मध्य पूर्व में अमेरिका और इजराइल की वर्तमान सैन्य कार्रवाइयों की गूंज केवल गाजा या तेहरान तक सीमित नहीं है। इजराइल ने यह स्पष्ट संदेश दे दिया है कि यदि ईरान परमाणु हथियार विकसित करने के करीब पहुंचा, तो उसे दुनिया की कोई भी शक्ति रोक नहीं पाएगी। इस वैश्विक तनाव के बीच भारत में भी इजराइल की कार्रवाइयों पर व्यापक चर्चा हो रही है। लेकिन ईरान और इजराइल की यह शत्रुता उतनी सरल नहीं है जितनी कि समाचारों में दिखाई देती है। यदि यह कहानी इतनी ही सीधी होती, तो साल 1981 में श्रीनगर की जामा मस्जिद में एक 41 वर्षीय ईरानी नेता के भाषण का असर आठ साल बाद 1989 में कश्मीर घाटी में उग्रवाद के रूप में क्यों दिखाई दिया?
क्या कश्मीर में अशांति की पटकथा दशकों पहले ही लिख दी गई थी? हालिया हमलों से पहले हमास के लड़ाकों की पीओके सीमा पर मौजूदगी के क्या मायने हैं? जम्मू के जंगलों में हुए हमलों का ईरान की उसी ‘प्रॉक्सी ताकत’ से क्या संबंध है जिसने इजराइल को निशाना बनाया था? और सबसे महत्वपूर्ण सवाल—इजराइल की खुफिया एजेंसी मोसाद का कश्मीर में इतना गहरा हित क्यों है? आखिर रॉ और मोसाद मिलकर किस गुप्त युद्ध को अंजाम दे रहे हैं?
कश्मीर की बिसात और ईरानी प्रभाव का रहस्य
खुफिया दुनिया का सिद्धांत है कि जो दिखता है वह सच नहीं होता। आज हम कश्मीर की उस भू-राजनीतिक बिसात को डिकोड कर रहे हैं जिसकी जानकारी चुनिंदा खुफिया एजेंसियों को ही है। यह केवल सीमा विवाद नहीं, बल्कि एक वैश्विक टेरर सिंडिकेट की कहानी है, जिसमें पाकिस्तान की बंदूकें, हमास की रणनीति और ईरान का वैचारिक आधार शामिल है। इसे काउंटर करने के लिए भारत की ‘रॉ’ और इजराइल की ‘मोसाद’ एक घातक और मौन गठबंधन के तहत काम कर रही हैं।
इतिहास के पन्नों को पलटें तो फरवरी-मार्च 1981 में ईरान के वर्तमान सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई (जो तब राष्ट्रपति के दूत थे) ने भारत का दौरा किया था। वह दिल्ली और बेंगलुरु होते हुए कश्मीर पहुंचे और श्रीनगर की जामा मस्जिद से भाषण दिया। यह किसी विदेशी शिया नेता द्वारा दिया गया पहला बड़ा राजनीतिक संदेश था, जिसमें उन्होंने ईरानी क्रांति के नैरेटिव को आगे बढ़ाया। इस दौरे ने घाटी के युवाओं में एक विशेष प्रकार के वैचारिक रेडिकलाइजेशन का बीज बोया, जो आगे चलकर कश्मीर के लिए अत्यंत विनाशकारी साबित हुआ।
ISI का ईरानी मॉडल और 1989 का विद्रोह
विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान की ISI ने कश्मीर के लिए कभी अपना मौलिक ब्लूप्रिंट नहीं बनाया। उन्होंने 1979 की ईरानी क्रांति के मॉडल को कश्मीर की परिस्थितियों के अनुरूप ढाला। 1981 में बोया गया वैचारिक बीज 1989 तक आते-आते सशस्त्र आतंकवाद के एक जहरीले वृक्ष में तब्दील हो गया, जिसे ISI ने हथियारों और फंडिंग से सींचा।
यही कारण है कि खामेनेई अक्सर कश्मीर का मुद्दा उठाते रहे हैं। 2019 में अनुच्छेद 370 के खात्मे के बाद ईरान की ओर से आए तीखे बयान इसी वैचारिक प्रभाव का हिस्सा थे। भारतीय सुरक्षा एजेंसियां अब उस स्लीपर सेल नेटवर्क को ध्वस्त कर रही हैं जो मध्य पूर्व की हलचलों का असर कश्मीर में पैदा करने की कोशिश करता है। घाटी से ईरान भेजे जाने वाले गुप्त फंड और वैचारिक संबंधों पर अब कड़ी नजर रखी जा रही है।
हमास की युद्धनीति और कश्मीर में नई चुनौती
हाल के वर्षों में कश्मीर में आतंकवाद की पद्धति में एक खतरनाक बदलाव आया है। खुफिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पीओके के आतंकी शिविरों में हमास जैसी रणनीतियों का अभ्यास किया जा रहा है। इजराइल पर 7 अक्टूबर के हमले के बाद, मोसाद ने भारत की रॉ और आईबी के साथ एक साझा थ्रेट असेसमेंट साझा किया था, जिसमें हमास की छाप वाली ‘गुरिल्ला टैक्टिक्स’ की चेतावनी दी गई थी।
जम्मू संभाग के पुंछ, राजौरी और कठुआ में हुए हालिया हमले इसी हमास शैली के एम्बुश का हिस्सा हैं। आतंकियों द्वारा ‘बॉडी कैम’ (Body Cam) का उपयोग करना और प्रोपेगेंडा के लिए वीडियो रिकॉर्ड करना सीधे तौर पर हमास की कार्यप्रणाली की नकल है। वे सेना के काफिलों पर हमला कर डार्क वेब पर दहशत फैलाना चाहते हैं।
सुरक्षा के लिहाज से आतंकियों ने अब ‘रेडियो साइलेंस’ (Radio Silence) अपना लिया है। वे स्मार्टफोन या ट्रैकेबल उपकरणों के बजाय प्राकृतिक गुफाओं और कवर्ड संचार का सहारा ले रहे हैं। उनके पास अब पुराने हथियारों के बजाय अमेरिकी एम-4 कार्बाइन और ‘स्टील कोर’ वाली गोलियां मिल रही हैं, जो बुलेटप्रूफ जैकेटों को भी भेद सकती हैं। यह सब अंतरराष्ट्रीय टेरर मार्केट से पाकिस्तान के रास्ते कश्मीर पहुंच रहा है।
रॉ-मोसाद का जॉइंट इंटेलिजेंस ग्रिड
हमास और हिजबुल्लाह जैसे समूहों को ट्रेनिंग देने वाली ईरानी IRGC की तकनीकें अब कश्मीर के आतंकी कैंपों तक पहुंच गई हैं। लेकिन इसके जवाब में भारत और इजराइल ने भी अपना सुरक्षा घेरा अभेद्य कर लिया है। रॉ और मोसाद की साझेदारी अब केवल सूचना साझा करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक हाई-टेक युद्ध में तब्दील हो चुकी है।
यह गठबंधन मुख्य रूप से तीन स्तरों पर काम कर रहा है: पहला, ‘सिग्नल इंटेलिजेंस’ (SIGINT)—जहां इजराइली डीप-टेक की मदद से आतंकियों के एन्क्रिप्टेड संदेशों को डिकोड किया जा रहा है। दूसरा, ‘टेरर फंडिंग’—दुबई या तुर्की के रास्ते आने वाले क्रिप्टो और हवाला फंड को ट्रैक करना। तीसरा, ‘सर्विलांस और ड्रोन तकनीक’—इजराइल के हेरॉन ड्रोन और अन्य थर्मल रडार सिस्टम अब कश्मीर के जंगलों में छिपे आतंकियों के काल बन रहे हैं।
मोदी सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति और इजराइल के साथ रक्षा सहयोग ने आतंकियों के पुराने नेटवर्क को पूरी तरह तोड़ दिया है। पूछताछ की आधुनिक तकनीकों और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण में भी इजराइली विशेषज्ञों के अनुभव का लाभ लिया जा रहा है ताकि रेडिकलाइज्ड नेटवर्क की जड़ तक पहुंचा जा सके।
नया कश्मीर और इजराइल का मास्टरस्ट्रोक
इजराइल के लिए कश्मीर एक ऐसा मोर्चा है जहां वह अपनी सैन्य तकनीक का वास्तविक परीक्षण करता है। जब भारत हेरॉन मार्क-2 ड्रोन या स्पाइक मिसाइलों का उपयोग करता है, तो इजराइल को भी दक्षिण एशिया में ईरानी प्रॉक्सी नेटवर्क को कमजोर करने का मौका मिलता है। यह दोनों देशों के लिए एक ‘विन-विन’ स्थिति है।
अनुच्छेद 370 हटने के बाद कश्मीर का परिदृश्य बदल चुका है। पत्थरबाजी अब बीते कल की बात है और लाल चौक पर रात की रौनक भारत की रणनीतिक जीत की गवाह है। जी-20 की सफलता ने दुनिया को यह दिखा दिया है कि भारत अपनी आंतरिक सुरक्षा के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। रॉ और मोसाद की यह गुप्त जोड़ी आज आतंकियों के लिए सबसे बड़ा दुःस्वप्न बन चुकी है, और उनके अंतिम खात्मे की उल्टी गिनती शुरू हो गई है।

