आसमान में तैरता एक ऐसा खुफिया तंत्र, जो दुश्मन की हर गतिविधि को सरहद पार करने से पहले ही भांप लेता है। एक ऐसी अदृश्य नजर, जो सैकड़ों किलोमीटर दूर बैठे दुश्मन की धड़कन तक को ट्रैक करने की क्षमता रखती है। कल्पना कीजिए, यदि युद्ध शुरू होने से पहले ही आपको यह पता चल जाए कि दुश्मन का लड़ाकू विमान कहां से उड़ान भर रहा है और उसकी मिसाइलें किस दिशा में मुड़ने वाली हैं? भारत ने एक ऐसा ‘उड़ता हुआ कमांड सेंटर’ तैयार किया है, जिसने पाकिस्तान की ISI और चीन की PLA की नींद उड़ा दी है। यह कहानी है उस स्वदेशी ब्रह्मास्त्र की, जिसने दक्षिण एशिया के पावर बैलेंस को पूरी तरह बदल दिया है। यह केवल एक नया रडार नहीं है, बल्कि उस खौफ का नाम है जिसे अब सीमाओं के पार महसूस किया जा रहा है।
दरअसल, डीआरडीओ (DRDO) ने भारतीय वायुसेना को ‘नेत्रा’ (NETRA) एयरबोर्न अर्ली वॉर्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम के रूप में एक अचूक हथियार सौंपा है। हालांकि नेत्रा पहले से ही वायुसेना का हिस्सा था, लेकिन अब इसे ‘फाइनल ऑपरेशनल क्लीयरेंस’ (FOC) का महत्वपूर्ण प्रमाण पत्र मिल गया है। इस FOC का अर्थ है कि नेत्रा अब हर तरह के कठिन परीक्षणों और प्रतिकूल मौसम की चुनौतियों को पार कर युद्ध के मैदान में अपना पराक्रम दिखाने के लिए 100% तैयार है। यह कोई साधारण रडार नहीं, बल्कि आसमान में उड़ता हुआ भारत का एक अभेद्य किला है, जो दुश्मन के हमलों को हवा में ही नाकाम करने की ताकत रखता है।
यह कहानी इसलिए रोमांचक है क्योंकि इस ऐतिहासिक कदम ने भारत को सामरिक रूप से उस मुकाम पर पहुंचा दिया है, जहां केवल दुनिया की महाशक्तियां ही पहुंच पाई हैं। आधुनिक युद्ध का नियम है कि जीत उसकी नहीं होती जिसके पास सबसे तेज विमान हैं, बल्कि उसकी होती है जो दुश्मन को पहले देख ले। नेत्रा सिस्टम यही काम करता है। यह ब्राजीलियाई एम्ब्रेयर EMB-145 विमान पर आधारित है, जिसके ऊपर एक अत्यंत उन्नत एईएसए (AESA) रडार फिट किया गया है। यह रडार पारंपरिक रडार की तरह घूमता नहीं है, बल्कि इसकी इलेक्ट्रॉनिक किरणें प्रकाश की गति से चारों ओर स्कैन करती हैं।
इस सिस्टम की शक्ति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यह 250 से 500 किलोमीटर की दूरी से ही दुश्मन के छोटे से छोटे विमानों, ड्रोन्स और क्रूज मिसाइलों को ट्रैक कर सकता है। जब नेत्रा हजारों फीट की ऊंचाई पर उड़ान भरता है, तो यह भारतीय वायुसेना को व्यापक रडार कवरेज प्रदान करता है। दुश्मन चाहे पहाड़ों के पीछे छिपा हो या किसी ब्लाइंड स्पॉट से हमला करने की कोशिश करे, नेत्रा की बाज जैसी नजरों से बचना असंभव है। यह न केवल खतरे की पहचान करता है, बल्कि अपने लड़ाकू विमानों को रियल-टाइम निर्देश भी देता है कि दुश्मन को कैसे और कहां खत्म करना है।
अब सवाल यह है कि भारत को इस स्वदेशी सिस्टम को पूर्णतः ऑपरेशनल करने की जल्दी क्यों थी? इसके पीछे गहरा भू-राजनीतिक खेल है। इसे समझने के लिए हमें 2019 की बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक को याद करना होगा। उस रात जब भारतीय मिराज-2000 विमानों ने आतंकियों के ठिकानों को तबाह किया था, तब नेत्रा ने ही उन्हें सुरक्षित रास्ता दिखाया था और पाकिस्तान के एफ-16 विमानों को इंटरसेप्ट किया था। नेत्रा उस समय भारतीय वायुसेना के ‘मस्तिष्क’ के रूप में काम कर रहा था।
बालाकोट के बाद चीन और पाकिस्तान समझ चुके हैं कि भारत का रक्षा तंत्र अब केवल रक्षात्मक नहीं, बल्कि आक्रामक हो चुका है। चीन लगातार अपने ‘KJ-500’ जैसे अवाक्स सिस्टम बढ़ा रहा है और पाकिस्तान भी विदेशों से रडार विमान खरीद रहा है। ऐसे में नेत्रा का अपग्रेड होना एक कड़ा संदेश है कि भारत अब किसी भी गीदड़ भभकी से डरने वाला नहीं है। भारत अब दो मोर्चों (Two-Front War) पर एक साथ लड़ने की क्षमता को जमीन पर उतार चुका है।
भारत पहले रूस और इजरायल के फाल्कन अवाक्स सिस्टम पर निर्भर था। फाल्कन शक्तिशाली तो है, लेकिन इसकी तकनीक विदेशी थी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अस्थिर आपूर्ति श्रृंखला और बढ़ते तनाव को देखते हुए भारतीय रणनीतिकारों ने महसूस किया कि युद्ध जीतने के लिए विदेशी हथियारों पर निर्भरता कम करनी होगी। फाल्कन के स्पेयर पार्ट्स और मेंटेनेंस के लिए विदेशी कंपनियों का मोहताज होना ‘आत्मनिर्भर भारत’ के विजन के खिलाफ था।
यही कारण है कि डीआरडीओ के वैज्ञानिकों ने नेत्रा को विकसित कर विदेशी कंपनियों के एकाधिकार को समाप्त कर दिया। नेत्रा में ‘मित्र और शत्रु’ की पहचान करने वाली अचूक तकनीक (IFF) मौजूद है। जब आसमान में सैकड़ों विमान और मिसाइलें हों, तब यह सिस्टम पल भर में बता देता है कि कौन अपना है और कौन दुश्मन। यह एक साथ सैकड़ों टारगेट को ट्रैक कर सकता है, जिससे यह वायुसेना के लिए एक ‘फोर्स मल्टीप्लायर’ बन गया है।
भारत की वर्तमान रणनीति केवल पाकिस्तान तक सीमित नहीं है, बल्कि असली चुनौती चीन है। हिमालय की दुर्गम पहाड़ियों में चीन ने जो रडार और मिसाइलें तैनात की हैं, उन्हें जमीन से पकड़ना मुश्किल होता है। लेकिन नेत्रा जब आसमान से नीचे की ओर स्कैन करता है, तो पहाड़ों की चोटियां उसके रास्ते में बाधा नहीं बनतीं। वह दुश्मन की हर गुप्त गतिविधि को डिकोड कर लेता है।
इस स्वदेशी परियोजना की सफलता के पीछे डीआरडीओ और वायुसेना के अधिकारियों की वर्षों की तपस्या है। यह उपलब्धि केवल तकनीकी मील का पत्थर नहीं है, बल्कि वैश्विक मंच पर भारत की बदलती छवि का प्रतीक है। भारत ने साबित कर दिया है कि वह अब हथियारों का खरीदार नहीं, बल्कि उच्च-तकनीकी रक्षा उपकरणों का निर्माता बन चुका है।
नेत्रा कार्यक्रम अभी यहीं नहीं रुकेगा। भविष्य में छह और नए विमानों को इस सिस्टम में शामिल करने की योजना है। इसके साथ ही ‘नेत्रा मार्क-2’ पर भी तेजी से काम चल रहा है, जो एयरबस ए-321 विमानों पर आधारित होगा। इसकी रेंज और रडार क्षमता वर्तमान सिस्टम से कई गुना अधिक होगी, जिससे ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को और भी मजबूती मिलेगी।
कल्पना कीजिए, जब भारत के कई नेत्रा विमान एक साथ आसमान में तैनात होंगे, तो क्या चीन का जे-20 स्टील्थ फाइटर या पाकिस्तान का एफ-16 हमारी सीमाओं के पास आने की हिम्मत कर पाएगा? बिल्कुल नहीं। यह सिस्टम उन दुश्मनों के लिए चेतावनी है जो भारत की शांति को उसकी कमजोरी समझते हैं। यह आत्मनिर्भर भारत की वह छलांग है, जो भविष्य के हाइब्रिड युद्धों में हार-जीत का फैसला करेगी।
निष्कर्ष यह है कि भारत की पुरानी रक्षात्मक सोच अब खत्म हो चुकी है। नया भारत अब ‘प्रो-एक्टिव’ दृष्टिकोण में विश्वास रखता है। नेत्रा का पूर्णतः ऑपरेशनल होना भारत की उस अजेय शक्ति का प्रमाण है जो शांत रहकर भी सटीक प्रहार करती है। आने वाले वर्षों में भारत की यह हवाई सर्वोच्चता वैश्विक समीकरणों को बदल देगी। आपको क्या लगता है, क्या भारत को अपनी इस उन्नत तकनीक को मित्र देशों को भी निर्यात करना चाहिए? कमेंट में अपनी राय जरूर दें।

