वैश्विक राजनीति के पटल पर जब महाशक्तियां आपस में उलझी हुई हैं, तब भारत ने दुनिया की परवाह किए बिना अपनी संप्रभुता और आर्थिक कौशल का ऐसा परिचय दिया है, जिसने वाशिंगटन से लेकर रियाद तक खलबली मचा दी है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते टकराव ने दुनिया भर की ऊर्जा आपूर्ति को खतरे में डाल दिया है। मध्य पूर्व के सुलगते हालातों और डोनल्ड ट्रंप प्रशासन के एक निर्णायक फैसले से ठीक पहले, भारत ने एक ऐसा दांव चला जिसने वैश्विक बाजार के सारे पुराने समीकरणों को ध्वस्त कर दिया है। जब ग्लोबल सप्लाई चैन संकट में थी, तब भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए रूस से रिकॉर्ड मात्रा में कच्चा तेल खरीदकर एक अभेद्य सुरक्षा कवच तैयार कर लिया है।
आज पूरी दुनिया चकित है और विदेशी थिंक टैंक इस बात पर मंथन कर रहे हैं कि आखिर अमेरिका-ईरान युद्ध जैसे हालात के बीच रूस, भारत का सबसे बड़ा ऊर्जा भागीदार कैसे बन गया? ट्रंप प्रशासन के नए नियमों के लागू होने से पहले ही भारत ने रूस के साथ तेल आयात का कौन सा ऐतिहासिक कीर्तिमान स्थापित किया? और जब होर्मुज जलडमरूमध्य जैसा महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग बंद होने की कगार पर था, तब भारत ने रूस पर इतना बड़ा भरोसा क्यों दिखाया? इन सभी सवालों का उत्तर भारत की उस रणनीतिक दूरदर्शिता में है, जो राष्ट्रहित को ही सर्वोपरि मानती है।
ग्लोबल डेटा एनालिटिक्स कंपनी ‘Kpler’ के ताजा आंकड़े बताते हैं कि भारत ने कितनी चतुराई से अपना मास्टरस्ट्रोक खेला है। इस साल जून में रूस से भारत का कच्चा तेल आयात अपने सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुँच गया। जून के दौरान यह आयात औसतन 2.35 मिलियन बैरल प्रति दिन रहने का अनुमान लगाया गया। वहीं, 19 जून तक के आंकड़ों ने पश्चिमी देशों को हैरान कर दिया, जब यह औसत 2.66 मिलियन बैरल प्रति दिन तक जा पहुँचा। इसकी तुलना में मई 2023 में अधिकतम 2.15 मिलियन बैरल प्रति दिन की खरीद हुई थी। यह उछाल सामान्य नहीं है, बल्कि भारतीय रिफाइनरियों द्वारा किसी बड़ी वैश्विक आपात स्थिति को भांपते हुए ली गई एक सोची-समझी जोखिम थी।
इसका सीधा संबंध अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ती तल्खी से है, जिसका सबसे ज्यादा असर होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर पड़ा। होर्मुज़ को आप समुद्र का वह व्यस्त हाईवे मान सकते हैं जहाँ से दुनिया का सबसे ज्यादा तेल गुजरता है। ईरान-अमेरिका तनाव के कारण यह मार्ग लगभग बंद होने की स्थिति में आ गया, जिससे सप्लाई ठप होने का डर पैदा हुआ। इसी कारण सऊदी अरब जैसे पारंपरिक सप्लायर्स से भारत का आयात 2013 के बाद सबसे कम हो गया। इस संभावित संकट को देखते हुए भारत ने ‘स्पॉट परचेज’ (तत्काल खरीद) की नीति अपनाई और तेजी से रूस की ओर रुख किया, जिससे देश में किसी भी बड़े आर्थिक संकट को आने से पहले ही रोक दिया गया।
इसी मोड़ पर डोनल्ड ट्रंप प्रशासन की भूमिका अहम हो जाती है। रूसी तेल पर अमेरिका द्वारा दी गई तीन महीने की विशेष छूट अब समाप्त हो गई है और प्रशासन ने इसे आगे बढ़ाने से मना कर दिया है। अमेरिका का मानना है कि ईरान के साथ हुए अंतरिम समझौते से मध्य पूर्व में स्थिरता आएगी। हालांकि, भारत ने अपनी रणनीति को अमेरिका की इस छूट के भरोसे नहीं छोड़ा। भारतीय रिफाइनरियों ने स्पष्ट कर दिया है कि उनके लिए देश का आर्थिक हित सबसे ऊपर है। भारी डिस्काउंट के कारण रूसी तेल आज भी भारत के लिए वैश्विक बाजार की तुलना में सबसे सस्ता और टिकाऊ विकल्प बना हुआ है।
इस कूटनीतिक बदलाव का सीधा प्रभाव आम आदमी की जेब पर पड़ता है। जहाँ दुनिया भर में ऊर्जा संकट के कारण महंगाई बढ़ रही है, वहीं भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें काफी हद तक नियंत्रण में हैं। इसका श्रेय भारत की इसी स्वतंत्र खरीद नीति को जाता है। रूस से मिलने वाला सस्ता तेल आयात बिल को कम करता है और हमारे विदेशी मुद्रा भंडार को सुरक्षित रखता है। यदि भविष्य में मध्य पूर्व में कोई और बड़ा संकट आता है, तो रूस भारत के लिए एक मजबूत सुरक्षा दीवार की तरह खड़ा रहेगा। भारत ने अब यह साबित कर दिया है कि वह किसी एक क्षेत्र के दबाव में आने वाला नहीं है।
इस रिकॉर्ड खरीद ने खाड़ी देशों के सामने भारत की मोलभाव करने की शक्ति (Bargaining Power) को काफी बढ़ा दिया है। एक समय था जब हम पूरी तरह मध्य पूर्व पर निर्भर थे और उनकी शर्तों पर तेल खरीदते थे। लेकिन अब भारतीय रिफाइनरियों ने अपने ‘ऑपरेशनल मिक्स’ को बदल दिया है। वे अब वहां से व्यापार करती हैं जहाँ से उन्हें आर्थिक लाभ मिलता है। रूस अब भारत के लिए केवल रक्षा उपकरण प्रदाता नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था की लाइफलाइन बन चुका है। भारत के इस कदम ने पश्चिमी देशों की चिंताओं को बढ़ा दिया है क्योंकि रूस के साथ यह साझेदारी अब और भी गहरी हो चुकी है।
रूस से तेल मंगाने के बाद भारतीय रिफाइनरियों का आत्मविश्वास बढ़ा है। आज भारत किसी के दबाव में नहीं, बल्कि अपनी शर्तों पर फैसले लेता है। दिलचस्प बात यह है कि भारत इस रूसी कच्चे तेल को रिफाइन करके वापस यूरोप और अन्य बाजारों में निर्यात कर रहा है, जिससे भारी मुनाफा कमाया जा रहा है। इस चक्र ने भारत को एक साधारण उपभोक्ता से ‘ग्लोबल एनर्जी प्लेयर’ बना दिया है। अमेरिका की पाबंदियों के बावजूद भारत का रूस के साथ व्यापार जारी रखना यह दर्शाता है कि भारत की विदेश नीति अब स्वायत्त और राष्ट्र-केंद्रित है।
यदि भारत ने यह रणनीतिक कदम नहीं उठाया होता, तो होर्मुज संकट के दौरान देश में तेल की भारी किल्लत हो सकती थी। पेट्रोल पंपों पर कतारें और महंगाई की मार आम जनता को परेशान कर सकती थी। लेकिन भारत की प्रो-एक्टिव रणनीति ने देश को सुरक्षित रखा। अब पारंपरिक तेल सप्लायर भी भारत को लुभाने के लिए अपने प्रीमियम चार्जेस कम कर रहे हैं। यह भारत की एक बड़ी रणनीतिक जीत है, जो दिखाती है कि वैश्विक मंच पर भारत अब खेल का हिस्सा नहीं, बल्कि खेल का नियम बनाने वाला बन गया है।
रूस के साथ यह ऊर्जा सहयोग भारत-रूस संबंधों को एक नए आयाम पर ले गया है। दशकों पुरानी दोस्ती अब केवल हथियारों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आर्थिक प्रगति की धुरी बन गई है। जब पूरा यूरोप अपनी ही नीतियों के कारण ऊर्जा संकट झेल रहा है, तब भारत अपनी बेहतरीन विदेश नीति से अपनी अर्थव्यवस्था को रफ्तार दे रहा है। भारत ने दुनिया को कड़ा संदेश दिया है कि जब बात 140 करोड़ लोगों के हितों की होगी, तो कोई भी वैश्विक दबाव काम नहीं आएगा। अमेरिका-ईरान तनाव के बीच भारत ने अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता को पूरी दुनिया के सामने सफलतापूर्वक सिद्ध किया है।

