‘परमाणु बम’ और ‘मिसाइलों’ पर छूट? इजरायल को दरकिनार कर ईरान से क्या खतरनाक डील कर रहे हैं डोनाल्ड ट्रंप?

मिडिल ईस्ट के युद्ध क्षेत्र से आज एक ऐसी खबर सामने आई है, जिसने वैश्विक भू-राजनीतिक समीकरणों को पूरी तरह हिला कर रख दिया है। जो अमेरिका कल तक इजरायल के लिए सुरक्षा की दीवार बनकर खड़ा था, क्या वही आज अपने सबसे भरोसेमंद दोस्त को कूटनीति की वेदी पर चढ़ाने की तैयारी कर रहा है? वाशिंगटन डीसी और तेहरान के बीच एक ऐसा सीक्रेट गेम चल रहा है, जिसने इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की चिंता बढ़ा दी है। असली खतरा शांति समझौते का नहीं, बल्कि समझौते के उस स्वरूप का है जो समस्या का समाधान किए बिना उसे केवल टालने की कोशिश कर रहा है। इजरायल को डर है कि डोनाल्ड ट्रंप युद्ध खत्म करने की जल्दबाजी में ईरान के साथ एक ऐसी डील कर रहे हैं, जो भविष्य में इजरायल के वजूद के लिए घातक साबित हो सकती है।

कहानी में बड़ा मोड़ तब आया जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर यह संकेत दिया कि अमेरिका और ईरान के बीच एक बड़ा समझौता करीब है। ट्रंप ने कहा कि दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्ते, होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोला जाएगा और इसकी अंतिम रूपरेखा तैयार की जा रही है। लेकिन इस पूरी चर्चा से इजरायल का नाम गायब था। न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ इस गुप्त बातचीत से बेंजामिन नेतन्याहू को पूरी तरह अलग रखा है। तेल अवीव में बैठे इजरायली नेतृत्व को इस बात की खबर तक नहीं है कि उनका सबसे बड़ा सहयोगी उनके सबसे बड़े दुश्मन के साथ क्या योजना बना रहा है।

अब बड़ा सवाल यह है कि इजरायल में इस कदर घबराहट क्यों है? इजरायल को अंदेशा है कि यह समझौता ईरान को राहत तो देगा, लेकिन इजरायल की सुरक्षा चिंताओं को जस का तस छोड़ देगा। आइए उन 10 मुख्य कारणों को समझते हैं, जिनकी वजह से इजरायल इस अमेरिकी डील को एक विश्वासघात मान रहा है।

पहला मुख्य डर बिना खतरा मिटाए युद्ध समाप्ति का है। इजरायल का तर्क है कि यदि युद्ध अभी रुकता है, तो ईरान का परमाणु इंफ्रास्ट्रक्चर और मिसाइल सिस्टम सुरक्षित रह जाएगा, जिसे नष्ट करने के लिए इजरायल ने काफी प्रयास किए हैं। यह अंतरिम समझौता केवल तात्कालिक शांति देगा, लेकिन सुरक्षा खतरों को जड़ से खत्म नहीं करेगा।

दूसरा बड़ा खतरा ईरान की परमाणु क्षमता का बचे रहना है। इजरायल की चिंता है कि इस समझौते के तहत ईरान के परमाणु ढांचे को नष्ट नहीं किया जाएगा। यदि परमाणु सुविधाएं बनी रहीं, तो ईरान भविष्य में कभी भी दोबारा परमाणु हथियार बनाने की स्थिति में पहुंच सकता है।

तीसरी सबसे बड़ी चिंता ईरान में संवर्धित यूरेनियम का बने रहना है। वाशिंगटन चाहता है कि ईरान अपना यूरेनियम विदेश भेज दे, लेकिन ईरान इस पर अड़ा हुआ है। इजरायल के लिए यह स्थिति डरावनी है क्योंकि यदि उच्च श्रेणी का यूरेनियम ईरान की धरती पर रहा, तो वह हफ्तों के भीतर परमाणु बम तैयार कर सकता है।

चौथा डर मिसाइल और ड्रोन कार्यक्रम से जुड़ा है। बताया जा रहा है कि इस समझौते के शुरुआती मसौदे में ईरान के खतरनाक बैलिस्टिक मिसाइल और ड्रोन प्रोग्राम पर कोई कड़ा प्रतिबंध नहीं है। ये हथियार इजरायली शहरों के लिए सीधा और बहुत बड़ा रणनीतिक खतरा बने रहेंगे।

पांचवां मुद्दा ईरान समर्थित प्रॉक्सी संगठनों को मिलने वाली छूट है। इजरायल को अंदेशा है कि इस डील से लेबनान के ‘हिजबुल्लाह’ और यमन के ‘हूती’ जैसे संगठनों पर लगाम नहीं लगेगी। ईरान इन्हें आर्थिक और सैन्य मदद पहुंचाता रहेगा, जिससे इजरायल की सीमाओं पर खतरा बना रहेगा।

छठा कारण ईरान को मिलने वाला समय है। जानकारों का मानना है कि कूटनीतिक बातचीत के बहाने ईरान को खुद को दोबारा संगठित करने और अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाने का सुनहरा मौका मिल जाएगा।

सातवां खौफ इजरायल की सैन्य स्वतंत्रता पर रोक का है। तेल अवीव को डर है कि भविष्य में अमेरिका उस पर किसी भी स्वतंत्र सैन्य कार्रवाई को रोकने के लिए कड़ा दबाव डालेगा, जिससे वह अपने बचाव में भी हमला नहीं कर पाएगा।

आठवां डर आर्थिक प्रतिबंधों में ढील और फंड रिलीज होने का है। ईरान अपनी फ्रीज की गई अरबों डॉलर की राशि वापस पाना चाहता है। इजरायल को यकीन है कि इस पैसे का इस्तेमाल ईरान अपनी अर्थव्यवस्था के बजाय हथियारों की खरीद और युद्ध की तैयारी में करेगा।

नौवां डर होर्मुज जलडमरूमध्य और वैश्विक व्यापार पर ईरान के बढ़ते प्रभाव से जुड़ा है। ईरान इस महत्वपूर्ण रास्ते से गुजरने वाले जहाजों पर नियंत्रण और टैक्स वसूलने का अधिकार मांग रहा है, जो उसे वैश्विक इकॉनमी को ब्लैकमेल करने की शक्ति दे सकता है।

दसवां सबसे बड़ा डर ईरान की कूटनीतिक चालबाजी है। इजरायली खुफिया एजेंसी मोसाद का मानना है कि ईरान के उदार चेहरे के पीछे असली रिमोट कंट्रोल कट्टरपंथियों और आईआरजीसी (IRGC) के पास है। इजरायल को डर है कि ट्रंप इस जाल में फंसकर एक ऐसी खराब डील करेंगे, जिसका नुकसान आने वाली पीढ़ियों को होगा।

रिपोर्टों के अनुसार, पाकिस्तान और कतर की मध्यस्थता से वाशिंगटन और तेहरान एक प्रारंभिक सहमति की ओर बढ़ रहे हैं। यह एक सिद्धांतों का दस्तावेज (MoU) है, जो अगले 30 से 60 दिनों की विस्तृत बातचीत का आधार बनेगा। इसका मतलब है कि ईरान अपनी शर्तों पर अमेरिका को बातचीत के लिए राजी कर रहा है।

इजरायल का दृष्टिकोण स्पष्ट है। वह चाहता है कि किसी भी समझौते में ईरान के भूमिगत परमाणु अड्डों को बंद किया जाए, उसके मिसाइल भंडार को नष्ट किया जाए और प्रॉक्सी संगठनों पर नकेल कसी जाए। यदि ऐसा नहीं होता है, तो यह केवल मिडिल ईस्ट में एक और बड़े युद्ध का काउंटडाउन साबित होगा। अमेरिका का यह कदम इजरायल के लिए एक बड़ा रणनीतिक झटका है।

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