विस्तारवादी मानसिकता और अपनी चतुराई के बल पर वैश्विक बाजार पर आधिपत्य जमाने वाले चीन का अहंकार अब चकनाचूर हो रहा है। जो बीजिंग कल तक ग्लोबल सप्लाई चेन को अपनी बपौती समझता था, वह आज भारत के एक साहसी निर्णय के सामने असहाय खड़ा है। स्थिति यहाँ तक पहुँच गई है कि दुनिया को अपने घटिया और सस्ते सामान से पाटने वाला चीन अब विश्व व्यापार संगठन (WTO) में शिकायत की गुहार लगा रहा है। कारण स्पष्ट है—भारत ने अपनी अर्थव्यवस्था और घरेलू उद्योगों की सुरक्षा के लिए एक ऐसा मास्टरस्ट्रोक खेला है, जिसने चीन की नींद हराम कर दी है। भारतीय बाजार से अरबों डॉलर का मुनाफा कमाने वाले चीन को अब समझ नहीं आ रहा कि उसकी दाल यहाँ क्यों नहीं गल रही।
ड्रैगन की बौखलाहट और WTO की शरण
दरअसल, भारत सरकार ने चीन के वर्चस्व वाले सोलर सेल, सोलर मॉड्यूल और सूचना प्रौद्योगिकी (IT) क्षेत्रों में कड़े कदम उठाए हैं, जिससे चीन के वैश्विक एकाधिकार पर सीधी चोट लगी है। भारत ने चीनी सामानों पर भारी कस्टम ड्यूटी और टैरिफ थोप दिए हैं। इसके परिणामस्वरूप, चीन का निर्यात बुरी तरह प्रभावित हुआ और उसकी हताशा दुनिया के सामने आ गई। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अपनी हार स्वीकार न कर पाने के कारण चीन ने भारत के खिलाफ WTO में शिकायत दर्ज कराई है और अब इस विवाद को सुलझाने के लिए एक विशेष पैनल गठित करने की मांग की है।
सप्लाई चेन पर चीन के कब्जे का अंत
चीन की इस छटपटाहट को समझने के लिए वैश्विक सोलर मार्केट के परिदृश्य को देखना जरूरी है। आज दुनिया हरित ऊर्जा (Green Energy) की ओर बढ़ रही है और सौर ऊर्जा पर देशों की निर्भरता बढ़ी है। चीन ने इसी क्षेत्र में अपना जाल बिछाया था। सोलर पैनल और सेल के उत्पादन में चीन दुनिया का एकछत्र स्वामी बना बैठा था, जिसका वैश्विक आपूर्ति के 80% से अधिक हिस्से पर नियंत्रण था। साल 2024 तक, चीन ने दुनिया के 92% पीवी सेल और 86% पीवी मॉड्यूल का उत्पादन किया। इसी वर्चस्व ने बीजिंग को यह भ्रम दे दिया था कि उसके बिना कोई भी देश अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा नहीं कर पाएगा।
भारत का जवाबी हमला और टैरिफ की मार
लेकिन चीन यह भूल गया कि वर्तमान भारत अपनी नीतियों को लेकर सजग है। नई दिल्ली ने चीन की इस कूटनीतिक चाल को समय रहते भांप लिया। भारत जानता था कि भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा के लिए चीन पर निर्भरता एक बड़ा खतरा बन सकती है। इसी निर्भरता को खत्म करने के लिए भारत ने कड़े शुल्क लागू किए। सरकार ने सोलर सेल पर 25% और सोलर मॉड्यूल पर 40% की बेसिक कस्टम ड्यूटी लगा दी। 1 अप्रैल 2022 से लागू यह नियम साल 2026 में भी पूरी दृढ़ता के साथ प्रभावी है।
इन टैरिफों का परिणाम यह हुआ कि भारतीय बाजार में सस्ते चीनी सोलर उत्पादों की बाढ़ रुक गई। इसके साथ ही, ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान के तहत घरेलू विनिर्माताओं को प्रोत्साहन और सहायता दी जाने लगी। भारत की इन नीतियों ने चीनी कंपनियों के मुनाफे पर ब्रेक लगा दिया, जो पहले यहाँ अपना माल डंप करके मोटा पैसा कमाती थीं।
विफल वार्ता और चीन का नया दांव
जब आर्थिक नुकसान असहनीय होने लगा, तो चीन ने कूटनीतिक दबाव बनाने की कोशिश की। पिछले साल दिसंबर में चीन ने WTO का दरवाजा खटखटाया। नियमों के अनुसार, विवाद सुलझाने का पहला चरण ‘कंसल्टेशन’ या आपसी बातचीत होता है। इसी क्रम में 10 फरवरी 2026 को दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय चर्चा हुई। चीन को उम्मीद थी कि वह भारत को अपनी नीतियां बदलने पर मजबूर कर देगा, लेकिन भारतीय प्रतिनिधियों ने स्पष्ट कर दिया कि वे अपने घरेलू उद्योगों के हितों के साथ समझौता नहीं करेंगे। परिणामस्वरूप, यह वार्ता पूरी तरह विफल रही।
बातचीत से कोई समाधान न निकलने पर WTO ने भी यह स्वीकार कर लिया है कि विवाद का अंत नहीं हो सका है। इसी के चलते अब चीन ने एक औपचारिक पैनल गठित करने की अपील की है ताकि इस मामले पर अंतिम फैसला लिया जा सके।
नियमों के उल्लंघन का मनगढ़ंत आरोप
चीन अब विश्व के समक्ष खुद को पीड़ित दिखा रहा है और भारत पर भेदभाव का आरोप लगा रहा है। बीजिंग का दावा है कि भारत के टैरिफ और घरेलू प्रोत्साहन WTO के जनरल एग्रीमेंट ऑन टैरिफ्स एंड ट्रेड (GATT) 1994, सब्सिडी और काउंटरवेलिंग मेजर्स एग्रीमेंट और ट्रेड रिलेटेड इन्वेस्टमेंट मेजर्स के विरुद्ध हैं।
चीन का यह तर्क हास्यास्पद है क्योंकि वह खुद दूसरे देशों के उद्योगों को नष्ट करने के लिए डंपिंग करने हेतु जाना जाता है। भारत का रुख साफ है कि उसके सभी कदम वैश्विक व्यापार नियमों के दायरे में हैं और राष्ट्रीय सुरक्षा एवं घरेलू उद्योगों के संरक्षण के लिए आवश्यक हैं। कोई भी संप्रभु राष्ट्र अपने बाजार को किसी विदेशी एकाधिकार के भरोसे नहीं छोड़ सकता।
ऑटो और ईवी सेक्टर में भी कड़ी घेराबंदी
चीन की यह बेचैनी केवल सोलर पैनल तक सीमित नहीं है। भारत ने ऑटोमोबाइल, बैटरी और इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) क्षेत्रों में भी चीन की राह कठिन कर दी है। प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम के माध्यम से भारत विदेशी कंपनियों के बजाय घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा दे रहा है। इस साल जनवरी में वार्ता विफल होने के बाद, चीन ने भारत की ऑटो और बैटरी प्रोत्साहन योजनाओं के खिलाफ भी WTO पैनल की मांग की थी। इसका अर्थ है कि भारत ने भविष्य की हर महत्वपूर्ण तकनीक में चीन की घेराबंदी कर दी है।
व्यापार घाटे की चुनौती और भारत का एक्शन प्लान
यद्यपि चीन भारत का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है, लेकिन व्यापार संतुलन चीन के पक्ष में बहुत अधिक झुका हुआ है। पिछले वित्तीय वर्ष में भारत का चीन को निर्यात 36% बढ़कर 19 अरब डॉलर हुआ, लेकिन इसी अवधि में आयात 16% बढ़कर 131 अरब डॉलर के पार चला गया। इसके कारण 2025-26 में व्यापार घाटा बढ़कर 112 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गया है।
इस व्यापार घाटे को कम करना भारत के लिए बड़ी चुनौती है, जिसे भारत अब आक्रामक रणनीतियों से हल कर रहा है। गैर-जरूरी चीनी सामानों पर भारी टैक्स लगाना और स्वदेशी उत्पादन को बढ़ावा देना इसी रणनीति का हिस्सा है। सोलर टैरिफ इसी दिशा में उठाया गया एक रणनीतिक कदम है।
निष्कर्ष यह है कि भारत अब एक सशक्त आर्थिक शक्ति के रूप में उभर रहा है। वह दौर बीत गया जब कोई देश भारतीय बाजार का दुरुपयोग कर सकता था। चीन को यह सत्य स्वीकार करना होगा कि उसे अब भारत में ‘फ्री पास’ नहीं मिलेगा। नया भारत अपनी शर्तों पर व्यापार करेगा और अपने हितों की रक्षा के लिए किसी भी मंच पर पीछे नहीं हटेगा।

