समंदर में INS कोलकाता से मात खाने के बाद बौखलाया पाकिस्तान, अफगानिस्तान पर बरसाए बम तो मिला करारा जख्म!

समंदर में INS कोलकाता से मात खाने के बाद बौखलाया पाकिस्तान, अफगानिस्तान पर बरसाए बम तो मिला करारा जख्म!

रात साढ़े तीन बजे का वक्त जब पूरी दुनिया गहरी नींद की आगोश में थी, तब रडार से बचते हुए पाकिस्तान के फाइटर जेट्स ने एक खामोश और खूनी उड़ान भरी। टारगेट था डूरंड लाइन के पार एक संप्रभु देश अफगानिस्तान का इलाका। आसमान से मौत बरसी, लेकिन क्या बम बरसाने वाले रावलपिंडी के जनरलों को यह अंदाजा था कि चंद घंटों के भीतर ही उनकी अपनी चौकियों का नामोनिशान हमेशा के लिए मिटने वाला है? सुपरपावर यूएस के छोड़े हुए आधुनिक हथियार, नाईट विजन गोगल्स और स्निपर राइफल्स रातों रात पाकिस्तानी फौज के लिए काल कैसे बन गए? और इन सबके बीच, हजारों किलोमीटर दूर यूएनएससी के बंद कमरों में भारत ने ऐसा कौन सा कूटनीतिक तमाचा जड़ा, जिसने दशकों पुरानी पाकिस्तानी इस्लामिक ठेकेदारी के चिथड़े उड़ा दिए?

दक्षिण एशिया की भू राजनीति इस वक्त एक ऐसे सुलगते हुए ज्वालामुखी के मुहाने पर बैठी है, जिसका लावा किसी भी वक्त पाकिस्तान के वजूद को जलाकर खाक कर सकता है। इसकी शुरुआत होती है समंदर में मिली एक खौफनाक जलालत से। कुछ ही दिन पहले, पाकिस्तान की नौसेना का जहाज पीएनएस हुनैम अपनी झूठी ताकत का मुजाहिरा करने समंदर में उतरा था। पाकिस्तानी जनरलों को लगा था कि वो समंदर में अपनी दादागिरी दिखाएंगे। लेकिन उनके सामने हिमालय की तरह अडिग और शांत भारत का महाबली युद्धपोत आईएनएस कोलकाता खड़ा था। अचूक और विनाशकारी ब्रह्मोस मिसाइलों से लैस आईएनएस कोलकाता ने जैसे ही अपनी सामरिक घेराबंदी की, पाकिस्तानी जहाज के रडार सिस्टम में दहशत के सायरन बजने लगे। भारत के इस घातक युद्धपोत की सिर्फ एक गर्जना और एग्रेसिव पोजीशनिंग से घबराकर पाकिस्तानी नौसेना को उल्टे पांव भागना पड़ा। समंदर में मिली इस बेइज्जती ने पाकिस्तानी एस्टेब्लिशमेंट की उस खोखली मानसिकता को पूरी दुनिया के सामने बेनकाब कर दिया, जहां वो अपनी औकात से बाहर जाकर छद्म युद्ध लड़ने की कोशिश करते हैं और हर बार बुरी तरह मुंह की खाते हैं।

तालिबान का खौफनाक पलटवार

आईएनएस कोलकाता से मिली इस खौफनाक हार के बाद रावलपिंडी के मिलिट्री हेडक्वार्टर में बौखलाहट और कुंठा अपने चरम पर थी। अपनी अवाम और मीडिया के सामने अपनी इज्जत बचाने के लिए उन्हें एक मोहरा चाहिए था। और अपनी हताशा मिटाने के लिए उन्होंने चुना अपने ही बनाए हुए जाल, यानी अफगानिस्तान को। सोमवार का दिन था और सुबह के साढ़े तीन बज रहे थे। पाकिस्तानी वायुसेना के लड़ाकू विमानों ने रडार से बचने के लिए बेहद लो एल्टीट्यूड पर उड़ान भरी और डूरंड लाइन को पार करते हुए पूर्वी अफगानिस्तान के कुनार प्रांत के नुरगल जिले के पटंग इलाके में भीषण बमबारी कर दी। रावलपिंडी को लगा था कि वो रात के अंधेरे में मौत बरसाकर आसानी से बच निकलेंगे। उनका रटा रटाया बहाना था कि वो टीटीपी यानी तहरीक ए तालिबान पाकिस्तान के छिपने के ठिकानों को निशाना बना रहे हैं। लेकिन जमीनी हकीकत बिल्कुल अलग थी। ये एक आजाद मुल्क की संप्रभुता पर सीधा, खुला और कायरतापूर्ण हमला था।

पाकिस्तान पिछले कई दशकों से अफगानिस्तान को अपनी स्ट्रेटेजिक डेप्थ का हिस्सा मानता आया है। उसे लगता था कि काबुल में बैठी नई तालिबान सत्ता उसके इशारों पर नाचेगी और उसके लिए एक मोहरे का काम करेगी। लेकिन रावलपिंडी के रणनीतिकार यह भूल गए कि अफगान इतिहास में कभी किसी के गुलाम नहीं रहे हैं। जैसे ही पाकिस्तानी लड़ाकू विमान बम गिराकर वापस लौटे, तालिबान का गुस्सा ज्वालामुखी की तरह फट पड़ा। सोमवार की सुबह होते होते डूरंड लाइन भारी तोपों और मशीनगनों की खौफनाक गड़गड़ाहट से कांप उठी। तालिबान ने किसी भी तरह की कागजी कूटनीतिक निंदा का इंतजार नहीं किया। उन्होंने सीधा सैन्य पलटवार करने का फैसला किया। अफगानिस्तान के पक्तिया प्रांत के आर्यूब जाजी जिले से तालिबान के खूंखार लड़ाकों ने पाकिस्तानी सीमा के अंदर खैबर पख्तूनख्वा के कुर्रम जिले में मौजूद पाकिस्तानी चौकियों पर भीषण हमला बोल दिया।

अमेरिकी हथियारों से तबाह हुई पाक चौकियां

यहां सबसे बड़ा और खौफनाक ट्विस्ट ये है कि तालिबान ने इस हमले में उन हथियारों का इस्तेमाल किया जो कभी यूएस आर्मी के हुआ करते थे। जब यूएस फोर्सेज अफगानिस्तान से वापस गई थीं, तो वो अरबों डॉलर के अत्याधुनिक हथियार पीछे छोड़ गई थीं। आज वही आधुनिक स्निपर राइफल्स, नाईट विजन गोगल्स, मोर्टार्स और घातक असॉल्ट राइफल्स पाकिस्तानी फौज का काल बन चुके हैं। तालिबान के इस गुरिल्ला और आक्रामक हमले के सामने पाकिस्तानी फौज एक पल भी टिक नहीं पाई। सीमा पर मौजूद कई पाकिस्तानी मिलिट्री पोस्ट और मजबूत बंकर देखते ही देखते मलबे में तब्दील हो गए। तालिबान के मुख्य प्रवक्ता जबीउल्लाह मुजाहिद ने बेहद सख्त लहजे में चेतावनी दी कि अगर पाकिस्तान ने दोबारा सीमा पार करने की जुर्रत की, तो अफगान लड़ाके अपनी हिफाजत के लिए हर हद पार कर देंगे। ये सिर्फ एक खोखला बयान नहीं था, बल्कि रावलपिंडी के मुंह पर जड़ा गया वो तमाचा था जिसने पाकिस्तान की स्ट्रेटेजिक डेप्थ की थ्योरी को हमेशा के लिए दफन कर दिया।

अब आपके मन में ये सवाल आ रहा होगा कि समंदर में मिली हार के अलावा रावलपिंडी की इस भारी हताशा का कोई और तत्कालीन कारण भी था क्या? इस सवाल का असली राज छिपा है खैबर पख्तूनख्वा के कोहाट में हुए उस खूनी कार बम धमाके में। इस हवाई हमले से ठीक पहले शुक्रवार को कोहाट में एक मस्जिद के पास पुलिसकर्मियों को निशाना बनाकर एक बेहद भयानक आत्मघाती कार बम हमला हुआ था। इस खौफनाक धमाके में पंद्रह पुलिसकर्मियों सहित कुल इक्कीस लोगों के चीथड़े उड़ गए थे। ये हमला इतना भयानक था कि पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के पसीने छूट गए। टीटीपी के इस हमले ने दुनिया के सामने साबित कर दिया कि पाकिस्तान का इंटरनल सिक्योरिटी ग्रिड पूरी तरह से फेल हो चुका है और फौज अपने ही नागरिकों को बचाने में नाकाम है।

भारत का कूटनीतिक मास्टरस्ट्रोक

एक तरफ जहां पाकिस्तान डूरंड लाइन को अपने ही बुने हुए आतंक के खून से लाल कर रहा था, वहीं हजारों किलोमीटर दूर यूएनएससी के बंद कमरों में भारत एक ऐसा साइलेंट कूटनीतिक गेम खेल रहा था जिसने इस्लामाबाद की नींदें हमेशा के लिए हराम कर दीं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अफगानिस्तान के मौजूदा राजनीतिक और मानवीय हालात पर एक बेहद गंभीर चर्चा चल रही थी। इसी वैश्विक मंच से भारत के स्थायी प्रतिनिधि पर्वथानेनी हरीश ने जो दमदार भाषण दिया, वो कूटनीतिक इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज किया जाएगा। उन्होंने फ्रांस को परिषद की अध्यक्षता संभालने पर बधाई देते हुए अपना संबोधन शुरू किया। लेकिन इसके बाद उन्होंने जो ऐतिहासिक तथ्य दुनिया के सामने रखे, उसने पाकिस्तान की उस थ्योरी की धज्जियां उड़ा दीं जिसमें वो खुद को अफगानिस्तान का इकलौता इस्लामिक ठेकेदार मानता है।

पर्वथानेनी हरीश ने पूरी दुनिया को याद दिलाया कि भारत और अफगानिस्तान के मजबूत रिश्ते इन आधुनिक नक्शों और डूरंड लाइन जैसी कृत्रिम सीमाओं से कहीं ज्यादा पुराने और गहरे हैं। उन्होंने बेहद ओजस्वी अंदाज में कहा कि सदियों से इन इलाकों में कई विशाल साम्राज्य बने और मिट गए। सिकंदर से लेकर मुगलों तक, ब्रिटिश साम्राज्य से लेकर सोवियत संघ तक सबने यहां अपना जोर आजमाया, लेकिन अफगान और भारतीय लोगों के बीच दोस्ती और भाईचारे का जो रेशमी धागा है, वो कभी नहीं टूटा। काबुल से लेकर हिंदुस्तान के विशाल मैदानी इलाकों तक जाने वाली सड़कें सिर्फ व्यापार के रास्ते नहीं थीं, बल्कि ये विचारों, ज्ञान, विश्वास और गहरी आस्था के ऐतिहासिक गलियारे थे। भारत के इस अल्टीमेटम ने यूएन में बैठे पाकिस्तानी राजनयिकों के चेहरे की रंगत उड़ा दी और दुनिया को यह साफ संदेश दे दिया कि भारत का अफगानिस्तान से रिश्ता किसी मजहब या नफरत पर नहीं, बल्कि साझा संस्कृति पर टिका है।

मानवता का मसीहा बना भारत

भारत ने यूएनएससी में साफ कर दिया कि वो अफगानिस्तान में स्थायी शांति, स्थिरता और समृद्धि चाहता है। प्रधानमंत्री मोदी की सरकार का विजन बिल्कुल स्पष्ट है। एक शांतिपूर्ण और सुरक्षित यूरेशिया का सपना तब तक अधूरा है, जब तक अफगानिस्तान में स्थिरता नहीं आती। और भारत ये बात सिर्फ शब्दों से नहीं, बल्कि ग्राउंड जीरो पर काम करके दिखा रहा है। आज की तारीख में अफगानिस्तान के सभी चौंतीस प्रांतों में ऐसा कोई कोना नहीं है जहां भारत की छाप न हो। भारत पांच सौ से ज्यादा विकास परियोजनाओं के जरिए वहां के आम लोगों की जिंदगी संवार रहा है। सलमा बांध जिसे भारत अफगानिस्तान मैत्री बांध कहा जाता है, वहां की संसद की शानदार इमारत, जरांज डेलाराम हाईवे से लेकर स्कूलों और अस्पतालों तक, भारत के पसीने और मेहनत की महक वहां की मिट्टी में रची बसी है।

जरा सोचिए और इस खौफनाक कंट्रास्ट को देखिए। एक तरफ पाकिस्तान है जो अफगानिस्तान में हथियार, बम, स्लीपर सेल और आतंकवाद भेज रहा है, और दूसरी तरफ भारत है जो वहां जीवन रक्षक दवाएं और इंसानियत की संजीवनी भेज रहा है। संयुक्त राष्ट्र महासचिव की एक हालिया रिपोर्ट में एक बेहद डराने वाला आंकड़ा सामने आया था। इस रिपोर्ट के मुताबिक अफगानिस्तान का पब्लिक हेल्थ सिस्टम पूरी तरह से चरमरा चुका है और कोलैप्स होने की कगार पर है। आर्थिक तंगी और अंतरराष्ट्रीय मदद रुकने के कारण इस साल की पहली छमाही में ही डेढ़ सौ से ज्यादा हेल्थ सेंटर बंद हो गए हैं। इस वजह से लाखों बच्चों, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों की जान सीधे खतरे में आ गई है।

टीके और मेडिकल उपकरणों की खेप

इस भयानक मानवीय त्रासदी को देखते हुए भारत ने आंखें नहीं मूंदी, बल्कि तुरंत एक्शन लिया। भारत ने पिछले कुछ महीनों में अफगानिस्तान के बच्चों के टीकाकरण कार्यक्रम को जिंदा रखने के लिए तैंतीस टन से ज्यादा वैक्सीन और उससे जुड़ी क्रिटिकल मेडिकल सामग्री काबुल पहुंचाई है। तैंतीस टन वैक्सीन कोई छोटी मदद नहीं है। इसका सीधा, मतलब है लाखों मासूम अफगान बच्चों को पोलियो, खसरा और अन्य घातक बीमारियों से मौत के मुंह में जाने से बचाना।

इसके साथ ही भारत ने अफगान हेल्थ सेक्टर को वो बेहद एडवांस मेडिकल उपकरण सौंपे हैं, जिनकी उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत थी। इनमें नवजात बच्चों की देखभाल के लिए इनक्यूबेटर्स, दिल की बीमारियों की सटीक जांच के लिए कार्डियोग्राफ मशीनें, गंभीर मरीजों को मौत के मुंह से वापस लाने के लिए लाइफ सपोर्ट वेंटिलेटर, पेशेंट मॉनिटर्स, सर्जरी में इस्तेमाल होने वाले इलेक्ट्रोकॉटररी उपकरण, और सबसे अहम प्लास्टिक सर्जरी सेट शामिल हैं। एक युद्धग्रस्त देश में प्लास्टिक सर्जरी सेट और खास मेडिकल किट का भेजा जाना यह बताता है कि भारत वहां की जमीनी जरूरतों को कितनी गहराई से समझता है। दशकों के युद्ध, बम धमाकों और लैंडमाइंस के फटने से हजारों अफगान नागरिकों, महिलाओं और बच्चों के अंग भंग हुए हैं। उनके पुनर्वास और उनके जिस्म के घावों को भरने के लिए इन उपकरणों की सख्त आवश्यकता थी, जिसे सिर्फ भारत जैसा एक सच्चा दोस्त ही समझ सकता है।

पाकिस्तान का पतन और भारत का वर्चस्व

इस पूरी कहानी में एक हिडन लेयर भी है जो आम दुनिया की नजरों से छुपी हुई है। पर्दे के पीछे भारत की कूटनीति बहुत खामोशी से लेकिन बेहद घातक तरीके से अपना काम कर रही है। पिछले कुछ महीनों में तालिबान के कई शीर्ष मंत्रियों और अधिकारियों ने भारत का सीक्रेट और ऑफिशियल दौरा किया है। इन बैठकों में मानवीय सहायता, स्वास्थ्य सेवा, खाद्य सुरक्षा के तहत गेहूं की आपूर्ति, कैपेसिटी बिल्डिंग, ड्रग्स की रोकथाम और क्रिकेट डिप्लोमेसी जैसे संवेदनशील मुद्दों पर लंबी चर्चा हुई है। तालिबान का शीर्ष नेतृत्व अब यह अच्छी तरह समझ चुका है कि पाकिस्तान सिर्फ उनका अपने रणनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल करना जानता है, जबकि भारत ही वो इकलौता देश है जो बिना किसी भू राजनीतिक लालच के अफगानिस्तान के साढ़े आठ करोड़ नागरिकों का भविष्य संवारना चाहता है।

अगर आप इस पूरे पावर गेम और कूटनीतिक बिसात को ध्यान से डिकोड करें, तो तस्वीर बिल्कुल शीशे की तरह साफ हो जाती है। आज दक्षिण एशिया के नक्शे पर दो बिल्कुल अलग अलग ताकतों का प्रभाव देखा जा सकता है। पूर्व और दक्षिण पूर्व में डूरंड लाइन पर एक फ्रस्ट्रेटेड और कर्ज में डूबा पाकिस्तान है, जो अपने ही पाले हुए आतंकियों से लहूलुहान हो रहा है। कोहाट के बम धमाकों से लेकर कुनार के हवाई हमलों तक, पाकिस्तान ने जो नफरत की आग लगाई थी, वो आज उसके अपने शहरों को जला रही है। समंदर में पीएनएस हुनैम की जलालत से लेकर डूरंड लाइन पर चौकियों के मलबे में तब्दील होने तक, पाकिस्तानी फौज का खोखलापन और उसकी कायरता दुनिया के सामने बेनकाब हो चुकी है।

वहीं दूसरी तरफ, पूरे अफगानिस्तान में भारत की प्रेजेंस एक अजेय, शांत और जीवन देने वाली ताकत की तरह है। समंदर में आईएनएस कोलकाता के रडार से दुश्मन को नेस्तनाबूत करने की ताकत से लेकर, काबुल के अस्पतालों में लाइफ सपोर्ट वेंटिलेटर पहुंचाने की कूटनीति तक, भारत ने अपनी स्ट्रेटेजिक ऑटोनामी और ग्लोबल पावर का लोहा मनवाया है

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