जिस हेलीकॉप्टर का इंजन सिर्फ 25 kW बिजली बनाता है, DRDO ने उसी से हवा में उड़ते हुए 100 kW का शक्तिशाली लेजर कैसे फायर करवा दिया? क्या 30 साल पहले बंद किए गए भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर के टॉप सीक्रेट KALI प्रोजेक्ट को भारत ने खामोशी से हवा में उड़ा दिया है? दुनिया जहां लेजर चलाने से हाथ खड़े कर देती है, लद्दाख के 15000 फीट की ऊंचाई पर भारतीय लेजर की मारक क्षमता दोगुनी कैसे हो गई? वाशिंगटन में अमेरिका का पेंटागन जिस हाई पावर माइक्रोवेव वेपन को हेलीकॉप्टर में लगाने से डरता रहा, DRDO ने उसे एक छोटे से पॉड में कैसे पैक कर दिया? क्या भारत ने बिना एक भी मिसाइल दागे, सिर्फ 150 रुपये के मामूली खर्च में चीन और पाकिस्तान का पूरा ड्रोन युद्धतंत्र हमेशा के लिए खत्म कर दिया है?
भविष्य के युद्ध में आसमान पर राज वह देश नहीं करेगा जिसके पास सबसे भारी और महंगी मिसाइलें हैं, बल्कि वह करेगा जो दुश्मन के झुंड के झुंड को कौड़ियों के भाव पलक झपकते भस्म करने की तकनीक रखता हो। इसी वैश्विक सामरिक उथल-पुथल के बीच भारतीय रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन यानी DRDO की अत्यंत गुप्त प्रयोगशालाओं से एक ऐसा तकनीकी खाका सामने आया है, जिसने दुनिया भर के रक्षा विश्लेषकों की नींद उड़ा दी है। DRDO के नेक्स्ट जेन इलेक्ट्रो-ऑप्टिक सिस्टम्स के गोपनीय रोडमैप से छनकर आई लेटेस्ट जानकारी के मुताबिक, भारत अपने स्वदेशी लड़ाकू हेलीकॉप्टरों ALH Dhruv और Rudra Mk 4 को एक क्रांतिकारी वेपन सिस्टम से लैस करने की महायोजना पर बहुत तेजी से आगे बढ़ चुका है। इस टॉप सीक्रेट और महात्वाकांक्षी प्रोजेक्ट का नाम है GoAL, जिसका पूरा मतलब है एयरबॉर्न लेजर डायरेक्टेड एनर्जी वेपन पॉड।
यह कोई मामूली रडार या कैमरा पॉड नहीं है। यह भारत के आकाशीय योद्धाओं को फ्लाइंग लेजर गनशिप में तब्दील करने का वह अचूक ब्रह्मास्त्र है जो युद्ध के मैदान में बिना एक भी पारंपरिक गोली या मिसाइल दागे प्रकाश की गति से दुश्मन के ड्रोन, रडार और इलेक्ट्रॉनिक सर्किट्स को खाक में मिला सकता है। KALI और DURGA 2 प्रोजेक्ट्स की तकनीकी विरासत से उपजा यह नया प्लेटफॉर्म, भारतीय सेना की उस दुखती रग का स्थायी इलाज है जिसे आज की रक्षा भाषा में असिमेट्रिक ड्रोन वॉरफेयर कहा जाता है। आत्मनिर्भर भारत अभियान और देश की स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी का यह अब तक का सबसे आक्रामक रूप है जहां हम दुनिया की नकल नहीं कर रहे, बल्कि खुद तकनीक के जनक बन रहे हैं।
इन्वेंट्री डिप्लीशन: मिसाइलों के खिलाफ ड्रोन्स का चक्रव्यूह अब आपके मन में सवाल उठ रहा होगा कि आखिर लेजर की जरूरत ही क्यों पड़ी जब हमारे पास दुनिया की बेहतरीन मिसाइलें हैं। GoAL पॉड के असली सामरिक महत्व को समझने के लिए आपको उस कड़वी सच्चाई को समझना होगा जिसने दुनिया की सबसे शक्तिशाली सेनाओं को भी घुटनों पर ला दिया है। आज के युद्ध में सबसे बड़ा खतरा तकनीकी नहीं, बल्कि आर्थिक है। जरा सोचिए, LAC पर लद्दाख के बर्फीले पठार में या LOC के पास जम्मू और पंजाब के मैदानी इलाकों में दुश्मन एक साथ 50 से 100 छोटे आत्मघाती ड्रोनों का एक झुंड भेज देता है। बाजार में मिलने वाले सस्ते पुर्जों से बने इन ड्रोनों की कीमत मुश्किल से 50 हजार से 2 लाख रुपये के बीच होती है।
अब इन्हें रोकने के लिए हमारे एयर डिफेंस के पास क्या है? कंधे पर रखकर दागी जाने वाली Igla-S या Stinger जैसी मिसाइलें हैं जिनकी एक यूनिट की कीमत 50 लाख से 1 करोड़ रुपये के बीच होती है। या फिर QRSAM, Akash या Barak-8 जैसी भारी मिसाइलें हैं जिनकी कीमत कई करोड़ रुपये में जाती है। गणित बिल्कुल साफ और खतरनाक है। आप 1 करोड़ रुपये की मिसाइल दागकर 1 लाख रुपये के सस्ते ड्रोन को मार गिराते हैं। अगर दुश्मन 100 ड्रोन भेज दे, तो आप अपनी अरबों रुपये की मिसाइल इन्वेंट्री कुछ ही घंटों में हवा में खाली कर देंगे। इसे मिलिट्री स्ट्रेटेजी की भाषा में इन्वेंट्री डिप्लीशन स्ट्रेटेजी कहा जाता है। दुश्मन आपको सीधे नहीं मारता, बल्कि आपको अपने महंगे हथियार खाली करने पर मजबूर कर देता है, ताकि जब असली फाइटर जेट और क्रूज मिसाइलें आएं तो आपका आसमान पूरी तरह नंगा और निहत्था हो।
सिर्फ 150 रुपये में दुश्मन का खात्मा यहीं पर गेम पलटने के लिए एंट्री होती है डायरेक्टेड एनर्जी वेपन्स यानी DEW की। लेजर हथियार में किसी धातु की गोली, बारूद या रॉकेट मोटर की कोई जरूरत नहीं होती। इसका गोला-बारूद केवल और केवल बिजली है। एक बार लेजर बीम दागने का खर्च मात्र 150 से 200 रुपये की जनरेटर ऊर्जा के बराबर होता है। जब तक हेलीकॉप्टर का इंजन घूम रहा है और टरबाइन बिजली बना रहा है, तब तक आपकी मैगजीन कभी खाली नहीं हो सकती। अनलिमिटेड मैगजीन डेप्थ का यही अचूक सिद्धांत DRDO के नए GoAL प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी ताकत है।
लेकिन यह सब हवा में बातें करने जितना आसान नहीं है। DRDO ने जिस GoAL पॉड की रूपरेखा खींची है, वह केवल एक लेजर बीम फेंकने वाला साधारण ट्यूब नहीं है। यह अत्यधिक जटिल ऑप्टो-इलेक्ट्रॉनिक्स, क्रायोजेनिक सेंसर्स, माइक्रोवेव फिजिक्स और प्रेसिजन बीम डायरेक्टर का एक ऐसा सघन संगम है जिसे एक छोटे से एयरोडायनामिक ढांचे में समेटा गया है। इस पॉड की असली आंख है इसका MWIR स्पॉटर यानी मीडियम वेव इन्फ्रारेड स्पॉटर। 3 से 5 माइक्रोमीटर के वेवलेंथ में काम करने वाला यह थर्मल इमेजिंग सेंसर हिमालय की भीषण ठंड या रात के घने अंधेरे में भी दुश्मन के छोटे से छोटे ड्रोन की मोटर की मामूली सी गर्मी को कई किलोमीटर दूर से ही पकड़ लेता है।
यह पारंपरिक कैमरों से छिपने वाले उन अत्याधुनिक कार्बन फाइबर ड्रोनों को भी खोज निकालता है जो रडार स्क्रीन पर चिड़िया जितने भी दिखाई नहीं देते। इसके ठीक साथ जुड़ा है SWIR चैनल और लेजर रेंज फाइंडर जो हवा में मौजूद नमी और कोहरे के बीच नैनोसेकंड में लक्ष्य की दूरी, गति और थ्री-डी डायमेंशन का पूरा कच्चा-चिट्ठा हेलीकॉप्टर के मिशन कंप्यूटर को सौंप देता है। इस पूरी प्रक्रिया में माइक्रो-आर्कसेकंड स्तर की सटीकता चाहिए होती है, क्योंकि एक तेजी से कांपते हुए हेलीकॉप्टर से आसमान में 150 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ रहे छोटे ड्रोन पर लेजर को फोकस करना सुई की नोक से उड़ती मक्खी की आंख को छेदने जैसा असंभव काम है। लेजर हथियार का सबसे नाजुक हिस्सा उसका बीम डायरेक्टर होता है। GoAL पॉड का अडैप्टिव ऑप्टिक्स सिस्टम हवा के भटकाव और तापमान में बदलाव को मिलीसेकंड में मापता है और अंदर लगे शीशे के आकार में ऐसी माइक्रोस्कोपिक विकृति पैदा करता है कि 2 किलोमीटर दूर भी लेजर की किरण एक सिक्के जितने छोटे बिंदु पर अचूक केंद्रित रहे।
हाई पावर माइक्रोवेव (HPM): ड्रोन स्वार्म का महाकाल इस पूरी सीक्रेट प्रेजेंटेशन का सबसे सनसनीखेज पन्ना वह है जिसने विरोधी खेमे में खलबली मचा दी है। वह पन्ना है इस पॉड में हाई पावर माइक्रोवेव यानी HPM चैनल का जुड़ना। लेजर और माइक्रोवेव में एक बड़ा तकनीकी अंतर है। लेजर एक सुई जैसी सीधी किरण है जो एक बार में केवल एक ड्रोन को जलाती है। लेकिन HPM एक चौड़े शंकु के रूप में इलेक्ट्रोमैग्नेटिक शॉकवेव का भयानक विस्फोट छोड़ता है। अगर दुश्मन 1 या 2 नहीं बल्कि 30 ड्रोनों का पूरा स्वार्म एक साथ भेज दे, तो हेलीकॉप्टर का ऑपरेटर सिर्फ HPM का ट्रिगर दबाएगा। यह अदृश्य शॉकवेव ड्रोन के जीपीएस रिसीवर्स, चिप्स और ऑटोपायलट मदरबोर्ड्स को एक झटके में फ्राई कर देगी। ड्रोन बिना जले ही हवा में ताश के पत्तों की तरह अनियंत्रित होकर जमीन पर गिर पड़ेंगे। यह सॉफ्ट किल और हार्ड किल का एक ऐसा घातक फ्यूजन है जो आज अमेरिका के पेंटागन के पास भी पूरी तरह से हेलीकॉप्टर ऑपरेशनल नहीं है।
KALI और DURGA की विरासत आपको जानकर हैरानी होगी कि DRDO का यह प्रोजेक्ट रातों-रात आसमान से नहीं टपका है। यह भारत के तीन दशकों के उस गुप्त अनुसंधान का नतीजा है जिसे KALI और DURGA के नाम से जाना जाता है। 1980 के दशक के आखिर में भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र में डॉ. आर चिदंबरम की देखरेख में शुरू हुआ प्रोजेक्ट KALI मूल रूप से एक हाई पावर पल्स माइक्रोवेव जनरेटर था। बाद में आए इसके KALI 5000 और KALI 30000 जैसे शक्तिशाली संस्करण दुश्मन की मिसाइलों के इलेक्ट्रॉनिक्स को तुरंत भस्म करने की ताकत रखते थे। लेकिन काली की सबसे बड़ी समस्या उसका भारी वजन और विशाल आकार था। वह वैक्यूम चैंबर और कैपेसिटर बैंकों से भरा एक ऐसा दानव था जिसे किसी चलते-फिरते छोटे हेलीकॉप्टर में लगाना भौतिक विज्ञान के नियमों के खिलाफ था। इसी सीमा को तोड़ने के लिए DRDO की हैदराबाद स्थित प्रयोगशाला CHESS और दिल्ली स्थित LASTEC ने DURGA 2 प्रोजेक्ट पर काम शुरू किया। इसका मकसद एक ऐसा सॉलिड स्टेट लेजर तैयार करना था जिसका आकार इतना छोटा हो कि उसे युद्धपोतों और हेलीकॉप्टरों पर लगाया जा सके।
इसी कड़ी में जमीन पर 30 kW क्लास के लेजर सिस्टम का सफल परीक्षण रामगढ़ और पोखरण में हो चुका है, जहां इसने 2.5 किलोमीटर की दूरी पर उड़ते ड्रोनों को हवा में ही जलाकर राख कर दिया। लेकिन 10 पहिया भारी ट्रक पर विशाल जनरेटर लगाकर 30 kW का लेजर चलाना एक बात है, और उसी प्रचंड लेजर को मात्र 5.5 टन वजनी ALH Rudra के पेट पर टांग देना बिल्कुल दूसरी बात है। यहीं से शुरू होती है साइज, वेट, पावर और कूलिंग यानी SWaP-C की असली और जानलेवा इंजीनियरिंग चुनौती।
100 kW की बिजली और 70 kW की भयंकर गर्मी का इलाज एक 30 kW की लेजर बीम का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आपको सिर्फ 30 kW बिजली चाहिए। लेजर की वॉल प्लग एफिशिएंसी केवल 30 से 35 प्रतिशत होती है। इसका सीधा मतलब यह है कि अगर आपको 30 kW की विनाशकारी लेजर बीम दुश्मन पर दागनी है तो हेलीकॉप्टर को कम से कम 100 kW की शुद्ध बिजली पैदा करनी होगी। ALH Rudra में दो शक्तिशाली Ardiden 1H1 इंजन लगे हैं जो 2000 kW से ज्यादा की मैकेनिकल शाफ्ट पावर तो देते हैं, लेकिन उनके जनरेटर कॉकपिट के रडार और एवियोनिक्स चलाने के लिए मुश्किल से 25 से 30 kW बिजली ही बनाते हैं। तो फिर 25 kW बिजली बनाने वाले हेलीकॉप्टर से 100 kW का दैत्य लेजर कैसे चलेगा?
इसके लिए DRDO अल्ट्रा-कैपेसिटर और सॉलिड स्टेट बैटरी बफर बैंक के हाइब्रिड मॉडल का इस्तेमाल कर रहा है। लेजर को लगातार 2 घंटे नहीं जलाना होता। एक लेजर शॉट केवल 3 से 5 सेकंड का होता है। यह सिस्टम लगातार हेलीकॉप्टर के इंजन से धीमी गति से बिजली लेकर एक सुपरकैपेसिटर को चार्ज करता रहता है। जब पायलट दुश्मन को देखकर ट्रिगर दबाता है तो यह कैपेसिटर मिलीसेकंड में 100 kW बिजली का तीव्र डिस्चार्ज लेजर डायोड्स को सौंप देता है। शॉट खत्म होते ही यह बैटरी बैंक फिर से चार्ज होने लगता है।
बिजली का जुगाड़ तो हो गया लेकिन दूसरी सबसे बड़ी और जानलेवा बाधा है 70 kW की भयानक गर्मी का निस्तारण। जब 100 kW बिजली में से 30 kW प्रकाश बन गई, लेकिन बची हुई 70 kW ऊर्जा विनाशकारी गर्मी के रूप में पॉड के अंदर ही रह जाती है। अगर इस भारी गर्मी को कुछ ही सेकंड में बाहर नहीं निकाला गया तो लेजर के शीशे और डायोड्स खुद पिघल कर राख हो जाएंगे। जमीन पर ट्रकों में विशाल एसी और चिलर लगे होते हैं लेकिन उड़ते हेलीकॉप्टर में जगह कहां है? इसके लिए DRDO के वैज्ञानिक फेज चेंज मटेरियल्स और रैम एयर हीट एक्सचेंजर्स का उपयोग कर रहे हैं। उड़ते हेलीकॉप्टर के सामने से आने वाली ठंडी तेज हवा को वेंटुरी ट्यूब्स के जरिए लिक्विड कूलिंग रेडिएटर पर गुजारा जाता है जिससे अंदर की भयंकर गर्मी सीधे वायुमंडल में फेंक दी जाती है।
तीसरी और सबसे खतरनाक बाधा है रोटर का कंपन। विशालकाय रोटर ब्लेड्स के कारण हेलीकॉप्टर में भयंकर वाइब्रेशन होता है। 200 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ते और बुरी तरह कांपते हेलीकॉप्टर से 2.5 किलोमीटर दूर आसमान में उड़ रहे 30 सेंटीमीटर के ड्रोन पर लगातार 4 सेकंड तक लेजर टिकाए रखना भौतिक विज्ञान के लिए एक बुरे सपने जैसा है। इसके लिए GoAL पॉड में एक्टिव मैग्नेटिक लेविटेशन और पीजोइलेक्ट्रिक फास्ट स्टीयरिंग मिरर्स की जादुई तकनीक लगाई गई है। अंदर लगे जायरोस्कोपिक सेंसर्स हेलीकॉप्टर के कंपन को प्रति सेकंड हजारों बार मापते हैं और शीशे को विपरीत दिशा में हिलाकर उस कंपन को पूरी तरह निरस्त कर देते हैं। नतीजा यह होता है कि बाहर हेलीकॉप्टर चाहे जितना हिले-डुले, अंदर से निकलने वाली लेजर बीम लेड की लकीर की तरह लक्ष्य पर चुपचाप चिपकी रहती है।
पाकिस्तान और चीन का काल: LOC और LAC पर तबाही जब यह GoAL सिस्टम ALH Dhruv या Rudra पर सजकर हकीकत के मैदान में उतरेगा, तो पाकिस्तान और चीन के सामरिक जनरलों के माथे पर पसीना आना तय है। पश्चिमी सीमा यानी LOC पर पिछले कुछ सालों से पाकिस्तान की ISI ने पंजाब और जम्मू-राजस्थान बॉर्डर पर ड्रोन इनफिल्ट्रेशन का नया छद्म युद्ध छेड़ रखा है। हर रात वहां चीनी हेक्साकॉप्टर हथियार, ड्रग्स और आरडीएक्स गिराने आते हैं। अभी BSF जवान रात के अंधेरे में बंदूकों से फायर करते हैं जो सिर्फ किस्मत के भरोसे होता है। सॉफ्ट जैमर काम नहीं करते क्योंकि अब ड्रोन्स में INS और ऑप्टिकल फ्लो नेविगेशन आ गया है जिन पर जैमिंग बेअसर है। मिसाइल हम दाग नहीं सकते क्योंकि नीचे हमारे ही मासूम नागरिकों के गांव हैं।





