वर्तमान में पूरी दुनिया का ध्यान मध्य पूर्व के घटनाक्रमों पर केंद्रित है। हर कोई यह देख रहा है कि इजराइल किस तरह लेबनान और ईरान के साथ एक भीषण और लंबे समय से चल रहे संघर्ष का सामना कर रहा है। निरंतर होने वाले हवाई हमलों और मिसाइलों की गूंज के बीच, अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि इजराइल अपनी पूरी सैन्य और कूटनीतिक शक्ति केवल अपनी सीमाओं की सुरक्षा में लगा रहा है। यह सोचना स्वाभाविक भी है कि युद्ध जैसी स्थिति में किसी भी देश का पूरा ध्यान सिर्फ मोर्चे पर होगा। लेकिन इसी हलचल के बीच, पश्चिम एशिया से हजारों मील दूर भारत के तमिलनाडु में एक ऐसी गुप्त गतिविधि हो रही है, जिसने वैश्विक रक्षा विशेषज्ञों को हैरान कर दिया है।
बिना किसी शोर-शराबे के, इजराइल ने भारत में एक ऐसा रणनीतिक कदम उठाया है जिसने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के दिग्गजों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। एक तरफ जहां इजराइल चौतरफा संघर्ष झेल रहा है, वहीं दूसरी ओर उसने भारत के साथ मिलकर एक ऐसी विशाल सैन्य परियोजना की नींव रखी है, जिसकी भनक अमेरिका या चीन की खुफिया एजेंसियों को भी नहीं लग पाई। जब दुनिया को लगा कि इजराइल सिर्फ युद्ध में उलझा है, ठीक उसी समय वह तमिलनाडु में एक ऐसी सुपर-एडवांस्ड रडार मैन्युफैक्चरिंग लाइन तैयार कर रहा था, जो भविष्य के युद्धों की दिशा बदल देगी। इस कदम ने दो बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं: आखिर इस संकट के बीच इजराइल भारत में क्या बना रहा है, और इस समझौते से चीन-पाकिस्तान की रणनीतियां कैसे विफल होंगी?
इन सामरिक सवालों का जवाब तमिलनाडु के कृष्णागिरी जिले के शूलागिरी इंडस्ट्रियल एरिया में छिपा है। यहां इजराइल की प्रमुख रक्षा कंपनी ‘इजराइल एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज’ (IAI) ने अपनी इकाई ‘एलाटा सिस्टम्स’ के माध्यम से भारत की ‘डीसीएक्स सिस्टम्स’ के साथ साझेदारी की है। ये दोनों कंपनियां मिलकर ‘ईएलटीएक्स सिस्टम्स प्राइवेट लिमिटेड’ नाम से एक शक्तिशाली जॉइंट वेंचर चला रही हैं। यह कोई साधारण कारखाना नहीं है, बल्कि यह भारत-इजराइल रक्षा साझेदारी का वह केंद्र है जहां दुनिया के सबसे सटीक और आधुनिक रडार सिस्टम बनाए जाएंगे। इस प्लांट का काम बेहद तेज गति से चल रहा है और अप्रैल 2027 तक इसे पूरी तरह क्रियान्वित करने का लक्ष्य है। यहां बहुत जल्द अत्याधुनिक हवाई और जमीनी रडार प्रणालियों की असेंबली और टेस्टिंग शुरू हो जाएगी।
इस परियोजना की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत अब केवल एक खरीदार नहीं रह गया है। दशकों तक भारत को रक्षा उपकरणों के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ता था और छोटी मरम्मत के लिए भी विदेशी इंजीनियरों की मदद लेनी पड़ती थी। लेकिन अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान के तहत खेल बदल गया है। इजराइल अब केवल रडार बेचेगा नहीं, बल्कि अपनी गुप्त और महत्वपूर्ण तकनीक का शत-प्रतिशत हस्तांतरण (Technology Transfer) भारत को कर रहा है। इसका अर्थ है कि ये विश्व स्तरीय रडार अब भारतीय मिट्टी पर भारतीय इंजीनियरों द्वारा बनाए जाएंगे, और भविष्य में इनके अपडेट और रखरखाव का काम भी स्वदेशी वैज्ञानिक ही करेंगे।
रक्षा विज्ञान में रडार को सेना की ‘आंख और कान’ कहा जाता है। आज की हाई-टेक जंग में जीत इस बात पर निर्भर करती है कि आप दुश्मन को कितनी जल्दी पहचान लेते हैं। तमिलनाडु के इस प्लांट में बनने वाले रडार भारतीय थल सेना, नौसेना और वायुसेना की आधुनिक जरूरतों को पूरा करेंगे। सीमाओं पर घुसपैठ रोकने के लिए एक अभेद्य सर्विलांस नेटवर्क की आवश्यकता होती है। अक्सर खराब मौसम या ऊंचे पहाड़ों के कारण पारंपरिक कैमरे काम नहीं कर पाते, लेकिन इजराइल की एलाटा तकनीक इन ‘ब्लाइंड स्पॉट्स’ को खत्म कर देगी। दुश्मन का कोई भी विमान या मिसाइल जैसे ही हमारी सीमा की ओर बढ़ेगी, ये सिस्टम उसे सैकड़ों किलोमीटर दूर से ही ट्रैक कर नष्ट करने की सटीक सूचना प्रदान करेंगे।
हाल के वर्षों में भारत के लिए ‘ड्रोन’ एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। रूस-यूक्रेन युद्ध और मध्य पूर्व के संकट ने दिखाया है कि सस्ते ड्रोन भी बड़े सैन्य ठिकानों को तबाह कर सकते हैं। पाकिस्तान की ओर से पंजाब और जम्मू-कश्मीर की सीमाओं पर नशीले पदार्थों और हथियारों की तस्करी के लिए छोटे ड्रोन्स का उपयोग एक बड़ा सिरदर्द बना हुआ है। पुराने रडार इन छोटे ड्रोन्स को पकड़ने में विफल रहते हैं। लेकिन शूलागिरी के इस प्लांट में ऐसे एडवांस्ड काउंटर-ड्रोन रडार तैयार किए जाएंगे, जो इन छोटे और रडार से बचने वाले ड्रोन्स को भी हवा में ही पहचान लेंगे। यह तकनीक भारतीय सीमाओं को एक सुरक्षित किले में तब्दील कर देगी।
इजराइल द्वारा भारत के साथ इस साझेदारी के लिए यह समय चुनना एक गहरी कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा है। इजराइल ऐसे शत्रुओं से घिरा है जो उसके अस्तित्व को मिटाना चाहते हैं। बारूदी माहौल में किसी भी बड़े रक्षा उद्योग को सुरक्षित रखना और निरंतर उत्पादन जारी रखना चुनौतीपूर्ण होता है। इसलिए, इजराइली रणनीतिकारों को अपनी ग्लोबल सप्लाई चेन को सुरक्षित रखने के लिए एक भरोसेमंद और सुरक्षित ठिकाने की तलाश थी।
भारत से बेहतर और सुरक्षित विकल्प उनके लिए कोई और नहीं हो सकता। भारत के पास विशाल संसाधन, कुशल इंजीनियर और एक मजबूत औद्योगिक ढांचा है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि दोनों देशों के बीच एक अटूट ऐतिहासिक विश्वास है। इजराइल भारत को केवल एक बाजार के रूप में नहीं देख रहा, बल्कि वह इसे अपनी रक्षा उत्पादन क्षमता का एक सुरक्षित और स्थायी बैकअप हब बना रहा है।
इस कदम से वाशिंगटन और बीजिंग में हलचल मचना तय है। अमेरिका हमेशा अपनी कोर टेक्नोलॉजी साझा करने में हिचकिचाता है और नियंत्रण अपने पास रखना चाहता है। वहीं, रूस अपने स्वयं के युद्ध और प्रतिबंधों के कारण स्पेयर पार्ट्स की आपूर्ति में समस्याओं का सामना कर रहा है। इस स्थिति का लाभ उठाकर चीन लगातार पाकिस्तान को आधुनिक हथियार देकर भारत पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है।
ऐसे समय में इजराइल द्वारा बिना किसी शर्त के यह सर्वोच्च तकनीक भारत को सौंपना बहुत मायने रखता है। यह सौदा दर्शाता है कि भारत-इजराइल संबंध कागजी समझौतों से कहीं अधिक गहरे हैं। इतिहास गवाह है कि 1999 के करगिल युद्ध के दौरान भी जब दुनिया ने पीठ फेर ली थी, तब इजराइल ने भारत की सैन्य मदद की थी। तमिलनाडु की यह रडार फैक्ट्री उसी भरोसे का आधुनिक प्रतीक है।
IAI केवल एक फैक्ट्री नहीं लगा रही, बल्कि भारत में रक्षा निर्माण का एक व्यापक इकोसिस्टम तैयार कर रही है। उन्होंने ‘एयरोस्पेस सर्विसेज इंडिया’ नाम से घरेलू कंपनी शुरू की है और आईआईटी दिल्ली के साथ डीप-टेक रिसर्च के लिए समझौता किया है। हैदराबाद में रडार हार्डवेयर के लिए मेंटेनेंस और रिपेयर (MRO) सुविधा भी चालू हो चुकी है। यानी रिसर्च दिल्ली में, मेंटेनेंस हैदराबाद में और निर्माण तमिलनाडु में होगा। यह भारत को ग्लोबल डिफेंस हब बनाने की एक सुविचारित रणनीति है।
इस मेगा प्रोजेक्ट से तमिलनाडु के हजारों युवाओं को रोजगार मिलेगा और कई छोटे उद्योगों (MSMEs) को बढ़ावा मिलेगा। यह भारत के ‘डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर’ को मजबूती देगा। सबसे बड़ी बात यह है कि भविष्य में भारत इन उन्नत रडार प्रणालियों को अपने मित्र देशों को निर्यात भी कर सकेगा, जो महंगे पश्चिमी हथियार नहीं खरीद सकते।
आज अफ्रीका और दक्षिण पूर्व एशिया के कई देश चीन के अविश्वसनीय हथियारों से तंग आ चुके हैं और भारत की ओर एक भरोसेमंद विकल्प के रूप में देख रहे हैं। जब ‘मेड इन इंडिया’ रडार दुनिया भर की सीमाओं की रक्षा करेंगे, तब वैश्विक मंच पर भारत की शक्ति का नया उदय होगा। शूलागिरी से आत्मनिर्भरता का जो शंखनाद हुआ है, उसने स्पष्ट कर दिया है कि भारत अब अपनी सुरक्षा के लिए किसी भी हद तक जाने और अपनी शर्तों पर दुनिया के साथ चलने के लिए तैयार है।

