर लहर पर नजर रखते हैं। वियतनाम इसी लाइव फीड को एक्सेस कर रहा है। हैनान द्वीप से चीन की Type 094 जिन-क्लास न्यूक्लियर सबमरीन पानी में उतरे या कोई डिस्ट्रॉयर रवाना हो, उसकी लोकेशन और स्पीड सेकंडों में वियतनामी नेवी के पास होगी। गुरुग्राम में स्थित भारतीय नौसेना का इंफॉर्मेशन फ्यूजन सेंटर (IFC-IOR) अब सीधे हनोई के वॉर रूम से जुड़ चुका है।

इतिहास का वो पन्ना जिसे चीन दुनिया से छुपाता है वियतनाम के इस आक्रामक तेवर को समझने के लिए 1979 के इतिहास में जाना होगा। जब वियतनाम ने कंबोडिया में चीन समर्थित पोल पॉट के खूनी शासन को खत्म किया, तो चीनी लीडर देंग शियाओपिंग बौखला गए। 17 फरवरी 1979 को 2 लाख से ज्यादा चीनी सैनिकों और 400 टैंकों ने वियतनाम पर धावा बोला। चीन को लगा था अमेरिका से 20 साल लड़कर वियतनाम टूट चुका है। लेकिन वियतनामी लड़ाकों ने जंगलों और गुफाओं में चीनी सेना को ऐसा फंसाया कि सिर्फ 29 दिन में चीन को मैदान छोड़कर भागना पड़ा। उन 29 दिनों में चीन के 20 हजार से ज्यादा सैनिक मारे गए और टैंक कबाड़ बन गए।

उस वक्त भारत के विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी चीन के दौरे पर थे। हमले की खबर मिलते ही उन्होंने चीन का दौरा रद्द किया और भारत लौट आए। भारत ने वियतनाम का खुलकर साथ दिया। 1979 में बोया गया वही भरोसा आज 2026 में चीन के खिलाफ सबसे बड़ा ब्रह्मास्त्र बन गया है।

ब्रह्मोस और आईएनएस कृपाण: समंदर का नया सिकंदर यह पार्टनरशिप सिर्फ बयानों में नहीं, समंदर में गरज रही है। इसका सबसे बड़ा प्रतीक है ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल। ब्रह्मोस मिसाइल ‘सी-स्किमिंग’ (Sea-skimming) तकनीक से उड़ती है। यानी समंदर की लहरों से सिर्फ कुछ मीटर ऊपर, मैक 3 की स्पीड से। दुनिया का कोई भी रडार इसे तब तक नहीं देख सकता, जब तक यह टारगेट के एकदम करीब न आ जाए। चीन का HQ-9 एयर डिफेंस सिस्टम भी इसके सामने फेल है। वियतनाम इन मिसाइलों को दा नांग और कैम रान्ह जैसे कोस्टल बेसेज पर तैनात कर रहा है। अब साउथ चाइना सी में घुसने वाला कोई भी चीनी एयरक्राफ्ट कैरियर कुछ ही मिनटों में समंदर की तलहटी में पहुंच सकता है।

भारत ने 2023 में अपना एक्टिव वॉरशिप INS कृपाण वियतनाम को सौंप कर इतिहास रचा था। आज वो शिप वियतनामी झंडे के साथ चीनी जहाजों की आंखों में आंखें डाल रहा है। भारत की डिफेंस लाइन ऑफ क्रेडिट से बन रही हाई-स्पीड गार्ड बोट्स चीनी मिलिशिया का रास्ता रोक रही हैं। वियतनाम के किलो-क्लास सबमरीन सेलर्स और सुखोई-30 फाइटर पायलट्स को भारतीय सेना मॉडर्न वॉरफेयर की ट्रेनिंग दे रही है।

साइबर वॉर और नेकलेस ऑफ डायमंड्स का चक्रव्यूह टकराव सिर्फ समंदर में नहीं, कंप्यूटर स्क्रीन्स पर भी है। पीएलए के चीनी हैकर ग्रुप्स ‘मस्टैंग पांडा’ (Mustang Panda) और ‘वोल्ट टाइफून’ (Volt Typhoon) दोनों देशों के सरकारी सिस्टम्स को हैक करने की ताक में रहते हैं। डोभाल की यात्रा में दोनों देशों की CERT टीमों के बीच साइबर थ्रेट इंटेलिजेंस शेयरिंग पर मुहर लगी है। दिल्ली के सिस्टम पर चीनी वायरस का हल्का सा भी डिजिटल फुटप्रिंट दिखेगा, तो उसकी डिटेल्स तुरंत हनोई पहुंच जाएंगी, ताकि वहां का सिस्टम पहले से लॉक हो जाए।

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