आज ग्लोबल शिपिंग इंडस्ट्री में एक ऐसा ऐतिहासिक बदलाव दस्तक दे रहा है, जिसने सिंगापुर से लेकर बीजिंग तक के नीति निर्माताओं को सोचने पर मजबूर कर दिया है। समुद्री व्यापार का नक्शा जल्द ही पूरी तरह बदलने वाला है। थाईलैंड ने 30 बिलियन डॉलर के अपने महात्वाकांक्षी ‘लैंड ब्रिज’ प्रोजेक्ट पर काम शुरू कर दिया है, जो अब महज एक कागजी योजना नहीं रह गई है। यह प्रोजेक्ट मलक्का जलडमरूमध्य (Malacca Strait) की दशकों पुरानी मोनोपॉली को खत्म करने की क्षमता रखता है। लेकिन इस वैश्विक उथल-पुथल के बीच सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि थाईलैंड का यह मास्टरस्ट्रोक भारत के ‘ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट’ के लिए एक बड़ा रणनीतिक बूस्टर साबित होगा। भारत और थाईलैंड मिलकर हिंद महासागर में एक ऐसा कॉरिडोर बना रहे हैं, जिसका मुकाबला करना किसी भी महाशक्ति के लिए आसान नहीं होगा। आखिर रानोंग पोर्ट और ग्रेट निकोबार के बीच वह क्या कनेक्शन है जो भारत को एशिया का नया ट्रेड गेमचेंजर बना देगा?
मलक्का स्ट्रेट की मोनोपॉली और वैश्विक संकट
इस मास्टरप्लान को समझने के लिए दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्ग की हकीकत को जानना जरूरी है। वर्तमान में चीन, जापान या दक्षिण कोरिया के जहाजों को यूरोप या मिडिल ईस्ट जाने के लिए मलक्का जलडमरूमध्य का उपयोग करना पड़ता है। यह इंडोनेशिया, मलेशिया और सिंगापुर के बीच स्थित एक संकरा समुद्री रास्ता है। इसकी लंबाई करीब 900 किलोमीटर है, लेकिन कुछ जगहों पर यह महज 2.7 किलोमीटर चौड़ा रह जाता है। दुनिया का लगभग 40% समुद्री व्यापार इसी संकरे रास्ते पर निर्भर है, जहां हर साल 80 हजार से ज्यादा जहाज गुजरते हैं।
इस समस्या को एक सरल उदाहरण से समझें: जैसे एक संकरे हाईवे पर पूरे शहर का ट्रैफिक आ जाए, जिससे जाम लग जाता है और ईंधन की खपत बढ़ जाती है। मलक्का स्ट्रेट का हाल भी कुछ ऐसा ही है। भारी ट्रैफिक के कारण जहाजों को लंबा इंतजार करना पड़ता है, जिससे समय की बर्बादी और माल ढुलाई की लागत में भारी बढ़ोतरी होती है। यह रास्ता अपनी क्षमता की आखिरी सीमा तक पहुंच चुका है, जो ग्लोबल सप्लाई चेन के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।
थाईलैंड का 30 बिलियन डॉलर का विजनरी प्रोजेक्ट
यहीं पर थाईलैंड के प्रधानमंत्री अनुतिन चरनविराकुल का विजनरी प्लान सामने आता है। थाईलैंड ने इस वैश्विक जाम का एक स्मार्ट समाधान निकाला है। थाईलैंड अपने भूगोल का लाभ उठाते हुए दोनों समुद्री किनारों पर विशाल ‘डीप सी पोर्ट’ बनाने जा रहा है। पूर्वी छोर पर गल्फ ऑफ थाईलैंड में ‘चुमपोन’ पोर्ट और पश्चिमी छोर पर अंडमान सागर की ओर ‘रानोंग’ पोर्ट का निर्माण किया जाएगा।
पहले थाईलैंड ने पनामा या स्वेज नहर की तर्ज पर ‘क्रॉ कैनाल’ बनाने पर विचार किया था। लेकिन पर्यावरण के नुकसान और अत्यधिक लागत के कारण उस विचार को त्याग दिया गया। इसकी जगह ‘लैंड ब्रिज’ मॉडल को अपनाया गया, जो अधिक व्यावहारिक और सुरक्षित है।
लॉजिस्टिक्स का कमाल: 14 दिनों की सीधी बचत
चुमपोन और रानोंग के बीच की जमीनी दूरी लगभग 90 किलोमीटर है। थाईलैंड सरकार इन दोनों पोर्ट्स को जोड़ने के लिए एक हाई-स्पीड रेलवे लाइन, छह लेन का एक्सप्रेसवे और तेल-गैस पाइपलाइन का एक डेडिकेटेड कॉरिडोर बना रही है। अब जहाजों को मलक्का स्ट्रेट का चक्कर लगाने की जरूरत नहीं होगी।
इसकी प्रक्रिया बहुत तेज होगी। प्रशांत महासागर से आने वाले जहाज चुमपोन पोर्ट पर माल उतारेंगे, जिसे ऑटोमैटिक क्रेनों के जरिए ट्रेनों और ट्रकों पर लोड किया जाएगा। महज कुछ घंटों में यह माल रानोंग पोर्ट पहुंचेगा, जहां से दूसरे जहाज उसे लेकर भारत, यूरोप या मिडिल ईस्ट के लिए रवाना हो जाएंगे।
विशेषज्ञों के अनुसार, इससे माल ढुलाई की लागत 30% कम हो जाएगी और सबसे बड़ी बात यह कि यात्रा का समय 14 दिन कम हो जाएगा। शिपिंग इंडस्ट्री में 14 दिन बचना एक बहुत बड़ी आर्थिक जीत है। इससे ईंधन बचेगा, कंपनियों का मुनाफा बढ़ेगा और ग्लोबल मार्केट में उत्पादों की कीमतें कम होंगी। यह कॉरिडोर वैश्विक महंगाई को नियंत्रित करने का एक शक्तिशाली उपकरण बनेगा।
भारत का ‘ग्रेट निकोबार’ मेगा प्रोजेक्ट
इस जियो-पॉलिटिकल गेम का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा भारत है। थाईलैंड के इस प्रोजेक्ट का सबसे ज्यादा फायदा भारत को होगा। भारत सरकार अंडमान-निकोबार में ‘ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट’ पर तेजी से काम कर रही है, जहां गैलाथिया बे में एक वर्ल्ड-क्लास ‘इंटरनेशनल ट्रांसशिपमेंट पोर्ट’ बनाया जा रहा है।
आज भारत का अधिकांश माल कोलंबो या सिंगापुर के जरिए ट्रांसशिप होता है, जिससे भारत को भारी फीस देनी पड़ती है। ग्रेट निकोबार में अपना हब बनने के बाद भारत न केवल अरबों डॉलर बचाएगा, बल्कि दूसरे देशों के जहाजों को हैंडल करके भारी कमाई भी करेगा।
रानोंग और ग्रेट निकोबार: नया समुद्री सिल्क रूट
थाईलैंड का लैंड ब्रिज और भारत का ग्रेट निकोबार पोर्ट एक-दूसरे के पूरक बनेंगे। अंडमान-निकोबार के लेफ्टिनेंट गवर्नर ने भी माना है कि थाईलैंड का यह प्रोजेक्ट इस द्वीप समूह के रणनीतिक महत्व को कई गुना बढ़ा देगा।
थाईलैंड का रानोंग पोर्ट सीधे अंडमान सागर में भारत की समुद्री सीमा के पास खुलता है। रानोंग से निकलने वाले जहाजों के लिए भारत का ग्रेट निकोबार पोर्ट सबसे नजदीकी और सुरक्षित पड़ाव होगा।
थाईलैंड की रणनीति इस बंदरगाह को भारत के ‘सागरमाला प्रोजेक्ट’ से जोड़ने की है। इससे अंडमान सागर में एक सुपरफास्ट समुद्री हाईवे बन जाएगा, जो वैश्विक व्यापार के लिए सबसे तार्किक रास्ता होगा।
भारत और थाईलैंड दोनों ‘बिम्सटेक’ के सदस्य हैं। थाईलैंड अपनी ‘लुक वेस्ट’ नीति के तहत भारत के विशाल बाजार का लाभ उठाना चाहता है। वह जानता है कि बिना भारतीय कार्गो के उसका लैंड ब्रिज प्रोजेक्ट सफल नहीं हो सकता।
इस कॉरिडोर से जापान और दक्षिण कोरिया का माल सीधे भारत के पूर्वी तटों (कोलकाता, चेन्नई, विशाखापट्टनम) तक पहुंचेगा। इससे भारतीय व्यापारियों की लागत घटेगी और मुनाफा बढ़ेगा। तटीय शहरों में नए इंडस्ट्रियल हब और वेयरहाउस बनेंगे, जिससे लाखों रोजगार पैदा होंगे। यह भारत के एक्सपोर्ट को दोगुना करने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम होगा।
जियोपॉलिटिक्स: हिंद महासागर में भारत का दबदबा
रणनीतिक रूप से यह प्रोजेक्ट चीन के ‘मलक्का डिलेमा’ को और बढ़ा देगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि थाईलैंड चीन के बजाय भारत और बिम्सटेक देशों के साथ मिलकर काम करता है, तो हिंद महासागर में भारत की स्थिति अजय हो जाएगी।
चीन अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए मलक्का रूट पर निर्भर है। थाईलैंड के लैंड ब्रिज और भारत के ग्रेट निकोबार के जुगलबंदी से समुद्र का नियंत्रण एक सुरक्षित ‘बैलेंस ऑफ पावर’ की तरफ शिफ्ट होगा, जहां भारत एक निर्विवाद लीडर की भूमिका में होगा। यह 21वीं सदी के उस नए भारत की तस्वीर है, जो ग्लोबल ट्रेड की शर्तें तय करने के लिए तैयार है।

