जब कट्टरपंथी सोच अपनी सीमाओं को पार करने लगती है, तो उसका पतन निश्चित होता है। भारत में ब्रिक्स सम्मेलन की शानदार सफलता के बीच, बिम्सटेक अध्यक्ष के तौर पर भारत ने बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान को आमंत्रित किया था। लेकिन रहमान ने कूटनीतिक नाटक शुरू करते हुए द्विपक्षीय न्योता न मिलने का बहाना बनाकर आने से इनकार कर दिया। शायद वे यह भूल गए कि दिल्ली में अब वो सरकार नहीं है जो सिर्फ भाईचारे की दुहाई दे। अब भारत ईंट का जवाब पत्थर से देना जानता है। जैसे ही तारिक रहमान के न आने की पुष्टि हुई और उनके मंत्रियों के भारत विरोधी बयान आए, दिल्ली ने एक ‘साइलेंट बटन’ दबा दिया। देखते ही देखते पूरे बांग्लादेश की आधी बिजली गुल हो गई। कारण तकनीकी खराबी बताया गया, लेकिन इसकी टाइमिंग और प्रभाव बहुत कुछ बयां कर रहे हैं। झारखंड स्थित अडानी पावर के गोड्डा प्लांट की एक यूनिट में खराबी आने से सप्लाई 1400 मेगावाट से घटकर सीधे 750 मेगावाट के नीचे आ गई। मरम्मत में कई दिन लगने की संभावना है, जिससे बांग्लादेश के ऊर्जा अधिकारियों के हाथ-पांव फूल गए हैं।
बांग्लादेशी एक्सपर्ट मजमुल अहसान का मानना है कि बांग्लादेश के विदेश मंत्री के बयान के 24 घंटे के भीतर पावर प्लांट में खराबी आना महज इत्तेफाक नहीं है। यह भारत का एक सख्त कूटनीतिक संदेश है जिसने ढाका की सत्ता को हिला दिया है। वर्तमान में बांग्लादेश में बिजली की कमी 2500 मेगावाट को पार कर गई है। गैस, कोयला और तरल ईंधन की भारी किल्लत के कारण देश का पावर सिस्टम पूरी तरह चरमरा गया है। मांग और उत्पादन के बीच का यह भारी अंतर बांग्लादेश के लिए दम घोंटने जैसा साबित हो रहा है।
विवाद सिर्फ बिजली तक सीमित नहीं है। बांग्लादेश अब भारत के साथ हुए 101 समझौतों (MoUs) को रद्द करने की धमकी दे रहा है। बीएनपी के मुख्य व्हिप नूरुल इस्लाम मोनी ने खुलेआम घोषणा की है कि पिछली सरकार के फैसलों की समीक्षा होगी, जिसमें चटगांव और मोंगला पोर्ट मुख्य निशाने पर हैं। भारत इन बंदरगाहों का उपयोग अपने पूर्वोत्तर राज्यों (असम, त्रिपुरा, मेघालय) तक सामान पहुंचाने के लिए करता है। अगर बांग्लादेश इन पर रोक लगाता है, तो वह भारत की सप्लाई लाइन को बाधित करने की कोशिश करेगा।
हालांकि, भारत ने पहले ही अपना ‘प्लान बी’ एक्टिवेट कर दिया है। मोदी सरकार ने बिना किसी शोर-शराबे के बांग्लादेश की आर्थिक घेराबंदी शुरू कर दी है। कोलकाता एयरपोर्ट के जरिए मिलने वाली विशेष एक्सपोर्ट सुविधा वापस ले ली गई है। इसके अलावा, बांग्लादेश से आने वाले जूट, कपड़े, कॉटन और प्लास्टिक जैसे कई उत्पादों के आयात पर पाबंदी लगा दी गई है, जिसका सीधा असर वहां की गिरती अर्थव्यवस्था पर पड़ा है।
नफरत की राजनीति में बांग्लादेश अपना ही नुकसान कर रहा है। भारत की 11.72 टका प्रति यूनिट वाली सस्ती बिजली पर आपत्ति जताने वाला बांग्लादेश अब चीन की एक कंपनी से 25 टका प्रति यूनिट की दर से बिजली खरीदने की तैयारी में है। यह भारत की तुलना में लगभग 127% महंगी है। सस्ती बिजली ठुकराकर चीन के महंगे सौदे करना यह दर्शाता है कि तारिक रहमान की सरकार उसी ‘डेट ट्रैप’ (कर्ज के जाल) में फंस रही है जिसने श्रीलंका को तबाह कर दिया था।
बांग्लादेश की आंतरिक स्थिति इस समय बदतर हो चुकी है। मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री ठप है और ग्रामीण इलाकों में 10 से 15 घंटे की बिजली कटौती हो रही है। बिजली न होने के कारण झींगा पालन उद्योग बर्बाद हो रहा है, जिससे लाखों मजदूर बेरोजगार हो गए हैं। एलपीजी की कमी से घरों के चूल्हे बुझ रहे हैं और सरकार ने रात 8 बजे के बाद बाजार बंद करने का फरमान सुना दिया है।
भारत का मास्टरस्ट्रोक देखिए—एक तरफ बांग्लादेश अंधेरे में है, तो दूसरी तरफ भारत ने नेपाल को संकट के समय अतिरिक्त बिजली देने का ऐलान किया है। नेपाल में आई बाढ़ के कारण उनकी बिजली परियोजनाएं ठप हुईं, तो भारत तुरंत मदद के लिए आगे आया। यह पूरे दक्षिण एशिया के लिए संदेश है कि जो भारत का सच्चा मित्र है, वह सुरक्षित रहेगा, लेकिन दुश्मनी करने वालों को अंधेरा ही नसीब होगा।
बांग्लादेश की विदेश नीति अब पूरी तरह दिशाहीन हो चुकी है। उनके मंत्री भारत के साथ संबंधों को ‘रीसेट’ करने की बात कर रहे हैं, जबकि असल में वे अमेरिका की गोद में जा बैठे हैं। 16 साल में पहली बार अमेरिका बांग्लादेश का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बना है, जबकि भारत तीसरे स्थान पर खिसक गया है। बांग्लादेश ने अमेरिका के साथ अरबों डॉलर के कृषि और ऊर्जा उत्पाद खरीदने के बड़े समझौते किए हैं।
भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता बांग्लादेश और पाकिस्तान की बढ़ती नजदीकियां हैं। ढाका और कराची के बीच सीधी उड़ानें शुरू होना और सैन्य खुफिया जानकारी साझा करना एक खतरनाक संकेत है। जिस पाकिस्तान ने 1971 में बांग्लादेशियों का कत्लेआम किया था, आज रहमान सरकार उसी के साथ मिलिट्री सीक्रेट्स शेयर कर रही है।
बांग्लादेश की ऊर्जा मंत्री इकबाल हसन महमूद एक तरफ भारत से ‘फ्रेंडशिप पाइपलाइन’ के जरिए अतिरिक्त डीजल की गुहार लगा रहे हैं, और दूसरी तरफ उनकी सरकार भारत के रणनीतिक हितों को नुकसान पहुंचाने की योजना बना रही है। भारत ने अब तक लाखों टन डीजल भेजकर मदद की है, लेकिन अब नीति स्पष्ट है।
मोदी सरकार ने साफ कर दिया है कि राष्ट्रीय सुरक्षा से कोई समझौता नहीं होगा। अगर बांग्लादेश चटगांव पोर्ट से भारत को बाहर करने की सोचेगा, तो भारत भी कोलकाता पोर्ट के दरवाजे बंद कर सकता है। अगर वे भारत की सस्ती बिजली ठुकराएंगे, तो अडानी प्लांट के प्लग निकालकर उन्हें उनकी हकीकत याद दिला दी जाएगी।
यह नई दिल्ली का ‘साइलेंट पावर गेम’ है। भारत ने नेपाल की मदद कर खुद को एक भरोसेमंद साथी साबित किया है, लेकिन साजिश रचने वाले देशों को आर्थिक और कूटनीतिक मोर्चों पर कड़ा सबक सिखाया जा रहा है। बिना सेना भेजे, भारत ने बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था की सांसें अटका दी हैं।
इस पूरे घटनाक्रम पर आपकी क्या राय है? क्या भारत को बांग्लादेश के प्रति और अधिक सख्त रवैया अपनाना चाहिए? क्या हमें सभी व्यापारिक रिश्ते खत्म कर देने चाहिए? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

