देश की राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर बीती रात हुई पुलिसिया कार्रवाई ने पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। रात के सन्नाटे में भारी पुलिस बल वहां पहुंचता है और एक 60 वर्षीय बुजुर्ग को, जो पिछले 21 दिनों से केवल पानी पीकर छात्रों के अधिकारों के लिए लड़ रहा था, जबरन उठाकर सफदरजंग अस्पताल ले जाया जाता है। नीट परीक्षा घोटाले के विरुद्ध संघर्ष कर रहे सोनम वांगचुक अब अस्पताल के बेड पर हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या वांगचुक का संकल्प टूटा है, या प्रशासन के धैर्य का बांध? यह समझना जरूरी है कि यह सिर्फ एक अनशन की समाप्ति नहीं है, बल्कि उन लाखों मेडिकल छात्रों की उम्मीदों की कहानी है जिनका भविष्य नीट विवाद के कारण अधर में लटका है।
जंतर-मंतर पर आधी रात का हाई-वोल्टेज ड्रामा
जब शासन युवाओं की आवाज सुनने में विफल रहा, तब सोनम वांगचुक ने जंतर-मंतर को अपना सत्याग्रह स्थल बनाया। उनका हथियार था गांधीवादी अहिंसक भूख हड़ताल। 21 दिनों तक बिना अन्न ग्रहण किए वांगचुक का वजन 9 किलो से अधिक कम हो गया है। उनके शरीर की मांसपेशियों और चर्बी का बड़ा हिस्सा गल चुका है, जिसका सीधा प्रभाव उनके अंगों पर पड़ सकता है। प्रशासन की नींद तब खुली जब दिल्ली हाई कोर्ट का एक आदेश आया और उसके बाद पुलिस ने वह कार्रवाई की जिसने सबको स्तब्ध कर दिया।
शनिवार सुबह, जब धरना स्थल पर उजाला भी ठीक से नहीं हुआ था, पुलिस सादे कपड़ों और वर्दी में वहां पहुंची। चश्मदीदों का आरोप है कि पुलिस का व्यवहार किसी मेडिकल टीम जैसा नहीं था। प्रदर्शनकारियों को तुरंत हटने का निर्देश दिया गया और हाई कोर्ट के आदेश की आड़ में वांगचुक को जबरन अस्पताल शिफ्ट कर दिया गया।
सीजेपी और अभिजीत दीपके के गंभीर आरोप
इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके ने गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका दावा है कि पुलिस ने न केवल जबरदस्ती की बल्कि उनके साथ हाथापाई भी हुई। दीपके का सवाल है कि क्या युवाओं के शिक्षा तंत्र को सुधारने की मांग करना अपराध है? दूसरी ओर, पुलिस का कहना है कि उन्होंने संयम बरता और केवल हाई कोर्ट के निर्देशों का पालन किया। हालांकि, ग्राउंड जीरो से आ रही खबरें पुलिस के इन दावों के विपरीत एक अलग कहानी बयां कर रही हैं।
पत्नी गीतांजलि का सख्त अल्टीमेटम
इस पूरे घटनाक्रम के बीच वांगचुक की पत्नी गीतांजलि ने सफदरजंग अस्पताल से एक कड़ी चेतावनी जारी की है। उन्होंने सोशल मीडिया पर स्पष्ट किया कि उनके पति को परिवार और उनके निजी डॉक्टरों की सलाह के बिना मुंह या नसों के जरिए कोई भी दवा या तरल पदार्थ (ड्रिप) न दिया जाए।
यह चेतावनी सिस्टम के प्रति गहरे अविश्वास को दर्शाती है। समर्थकों को अंदेशा है कि प्रशासन जबरन अनशन तोड़ने के लिए मेडिकल इंटरवेंशन का सहारा ले सकता है। बिना सहमति के किसी को फीड करना मानवाधिकारों का उल्लंघन माना जाता है, और वांगचुक का परिवार इसी सुरक्षा को लेकर अडिग है।
नीट घोटाला और युवाओं का संघर्ष
इस पूरे विरोध की जड़ नीट परीक्षा में हुई धांधली है। एक मध्यमवर्गीय परिवार का बच्चा जब साल भर मेहनत करने के बाद पेपर लीक की खबर सुनता है, तो उसका भरोसा टूट जाता है। वांगचुक इसी भरोसे को बहाल करने और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे थे। उनका उद्देश्य केवल एक परीक्षा को ठीक करना नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की सफाई करना है ताकि भविष्य में कोई शिक्षा माफिया छात्रों के करियर से न खेल सके।
वांगचुक ने देश से पूछा था कि क्या लोग अपने बच्चों की शिक्षा से ज्यादा प्याज की कीमतों को महत्व देते हैं? इतिहास साक्षी है कि जब प्याज की कीमतें बढ़ीं, तो सरकारें गिर गईं। लेकिन अगर लाखों छात्रों का भविष्य दांव पर हो, तो जनता की चुप्पी क्या कहती है? यह सवाल आज हर भारतीय के सामने है।
हाई कोर्ट का निर्देश और उपजा राजनीतिक घमासान
दिल्ली हाई कोर्ट की बेंच ने वांगचुक की जान बचाने के उद्देश्य से स्वास्थ्य निगरानी के आदेश दिए थे। लेकिन इस आदेश के बाद पुलिस की कार्रवाई ने सियासी पारा बढ़ा दिया है। आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने इसे ‘गुंडागर्दी’ और सत्ता का अहंकार बताया है। वहीं, सपा सांसद डिंपल यादव ने भी इसे लोकतंत्र पर हमला करार दिया है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार संवाद करने के बजाय तानाशाही का रास्ता चुन रही है।
20 जुलाई को संसद मार्च की चुनौती
क्या वांगचुक को जंतर-मंतर से हटाने से आंदोलन थम जाएगा? सीजेपी ने स्पष्ट किया है कि 20 जुलाई को होने वाला ‘संसद मार्च’ हर हाल में होगा। वांगचुक ने अस्पताल जाने से पूर्व कहा था कि भले ही उनका शरीर कमजोर है, लेकिन उनका हौसला अटूट है। जंतर-मंतर से टेंट तो हटाया जा सकता है, लेकिन छात्रों के दिल में लगी आग को बुझाना मुश्किल है। अब सफदरजंग अस्पताल इस आंदोलन का नया केंद्र बन गया है। 20 जुलाई को जब युवाओं का हुजूम सड़कों पर होगा, तो प्रशासन के लिए स्थिति को संभालना एक बड़ी चुनौती होगी।

