वॉशिंगटन और लंदन के राजनीतिक गलियारों में एक बड़े खुलासे ने हलचल पैदा कर दी है। पश्चिमी मीडिया का यह दावा कि व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा सिर्फ हथियारों की खरीद तक सीमित थी, अब पूरी तरह गलत साबित हो चुका है। पर्दे के पीछे की सच्चाई यह है कि भारत और रूस का पुराना ‘खरीदार और विक्रेता’ वाला रिश्ता हमेशा के लिए बदल गया है। इतिहास में पहली बार, रूस अब अपनी पांचवीं पीढ़ी के सबसे घातक फाइटर जेट्स के लिए भारत की उन्नत मिसाइल टेक्नोलॉजी और स्वदेशी इलेक्ट्रॉनिक्स पर निर्भर होने जा रहा है।
इस ऐतिहासिक रणनीति की नींव किर्गिस्तान के बिश्केक में एससीओ शिखर सम्मेलन के दौरान रखी गई थी। पीएम नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति पुतिन की एक ही बुलेटप्रूफ गाड़ी में हुई 40 मिनट की गुप्त चर्चा ने रक्षा संबंधों का नया रोडमैप तैयार किया। यह स्पष्ट था कि भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता से समझौता नहीं करेगा। पुतिन की हालिया दिल्ली यात्रा केवल रक्षा सौदों के लिए नहीं, बल्कि एक नए वैश्विक शक्ति संतुलन का ब्लूप्रिंट थी।
ब्रह्मोस-एनजी: रूस की नई रणनीतिक जरूरत
इस दौरे का सबसे अहम पहलू ब्रह्मोस-एनजी मिसाइल है। रक्षा विशेषज्ञों के लिए यह चौंकाने वाला है कि रूस को भारत की इस सुपरसोनिक मिसाइल की जरूरत क्यों पड़ी। हालांकि ब्रह्मोस डीआरडीओ और रूस का संयुक्त उपक्रम है, लेकिन पिछले सात वर्षों में भारत ने इसमें 80% से अधिक स्वदेशी पुर्जे शामिल कर लिए हैं। भारत द्वारा विकसित 17 ग्राम की नेविगेशन चिप अब रूस के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो गई है क्योंकि यह नाविक, ग्लोनास और जीपीएस तीनों प्रणालियों पर काम करती है।
यूक्रेन युद्ध के अनुभवों ने रूस को यह सिखाया है कि उसकी पुरानी और विशालकाय मिसाइलें नाटो के एयर डिफेंस सिस्टम द्वारा पकड़ी जा सकती हैं। यहीं ब्रह्मोस-एनजी की भूमिका अहम हो जाती है। मात्र 1.2 टन वजन और 4300 किमी प्रति घंटा की रफ्तार वाली यह मिसाइल रडार पर लगभग अदृश्य रहती है, जिससे यह एक अचूक ‘ब्रह्मास्त्र’ बन गई है।
सबसे बड़ा मोड़ यह है कि रूस के पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर ‘सुखोई-57 फेलन’ के इंटरनल वेपन्स बे में फिट होने के लिए रूस के पास अपनी कोई सुपरसोनिक मिसाइल नहीं थी। ब्रह्मोस-एनजी को विशेष रूप से इस जेट के लिए डिजाइन किया गया है। अब लखनऊ में बना नया प्लांट हर साल करीब 100 मिसाइलें तैयार करेगा, जो रूस की वायुशक्ति को अभूतपूर्व बढ़त प्रदान करेंगी।
सुपर सुखोई प्रोजेक्ट और एयर डिफेंस सिस्टम
भारतीय वायुसेना के आधुनिकीकरण के लिए 92,000 करोड़ रुपये के ‘सुपर सुखोई’ प्रोजेक्ट को मंजूरी मिल गई है। इसके तहत 84 लड़ाकू विमानों में रूसी रडार की जगह भारत का स्वदेशी ‘विरुपाक्ष एईएसए रडार’ लगाया जाएगा। इसके अलावा, विमान को डिजिटल कॉकपिट और स्वदेशी इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सुइट से लैस किया जाएगा। इसमें 400 किमी रेंज वाली आर-37एम मिसाइल का एकीकरण भी शामिल है, जो दुश्मन के विमानों को दूर से ही नष्ट करने में सक्षम है।
तकनीकी क्षेत्र में रूस ने सुखोई-57 के इंजन की ‘ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी’ देने का वादा किया है। यह इंजन भारत के स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट ‘AMCA’ के लिए मील का पत्थर साबित होगा। साथ ही, एस-400 की पांचवीं स्क्वाड्रन की डिलीवरी नवंबर तक पूरी हो जाएगी और रूस ने भारत में ही इसके लिए रखरखाव (MRO) हब बनाने का प्रस्ताव दिया है।
पेट्रो-डॉलर को चुनौती और आर्थिक क्रांति
रक्षा सौदों के साथ-साथ आर्थिक मोर्चे पर भी बड़ा बदलाव हुआ है। भारत और रूस का व्यापार 65 बिलियन डॉलर को पार कर गया है, जिसे 100 बिलियन डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य है। पश्चिमी प्रतिबंधों को बेअसर करने के लिए भारत के SFMS और रूस के SPFS मैसेजिंग सिस्टम को जोड़ा गया है, जिससे डॉलर के बिना व्यापार संभव हो गया है।
तीस से अधिक रूसी बैंकों ने भारतीय बैंकों में वोस्ट्रो खाते खोले हैं। ब्रिक्स डिजिटल करेंसी और डायरेक्ट ट्रेड सेटलमेंट के जरिए डॉलर के वैश्विक प्रभुत्व को चुनौती दी जा रही है। साथ ही, रूस ने साइबेरिया के खनिज भंडार (लिथियम, टाइटेनियम और निकल) तक भारत की पहुंच सुनिश्चित की है, जो भविष्य की तकनीक के लिए अनिवार्य हैं।
भू-राजनीति और नया वैश्विक व्यवस्था (World Order)
7200 किमी लंबा INSTC कॉरिडोर अब पूरी तरह सक्रिय हो रहा है, जो मुंबई से सेंट पीटर्सबर्ग तक का समय और लागत 30% तक कम कर देगा। अमेरिका की मजबूरी यह है कि वह ‘काट्सा’ (CAATSA) के तहत भारत पर प्रतिबंध नहीं लगा सकता, क्योंकि उसे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन को रोकने के लिए भारत की जरूरत है।
भारत और रूस के बीच हुई ये मुलाकातें सिर्फ कूटनीतिक नहीं थीं, बल्कि एक बहुध्रुवीय दुनिया की शुरुआत थीं। भारत अब केवल एक ग्राहक नहीं, बल्कि एक समान शक्ति है। यह नया गठजोड़ आने वाले दशकों में वैश्विक राजनीति की दिशा तय करेगा, जिसमें भारत की स्वदेशी तकनीक की धमक पूरी दुनिया सुनेगी।

