पाकिस्तान के चारों तरफ बिछ गया चाणक्य नीति का सबसे बड़ा चक्रव्यूह, फौज के उड़े होश

पाकिस्तान के चारों तरफ बिछ गया चाणक्य नीति का सबसे बड़ा चक्रव्यूह, फौज के उड़े होश

मास्को का सैन्य हवाई अड्डा। कड़ाके की ठंड, सुबह के ठीक छह बजे का वक्त। रनवे पर एक विशेष विमान लैंड करता है। उस विमान की सीढ़ियों से नीचे उतरते हैं वो चेहरे, जिन्हें पूरी दुनिया केवल दाढ़ी, पगड़ी और जंग के मैदान में क्लाश्निकोव थामे देखने की आदी थी। यह तालिबान का एक बेहद गोपनीय और उच्च-स्तरीय रक्षा प्रतिनिधिमंडल था। ठीक इसी समय, इस्लामाबाद और रावलपिंडी के वॉर रूम में सायरन बज रहे थे। कुछ ही घंटे पहले पाकिस्तानी वायुसेना के लड़ाकू विमानों ने अफगानिस्तान की सीमा में घुसकर बमबारी की थी। रावलपिंडी को लगा था कि दुनिया उनके पीछे खड़ी होगी। लेकिन मास्को की धरती पर जो हुआ, उसने पेंटागन से लेकर जीएचक्यू रावलपिंडी तक पैरों तले जमीन खिसका दी। रूसी सेना ने न केवल तालिबान का लाल कालीन बिछाकर स्वागत किया, बल्कि अपने सबसे घातक और आधुनिक हथियारों का जखीरा उनके सामने खोल दिया।

उधर नई दिल्ली से उड़ान भरने वाले भारतीय वायुसेना के भारी-भरकम सी-17 ग्लोबमास्टर विमान काबुल के आसमान में लगातार उतर रहे हैं। एक तरफ काबुल में भारत की बढ़ती मौजूदगी, दूसरी तरफ मास्को में तालिबान को मिलती हाई-टेक सैन्य ट्रेनिंग। क्या दुनिया के सबसे बड़े रणनीतिक नक्शे पर कोई ऐसा खेल सेट हो चुका है, जिसकी भनक पश्चिमी ताकतों को तब लगी जब मोहरे अपनी जगह ले चुके थे?

इतिहास का सबसे बड़ा उलटफेर देखिए। जिस तालिबान को कभी अस्सी के दशक में रूस की लाल सेना का गला घोंटने के लिए अमेरिकी सीआईए और पाकिस्तानी जनरलों ने पाला था, आज वही तालिबान मास्को के सैन्य दरबार में बैठकर रावलपिंडी को घुटनों पर लाने के गुर क्यों सीख रहा है? क्या सीआईए, एमआई-सिक्स और आईएसआई जिस चक्रव्यूह को सूंघ भी नहीं पाईं, भारत ने वह पूरा खेल बंद कमरों में नहीं, बल्कि बिल्कुल खुले आसमान के नीचे खेल दिया है?

बलूचिस्तान हाथ से फिसल रहा है, डूरंड लाइन पर रात-दिन बारूद बरस रहा है और गुलाम कश्मीर यानी पीओके की सड़कों पर तिरंगे के नारे गूंज रहे हैं। तो क्या पाकिस्तान के भूगोल के अंतिम संस्कार की तारीख तय हो चुकी है? और सबसे खौफनाक सवाल यह कि क्या पीओके को वापस लेने के लिए भारतीय सेना को बॉर्डर पार करने की ज़रूरत भी पड़ेगी, या पाकिस्तान खुद अपनी ही बर्बादी के मलबे तले दबकर उसे सौंपने पर मजबूर हो जाएगा?

अस्सी के दशक में रावलपिंडी के फौजी मुख्यालय ने अमेरिकी सीआईए के डॉलर और खाड़ी के रियालों के दम पर सोवियत संघ को अफगानिस्तान के दलदल में धकेलने के लिए मजहबी लड़ाकों की जो फौज तैयार की थी, आज वही ताकत पाकिस्तानी जनरलों के गले का फंदा बन चुकी है। इसे पाकिस्तानी फौजी हलकों में कभी स्ट्रेटेजिक डेप्थ यानी रणनीतिक गहराई का नाम दिया गया था। जनरलों का सपना था कि भारत से युद्ध होने पर वे अफगानिस्तान को अपना सुरक्षित पिछवाड़ा बनाएंगे। लेकिन आज वही पिछवाड़ा उनके लिए एक सामरिक दुस्वप्न बन चुका है। पाकिस्तान अपनी ही ऐतिहासिक गलतियों, फौजी घमंड और आर्थिक दिवालियापन के ऐसे भंवर में फंसा है, जहां चारों दिशाओं से मौत उसका रास्ता रोककर खड़ी है।

रूसी संघ की धरती पर तालिबान के रक्षा प्रतिनिधिमंडल की मौजूदगी कोई साधारण कूटनीतिक मुलाकात नहीं थी। अब्दुल्ला बिन मसूद कोर के प्रमुख कमांडर मौलवी नसीबुल्लाह मदनी के नेतृत्व में पहुंचे इस दल ने रूस के अत्यंत सुरक्षित सैन्य ठिकानों का दौरा किया। जिस तालिबान को वर्षों तक संयुक्त राष्ट्र की ब्लैकलिस्ट में रखा गया, उसी संगठन के सैन्य रणनीतिकार मास्को में रूस के अत्याधुनिक ड्रोन्स, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम्स, लॉन्ग-रेंज गाइडेड मिसाइल प्रणालियों और आधुनिक रोबोटिक कॉम्बैट गियर्स की लाइव ट्रेनिंग ले रहे हैं।

मास्को का यह कदम किसी जल्दबाजी का नतीजा नहीं है। इसके पीछे रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की तीन बेहद ठोस और आक्रामक रणनीतिक गणनाएं काम कर रही हैं। पहली प्राथमिकता है आईएसकेपी यानी इस्लामिक स्टेट खोरासान प्रोविंस का समूल विनाश। साल चौबीस में मास्को के क्रॉकस सिटी हॉल में हुए भीषण आतंकी हमले के बाद रूसी सुरक्षा एजेंसी एफएसबी ने यह साफ समझ लिया था कि रूस और मध्य एशियाई गणराज्यों की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा आईएसकेपी है, तालिबान नहीं। और जमीन पर आईएसकेपी का सबसे बेरहम और खूंखार दुश्मन सिर्फ और सिर्फ अफगान तालिबान है। इसलिए तालिबान की मारक क्षमता को आधुनिक बनाना सीधे तौर पर रूस के अपने सुरक्षा कवच को मजबूत करना है।

रूस की दूसरी बड़ी गणना है इस इलाके से अमेरिकी प्रभाव का स्थायी खात्मा। इक्कीस में काबुल से अमेरिकी सैनिकों की जिस तरह बदहवास वापसी हुई थी, उसके बाद जो रणनीतिक खालीपन पैदा हुआ, मास्को उसे दोबारा पश्चिमी ताकतों के हाथ में नहीं जाने देना चाहता। तीसरी वजह है ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान की सीमाएं। कलेक्टिव सिक्योरिटी ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन यानी सीएसटीओ के तहत मध्य एशिया की सीमाओं को सुरक्षित रखने के लिए रूस को काबुल में एक ऐसा साझीदार चाहिए जो जमीन पर राज करता हो। इसी अभ्यास के दौरान जब मौलवी मदनी के प्रतिनिधिमंडल ने वहां मौजूद भारतीय और चीनी सैन्य प्रतिनिधियों से मुलाकात की, तो पूरी दुनिया समझ गई कि अब तालिबान को कोई विद्रोही गुट नहीं, बल्कि अफगानिस्तान की संप्रभु सत्ता मानकर सीधे डील की जा रही है।

अब जरा उस खूनी सीमा की तरफ चलिए जिसे दुनिया डूरंड लाइन के नाम से जानती है। जनरल असलम बेग और आईएसआई के पूर्व चीफ जनरल हमीद गुल ने जिस स्ट्रेटेजिक डेप्थ के सिद्धांत को जन्म दिया था, उसकी धज्जियां छब्बीस सौ चालीस किलोमीटर लंबी इसी डूरंड रेखा पर उड़ रही हैं। इतिहास का एक अखंड और कड़वा सच यह है कि अठारह सौ तिरानवे में ब्रिटिश हुकूमत के सर मोर्टिमर डूरंड और अफगान अमीर अब्दुर रहमान खान के बीच खींची गई इस लकीर को अफगानिस्तान के किसी भी शासक ने कभी अपनी वैध सीमा माना ही नहीं। न सैंतालीस से पहले, न सैंतालीस के बाद। न राजा जहीर शाह ने, न दाऊद खान ने, न कम्युनिस्टों ने, न हामिद करजई ने, न अशरफ गनी ने, और न ही आज के तालिबान ने।

पश्तून कौम के लिए डूरंड रेखा उनकी छाती पर खिंचा एक ऐसा जख्म है जिसने उनके परिवारों, कबीलों और पुरखों की जमीनों को दो टुकड़ों में चीर दिया। पिछली अफगान सरकारें केवल कागजी विरोध जताती थीं। लेकिन अगस्त इक्कीस में सत्ता संभालते ही तालिबान के लड़ाकों ने पाकिस्तानी सेना द्वारा लगाई गई कंटीली बाड़ को ट्रैक्टरों से खींचकर उखाड़ फेंकना शुरू कर दिया। रावलपिंडी का सबसे बड़ा मुगालता यह था कि काबुल में उनकी पसंद की इस्लामी हुकूमत आएगी तो वह उनके इशारों पर नाचेगी। पाकिस्तानी जनरल यह भूल गए कि अफगान तालिबान और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान यानी टीटीपी के बीच सिर्फ दोस्ती नहीं, बल्कि लहू और अकीदे का अटूट रिश्ता है।

टीटीपी के लड़ाकों ने बीस साल तक अमेरिकी और नाटो फौजों के खिलाफ अफगान तालिबान के साथ कंधे से कंधा मिलाकर जंग लड़ी है। टीटीपी का प्रमुख नूर वली महसूद अफगान तालिबान के सर्वोच्च नेता हिबतुल्लाह अखुंदजादा के प्रति अपनी धार्मिक निष्ठा की सार्वजनिक कसमें खाता है। और अफगान तालिबान के गृह मंत्री सिराजुद्दीन हक्कानी, जिनका हक्कानी नेटवर्क कभी आईएसआई की सबसे लाडली प्रॉक्सी हुआ करता था, आज वही हक्कानी नेटवर्क टीटीपी को खैबर पख्तूनख्वा में हमले करने के लिए सुरक्षित ठिकाने और हथियार मुहैया करा रहा है।

पाकिस्तानी सेना ने टीटीपी को खत्म करने के लिए ऑपरेशन अज्म-ए-इस्तेहकाम का ढोल पीटा। लेकिन यह ऑपरेशन शुरू होने से पहले ही फुस्स हो गया। खैबर पख्तूनख्वा की प्रांतीय सरकार, वहां के आम पश्तून और पश्तून तहफुज मूवमेंट यानी पीटीएम ने दो टूक कह दिया कि फौज को अपने ही लोगों के घरों पर दोबारा तोपें चलाने की इजाजत नहीं दी जाएगी। जब पाकिस्तानी लड़ाकू विमानों ने सीमा पार अफगानिस्तान के खोस्त, पक्तिका और कुनार में हवाई हमले किए, तो तालिबान के रक्षा मंत्रालय ने सीधी चेतावनी दी। स्पिन बोल्डक, तोरखम और कुर्रम सेक्टर में तालिबान के लड़ाकों ने अमेरिकी एम-सोलह राइफलों, भारी मोर्टारों और छोड़े गए बख्तरबंद ह्यूमवीज से पाकिस्तानी चौकियों को मलबे में तब्दील कर दिया। अब सोचिए, जब रूस में ट्रेंड होकर ये अफगान लड़ाके आधुनिक ड्रोन्स और नाइट-विजन स्नाइपर सिस्टम्स के साथ डूरंड लाइन पर मोर्चा संभालेंगे, तो पाकिस्तानी फ्रंटियर कॉर्प्स के जवानों का क्या हाल होगा।

अब आते हैं इस पूरे खेल के सबसे बड़े और निर्णायक खिलाड़ी पर, यानी भारत। भारत ने पिछले कुछ सालों में जो कूटनीतिक बिसात बिछाई है, वह आधुनिक इतिहास में रणनीतिक यथार्थवाद का सबसे सटीक नमूना है। नब्बे के दशक में भारत ने तालिबान का कड़ा विरोध किया था और अहमद शाह मसूद के नॉर्दर्न अलायंस को मदद दी थी। लेकिन अगस्त इक्कीस में जब काबुल में सत्ता बदली, तो नई दिल्ली ने पुरानी लकीर पीटने के बजाय विशुद्ध राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखा। पश्चिमी विश्लेषक चिल्लाते रहे कि भारत का अरबों डॉलर का निवेश डूब गया। लेकिन भारत के नीति-निर्माताओं ने अपनी चालें बेहद खामोशी से चलीं।

जब अफगानिस्तान भुखमरी की कगार पर था, भारत ने पचास हजार मीट्रिक टन गेहूं, जीवन रक्षक दवाएं, टीके और मानवीय सहायता सीधे काबुल पहुंचाई। जून बाईस में भारत ने काबुल स्थित अपने दूतावास में एक टेक्निकल मिशन तैनात करके जमीनी संपर्क बहाल कर दिया। नतीजा क्या निकला? तालिबान के कार्यवाहक रक्षा मंत्री मुल्ला मोहम्मद याकूब, जो तालिबान के संस्थापक मुल्ला उमर के बेटे हैं, उन्होंने कैमरे पर आकर कहा कि वे भारत के साथ मजबूत रिश्ते चाहते हैं। उन्होंने सार्वजनिक भरोसा दिया कि अफगान धरती का इस्तेमाल लश्कर-ए-तैयबा या जैश-ए-मोहम्मद जैसे भारत विरोधी आतंकी संगठनों को कभी नहीं करने दिया जाएगा।

इसके बाद भारत ने पाकिस्तान की सबसे बड़ी भौगोलिक ताकत पर सबसे घातक वार किया। अफगानिस्तान चारों तरफ जमीन से घिरा एक लैंडलॉक्ड देश है। दशकों तक पाकिस्तान ने कराची और कासिम बंदरगाहों के जरिए अफगानिस्तान के व्यापार को बंधक बनाकर रखा। जब भी काबुल ने पाकिस्तान की बात नहीं मानी, तोरखम और चमन के रास्ते सील कर दिए जाते थे। लेकिन मई चौबीस में भारत ने ईरान के साथ रणनीतिक चाबहार बंदरगाह के शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल के संचालन का दस साल का ऐतिहासिक करार कर लिया।

जैसे ही चाबहार पूरी क्षमता से चालू हुआ और जरांज-डेलारम राजमार्ग से जुड़ा, कराची बंदरगाह का एकाधिकार हमेशा के लिए दफन हो गया। तालिबान ने खुद चाबहार बंदरगाह में पैंतीस मिलियन डॉलर से ज्यादा का निवेश करने का ऐलान कर दिया। आज अफगान व्यापारियों का माल कराची के बजाय सीधे चाबहार से हिंद महासागर में जा रहा है। पाकिस्तान को मिलने वाला करोड़ों डॉलर का ट्रांजिट टैक्स तो छिना ही, साथ ही काबुल को ब्लैकमेल करने का उसका सबसे बड़ा हथियार भी छिन गया।

बात सिर्फ व्यापार की नहीं है, बात पानी की भी है। तालिबान ने कुनार और काबुल नदी बेसिन पर विशाल बांध बनाने का काम तेज कर दिया है। काबुल नदी अफगानिस्तान से बहकर पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा में आती है और आगे चलकर सिंधु नदी में मिल जाती है। अफगानिस्तान अगर काबुल नदी पर बांध की दीवार खड़ी करता है, तो पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा और पंजाब में पानी की एक-एक बूंद के लिए हाहाकार मच जाएगा। और सबसे दिलचस्प बात जानते हैं क्या है? इन बांधों के लिए जो तकनीकी खाका और फिजिबिलिटी रिपोर्ट्स तैयार की गई थीं, वे कभी भारत के सहयोग से बनाई गई थीं। रावलपिंडी के जनरलों की रातों की नींद उड़ी हुई है कि बिना एक भी गोली दागे, काबुल और नई दिल्ली की यह जुगलबंदी पाकिस्तान की प्यास का फैसला करने जा रही है।

लेकिन पाकिस्तान की तबाही की कहानी सिर्फ उसकी सीमाओं तक सीमित नहीं है। उसके अपने अवैध कब्जे वाले इलाकों, यानी तथाकथित आजाद कश्मीर और गिलगित-बाल्टिस्तान में बगावत का ऐसा ज्वालामुखी फट चुका है जिसे बुझाना अब पाकिस्तानी सेना के बस की बात नहीं रही। मई चौबीस में मुजफ्फराबाद, मीरपुर, कोटली, रावलकोट और पुंछ की सड़कों पर जो जनसैलाब उतरा, उसने पाकिस्तानी हुकूमत की चूलें हिला दीं। जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी यानी जेएएसी के नेतृत्व में लाखों निहत्थे लोग पाकिस्तानी फौज और रेंजर्स के सामने सीना तानकर खड़े हो गए।

इस बगावत की वजह दशकों का भयानक आर्थिक और नस्लीय शोषण है। मीरपुर में स्थित मंगला बांध पूरे पाकिस्तान को रोशनी देता है। वहां बिजली उत्पादन की असली लागत महज ढाई से तीन पाकिस्तानी रुपये प्रति यूनिट है। लेकिन जिस स्थानीय कश्मीरी जनता की जमीनें और पुरखों की कब्रें उस बांध में डूब गईं, उन्हीं लोगों को पाकिस्तानी हुकूमत पैंतीस से पचास रुपये प्रति यूनिट के बिल थमा रही थी। आटे की सब्सिडी छीन ली गई। जब जनता सड़कों पर उतरी, तो शहबाज शरीफ और फौजी आकाओं ने पंजाब रेंजर्स को गोलियां चलाने भेज दिया। लेकिन कश्मीरी आवाम पीछे नहीं हटी, रेंजर्स की गाड़ियों को फूंक दिया गया और फौजी टुकड़ियों को उल्टे पैर भागना पड़ा।

यही हाल गिलगित-बाल्टिस्तान का है। वहां की शिया और इस्माइली आबादी अपनी जमीनों को बचाने के लिए सड़कों पर है। पाकिस्तानी सेना के जनरलों ने खालसा सरकार के काले कानूनों के तहत स्थानीय लोगों की पुश्तैनी जमीनों को छीनकर अपने निजी फार्महाउस और छावनियां बना ली हैं। चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर यानी सीपीईसी का प्रवेश द्वार होने के बावजूद स्थानीय नौजवानों को कोई रोजगार नहीं मिला। आज गिलगित-बाल्टिस्तान के चौराहों पर लद्दाख के कारगिल-स्कर्दू रास्ते को फिर से खोलने और भारत के साथ व्यापार शुरू करने के नारे खुलेआम गूंज रहे हैं।

जब वे नियंत्रण रेखा के पार देखते हैं, तो उन्हें जम्मू-कश्मीर में फाइव-जी नेटवर्क, चिनाब पर बना दुनिया का सबसे ऊंचा रेलवे आर्च ब्रिज, नए एम्स, नए आईआईटी, अंतरराष्ट्रीय स्तर के एक्सप्रेसवे और रिकॉर्ड तोड़ता पर्यटन दिखाई देता है। अनुच्छेद तीन सौ सत्तर हटने के बाद भारत के कश्मीर में आया विकास और सीमा पार आटे की लाइनों में लगती लाठियां, यह ऐसा मनोवैज्ञानिक कंट्रास्ट है जिसके सामने पाकिस्तानी प्रोपेगैंडा पूरी तरह दम तोड़ चुका है।

अब उस सबसे बड़े सवाल को डिकोड करते हैं: क्या यह सब भारत द्वारा बिछाया गया कोई पूर्व-नियोजित चक्रव्यूह है? और दुनिया की दिग्गज खुफिया एजेंसियां इसे समझ क्यों नहीं पाईं? इसका जवाब छुपा है आचार्य चाणक्य के कौटिल्य अर्थशास्त्र के राजमंडल सिद्धांत में। चाणक्य ने सदियों पहले कहा था कि आपके शत्रु का पड़ोसी स्वाभाविक रूप से आपका स्वाभाविक मित्र होता है। भारत ने इसी सिद्धांत को इक्कीसवीं सदी के आधुनिक स्वरूप में जमीन पर उतार दिया है।

सीआईए, एमआई-6 और आईएसआई की पूरी ट्रेनिंग शीतयुद्ध के तौर-तरीकों पर आधारित है। वे गुप्त तख्तापलट, हथियारों की स्मगलिंग और खुफिया ऑपरेशनों को ट्रैक करते हैं। वे भारत की इस चाल को इसलिए नहीं पकड़ पाए, क्योंकि भारत ने कुछ भी गुप्त रखा ही नहीं। भारत ने सब कुछ खुले में, अंतरराष्ट्रीय नियमों के दायरे में और विशुद्ध यथार्थवाद के साथ किया।

भारत की इस महा-रणनीति के चार खामोश स्तंभ हैं। पहला स्तंभ है नेपोलियन का वह अमर सिद्धांत, जिसमें कहा गया था कि जब आपका दुश्मन खुद अपनी कब्र खोद रहा हो, तो उसे बीच में टोकने की गलती कभी मत करो। पाकिस्तान ने पिछले चार दशकों में अपनी अर्थव्यवस्था को फौजी बूटों तले रौंदकर और जिहादी फैक्ट्रियां चलाकर जो दलदल बनाया था, भारत ने उसे उसी में धंसने दिया।

दूसरा स्तंभ है भारी आर्थिक विषमता। भारत ने अपनी पूरी ताकत अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में लगाई। आज भारत की अर्थव्यवस्था चार ट्रिलियन डॉलर के ऐतिहासिक आंकड़े को छू रही है, जबकि पाकिस्तान एक सौ तीस अरब डॉलर से ज्यादा के विदेशी कर्ज के बोझ तले हर महीने आईएमएफ के सामने कटोरा लेकर खड़ा होता है। भारत का सालाना रक्षा बजट पाकिस्तान के कुल राष्ट्रीय बजट से भी बड़ा हो चुका है। इस आर्थिक फासले ने पाकिस्तान को एक ऐसी हथियारों की दौड़ में घसीट लिया जिसे उसका खोखला ढांचा कभी बर्दाश्त नहीं कर सकता था।

तीसरा स्तंभ है बिना किसी दिखावे या थोपे गए एजेंडे के काबुल के साथ व्यावहारिक साझेदारी। भारत ने पश्चिमी देशों की तरह तालिबान को उपदेश नहीं दिए। भारत ने सिर्फ अस्पताल चलाए, अनाज की बोरियां भेजीं, सड़कें बनाईं और चाबहार का आजाद समुद्री रास्ता दे दिया। नतीजा यह हुआ कि आजादी पसंद अफगान अवाम समझ गई कि भारत उनका सच्चा दोस्त है और पाकिस्तान केवल उन्हें अपना गुलाम बनाना चाहता था।

और चौथा स्तंभ है रूस, भारत और ईरान का त्रिकोण। तीनों देशों का साझा हित एक ही है कि इस पूरे क्षेत्र में कोई कट्टरपंथी वहाबी आतंकी संगठन सिर न उठा सके और मध्य एशिया सुरक्षित रहे। जब रूस ने तालिबान को सैन्य तकनीक देने का फैसला किया, तो उसने पाकिस्तान के उस पुराने भ्रम को हमेशा के लिए तोड़ दिया कि मध्य एशिया में केवल उसी की चलेगी।

तो क्या पाकिस्तान सत्तर की तरह दोबारा टूटने जा रहा है? अगर आज के हालात की तुलना सत्तर से करें, तो समानताएं रोंगटे खड़े कर देने वाली हैं। सत्तर में जनरल याह्या खान ने शेख मुजीबुर रहमान के ऐतिहासिक जनादेश पर डाका डाला था। ठीक उसी तरह, आठ फरवरी चौबीस के आम चुनावों में पाकिस्तानी अवाम ने जिस पार्टी को प्रचंड बहुमत दिया, सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर ने फॉर्म सैंतालीस का नंगा खेल खेलकर उस पूरे जनादेश को चुरा लिया। सत्तर में फौजी हुकूमत केवल पूर्वी पाकिस्तान के बंगालियों से लड़ रही थी। आज पाकिस्तान की सेना अपने ही चारों कोनों में अपनी ही जनता से युद्ध लड़ रही है। पंजाब में राजनीतिक आक्रोश है, खैबर पख्तूनख्वा में पश्तून बागी हैं, बलूचिस्तान में बीएलए का कब्जा है और पीओके में कश्मीरी बगावत पर आमादा हैं।

लेकिन एक फर्क समझना बहुत जरूरी है। पाकिस्तान के पास एक सौ सत्तर से ज्यादा परमाणु हथियार हैं। इसलिए अमेरिका और चीन जैसी वैश्विक शक्तियां यह कभी नहीं चाहेंगी कि पाकिस्तान रातोंरात पूरी तरह बिखर जाए, क्योंकि परमाणु हथियारों का अनियंत्रित होना पूरी दुनिया के लिए कयामत साबित हो सकता है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं पाकिस्तान को केवल उतना ही कर्ज देती रहेंगी जिससे उसकी सांसें चलती रहें, लेकिन वह कभी अपने पैरों पर खड़ा न हो सके।

पाकिस्तान का भविष्य किसी एक बड़े धमाके से टूटने का नहीं, बल्कि अंदरूनी सड़न और सोमालिया जैसी अराजकता में तब्दील होने का है। कागजों पर एक देश का नक्शा जरूर रहेगा, लेकिन जमीन पर इस्लामाबाद की सत्ता सिर्फ कुछ शहरों तक सिमट जाएगी। सीमाएं कबीलों और लड़ाकों के हाथ में होंगी, बलूचिस्तान अलग राह पर होगा और डूरंड लाइन पर पाकिस्तान नाम का वजूद मिट चुका होगा।

अब फैसला आपको करना है, क्या पाकिस्तान अपने ही बोए हुए बारूद के ढेर पर बैठकर अपनी बर्बादी का तमाशा खुद देख रहा है, अपनी राय कमेंट बॉक्स में लिखकर जरूर बताएं।

You Might Also Like

View More

Latest & Breaking Updates

All Stories