भारत का स्वदेशी आकाश एयर डिफेंस सिस्टम अब आर्मेनिया से आगे बढ़कर ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान तक पहुंच चुका है। रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह की पुष्टि ने भारतीय रक्षा उद्योग की उस उपलब्धि को सामने रखा है, जिसमें अपनी जरूरतों के लिए विकसित तकनीक अब दूसरे देशों का भरोसा हासिल कर रही है। लेकिन इस खबर की सबसे दिलचस्प बात सिर्फ तीन विदेशी ग्राहक नहीं हैं। असली सवाल है कि विदेशी सिस्टम खरीदने का लंबा अनुभव रखने वाले देश अब भारतीय एयर डिफेंस को अपने सुरक्षा नेटवर्क में जगह क्यों दे रहे हैं?
इसका जवाब समझने के लिए मिसाइल की तस्वीर से आगे देखना होगा। कोई देश सिर्फ एक मिसाइल नहीं खरीदता। वह उसके साथ रडार, कमांड सिस्टम, ऑपरेटर ट्रेनिंग, स्पेयर पार्ट्स और वर्षों तक मिलने वाला तकनीकी सपोर्ट खरीदता है। आकाश का निर्यात इस पूरे भारतीय इकोसिस्टम की स्वीकार्यता का संकेत है। यही वह बदलाव है, जो आत्मनिर्भरता को फैक्ट्री से निकालकर अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाता है।
मध्य एशिया में भारतीय तकनीक की दस्तक
अक्टूबर 2026 में सामने आए रक्षा सचिव के बयान के मुताबिक, आर्मेनिया आकाश का पहला विदेशी ग्राहक था और उसने कई बैटरियां खरीदीं। इसके बाद ताजिकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान को भी इसका निर्यात हुआ। उन्होंने उत्पादन के स्थिर होने और भारतीय सशस्त्र बलों से अतिरिक्त ऑर्डर मिलने का भी उल्लेख किया। यानी घरेलू जरूरत और विदेशी मांग, दोनों इस सिस्टम की औद्योगिक यात्रा को आगे बढ़ा रही हैं।
तुर्कमेनिस्तान का मामला खास है, क्योंकि उसके पास चीनी एयर डिफेंस उपकरण भी हैं। ऐसे देश के सुरक्षा ढांचे में भारतीय सिस्टम का प्रवेश भारत के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है। हालांकि इससे यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि उसने अपने सारे चीनी सिस्टम हटा दिए हैं। उपलब्ध जानकारी आकाश को उसकी मौजूदा क्षमताओं में शामिल किए जाने की ओर इशारा करती है। भारत की कामयाबी अपने दम पर मजबूत है; उसे साबित करने के लिए किसी और सिस्टम की नाकामी गढ़ने की जरूरत नहीं।
ताजिकिस्तान को निर्यात भी भारतीय रक्षा संबंधों के विस्तार का संकेत है। इन सौदों का व्यापक महत्व यह है कि भारत अपने पारंपरिक बाजारों से आगे बढ़ रहा है। हालांकि दोनों देशों को दिए गए सिस्टम के संस्करण, संख्या और पूरे कॉन्ट्रैक्ट की रकम सार्वजनिक जानकारी में स्पष्ट नहीं हैं। इसलिए इन विवरणों पर अनुमान लगाने के बजाय पुष्टि किए गए निर्यात पर ध्यान देना ज्यादा जरूरी है।
आकाश में खरीदारों को क्या मिलता है?
DRDO के मुताबिक, आकाश एक शॉर्ट रेंज, जमीन से हवा में काम करने वाला एयर डिफेंस सिस्टम है। इसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों और प्रतिष्ठानों की सुरक्षा के लिए विकसित किया गया है। इसकी क्षमता को केवल मिसाइल की रेंज से समझना अधूरा होगा। यह कई हिस्सों से मिलकर बना सिस्टम है, जिसमें निगरानी, लक्ष्य की पहचान, निर्णय और मिसाइल गाइडेंस आपस में जुड़े होते हैं।
आसान भाषा में समझें तो रडार हवाई गतिविधि की जानकारी जुटाता है। कमांड सिस्टम उस जानकारी के आधार पर कार्रवाई का समन्वय करता है। लॉन्चर और मिसाइल निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार काम करते हैं। मूल आकाश में कमांड गाइडेंस इस्तेमाल होती है। जमीन पर मौजूद रडार और नियंत्रण उपकरण मिसाइल को लक्ष्य की दिशा में मार्गदर्शन देते हैं। इसलिए हर आकाश मिसाइल को एक जैसा फायर एंड फॉरगेट सिस्टम बताना तकनीकी रूप से सही नहीं है।
इसका मोबाइल होना भी महत्वपूर्ण है। उपकरणों को वाहनों पर लगाया गया है, जिससे जरूरत के अनुसार उनकी स्थिति बदली जा सकती है। DRDO इसके एक साथ कई लक्ष्यों से निपटने और इलेक्ट्रॉनिक बाधाओं का सामना करने वाले ECCM फीचर्स का उल्लेख करता है। लेकिन किसी भी एयर डिफेंस की वास्तविक क्षमता उसके पूरे नेटवर्क, उपलब्ध उपकरणों, ऑपरेटरों की तैयारी और स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करती है।
स्वदेशी हिस्सेदारी का बड़ा अर्थ
भारतीय सेना में आकाश शामिल किए जाने से जुड़ी सरकारी जानकारी में इसका स्वदेशी कंटेंट 96 प्रतिशत बताया गया था। यह आंकड़ा भारतीय इंजीनियरिंग की गहराई समझाता है। मिसाइल, रडार और नियंत्रण उपकरणों के पीछे देश के भीतर विकसित डिजाइन, निर्माण क्षमता और सप्लायर नेटवर्क काम करते हैं। किसी रक्षा उत्पाद की असली मजबूती यही होती है कि उसके विकास और रखरखाव की बुनियाद कितनी मजबूत है।
हालांकि अधिक स्वदेशी कंटेंट का मतलब यह नहीं कि हर तरह की बाहरी निर्भरता अपने आप समाप्त हो जाती है। फिर भी इससे भारत को उत्पादन, सुधार और सपोर्ट पर ज्यादा नियंत्रण मिलता है। विदेशी ग्राहक के लिए भी यह अहम पहलू है। उसे ऐसे साझेदार की जरूरत होती है जो उपकरण देने के बाद उसके संचालन में लगातार सहयोग कर सके।
इस सफर में DRDO के साथ Bharat Dynamics Limited, Bharat Electronics Limited और दूसरे औद्योगिक साझेदारों की भूमिका है। बड़े सिस्टम की सफलता अनेक छोटे उपकरणों, गुणवत्ता जांच और भरोसेमंद सप्लाई पर टिकी होती है। यही वजह है कि आकाश जैसे प्रोग्राम का असर एक कंपनी से आगे बढ़कर पूरे घरेलू उद्योग पर पड़ता है।
आकाश प्राइम और आकाश-NG का फर्क
आकाश परिवार को समझने में सबसे ज्यादा भ्रम उसके अलग-अलग संस्करणों को मिलाने से पैदा होता है। मूल आकाश की विशेषताओं को सीधे आकाश प्राइम या आकाश-NG पर लागू नहीं किया जा सकता। हर संस्करण की अपनी डिजाइन और विकास यात्रा है। सही तकनीकी जानकारी भारत की उपलब्धि को और स्पष्ट बनाती है।
आकाश प्राइम का पहला सफल फ्लाइट टेस्ट 27 सितंबर 2021 को हुआ था। इसमें स्वदेशी एक्टिव रेडियो फ्रीक्वेंसी सीकर जोड़ा गया, जिसका उद्देश्य सटीकता बेहतर करना है। सीकर को सरल भाषा में मिसाइल का अपना लक्ष्य पहचानने वाला सेंसर समझ सकते हैं। ऊंचाई वाले क्षेत्रों में कम तापमान के दौरान ज्यादा भरोसेमंद प्रदर्शन के लिए भी सुधार किए गए थे।
DRDO आकाश प्राइम में कमांड गाइडेंस और अंतिम चरण की सीकर आधारित गाइडेंस के संयोजन का उल्लेख करता है। इससे साफ है कि तकनीकी विकास सिर्फ एक नया नाम देने तक सीमित नहीं है। पुराने अनुभवों और उपयोगकर्ताओं की जरूरतों के आधार पर सिस्टम को बेहतर बनाया जा रहा है।
आकाश-NG में भी महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। DRDO ने 23 दिसंबर 2025 को इसके यूजर इवैल्यूएशन ट्रायल सफलतापूर्वक पूरे होने की घोषणा की। इन परीक्षणों में अलग-अलग दूरी और ऊंचाई वाले हवाई लक्ष्यों के खिलाफ प्रदर्शन जांचा गया। इसमें स्वदेशी RF सीकर और सॉलिड रॉकेट मोटर है। इसके मल्टी फंक्शन रडार, कमांड यूनिट और लॉन्च वाहन भी भारतीय प्रयोगशालाओं तथा उद्योग के सहयोग से विकसित किए गए हैं।
यूजर ट्रायल पूरे होना सेवा में शामिल किए जाने की दिशा में बड़ा पड़ाव है। इसे तुरंत बड़े पैमाने पर तैनाती का प्रमाण नहीं मानना चाहिए। परीक्षण, खरीद, उत्पादन और परिचालन इस्तेमाल अलग-अलग चरण हैं। भारत के लिए महत्वपूर्ण बात यह है कि आकाश परिवार में आगे की तकनीक विकसित करने का रास्ता लगातार बढ़ रहा है।
निर्यात में भरोसा कैसे बनता है?
अंतरराष्ट्रीय रक्षा बाजार में कीमत महत्वपूर्ण होती है, लेकिन खरीद का फैसला केवल शुरुआती रकम देखकर नहीं होता। ग्राहक ट्रेनिंग, रखरखाव, स्पेयर पार्ट्स और भविष्य के सुधार की लागत भी देखता है। इसलिए किसी सिस्टम को दूसरे से एक तिहाई कीमत पर समान सुरक्षा देने वाला बताने के लिए तुलनीय कॉन्ट्रैक्ट और तकनीकी जरूरतों की जानकारी चाहिए।
भारत के लिए अवसर यह है कि वह अपने उत्पादों के साथ भरोसेमंद सपोर्ट पेश करे। विदेशी ऑर्डर मिलने के बाद समय पर डिलीवरी और उपकरणों की उपलब्धता निर्णायक बनती है। आकाश की सफलता का अगला चरण इसी कसौटी पर आंका जाएगा। नया ग्राहक हासिल करना उपलब्धि है; उसका लंबे समय तक विश्वास बनाए रखना औद्योगिक परिपक्वता है।
₹38,424 करोड़ का रिकॉर्ड क्या बताता है?
वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का कुल रक्षा निर्यात ₹38,424 करोड़ पहुंचा। पिछले वित्त वर्ष के ₹23,622 करोड़ के मुकाबले यह 62.66 प्रतिशत की वृद्धि है। इस कुल आंकड़े में सार्वजनिक क्षेत्र और निजी कंपनियों, दोनों का योगदान है। इसे अकेले आकाश की बिक्री बताना गलत होगा।
सरकारी जानकारी के मुताबिक भारत 80 से ज्यादा देशों को रक्षा उपकरण निर्यात कर रहा है। यहां भी फर्क समझना जरूरी है। कुल रक्षा निर्यात के ग्राहक और किसी एक मिसाइल सिस्टम के ग्राहक अलग सूचियां हैं। आकाश के लिए 15 से ज्यादा देशों के पक्के ऑर्डर का दावा उपलब्ध पुष्ट जानकारी से स्थापित नहीं होता।
सरकार का लक्ष्य 2029 तक सालाना रक्षा निर्यात ₹50,000 करोड़ पहुंचाना है। आकाश जैसे भारतीय सिस्टम इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। लेकिन मंजिल तक पहुंचने के लिए लगातार रिसर्च, उत्पादन क्षमता, गुणवत्ता और ग्राहक सपोर्ट मजबूत करना होगा।
भारत की नई पहचान इसी ठोस बुनियाद पर बन रही है। आकाश ने दिखाया है कि देश अपने लिए विकसित जटिल रक्षा तकनीक को विदेशी ग्राहकों तक पहुंचा सकता है। अब चुनौती इस उपलब्धि को टिकाऊ बनाना है। भारतीय वैज्ञानिकों और उद्योग की मेहनत को अंतरराष्ट्रीय भरोसे में बदलने का यही रास्ता है—बेहतर तकनीक, जिम्मेदार दावे और वादे के मुताबिक काम।
BrahMos के साथ Akash का बढ़ता दबदबा: ₹38,424 करोड़ के रक्षा निर्यात से भारत की नई पहचान
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