इस्लामाबाद से लेकर रावलपिंडी तक इस वक्त खलबली मची हुई है और पाकिस्तानी सेना के जनरलों की रातों की नींद उड़ चुकी है। यह सब कुछ तब हुआ है जब अभी कुछ ही दिन पहले भारत ने इंसानियत का फर्ज निभाते हुए काबुल को जीवनरक्षक दवाइयों की एक बहुत बड़ी खेप भेजी थी। इसके ठीक बाद अफगानिस्तान की सत्ता पर बैठे हुक्मरानों ने सीमा पार करके पाकिस्तान के अंदर घुसकर ऐसा तगड़ा और सटीक प्रहार किया है, जिसकी गूंज इस वक्त पूरे दक्षिण एशिया में सुनाई दे रही है। जिन ठिकानों पर कभी खौफ फैलाने वाले उपद्रवी पनाह लेते थे और जहां बैठकर सीमा पार अशांति फैलाने का ब्लूप्रिंट तैयार होता था, आज उन्हीं जगहों पर आसमान से सीधा वार हुआ है। ड्रोन्स और हवाई हमलों की इस आंधी ने रावलपिंडी के जनरलों को साफ संदेश दे दिया है कि जो बोया है, वही काटना पड़ेगा। पाकिस्तान हमेशा से अपने पड़ोसियों के आंगन में आग लगाने की फितरत रखता आया है, लेकिन इस बार आग सीधे उसके अपने घर में लग चुकी है।
आखिर कैसे अफगानिस्तान ने पाकिस्तान के उस सो-कॉल्ड मजबूत एयर डिफेंस सिस्टम को पूरी तरह चकमा देकर उसके सबसे अहम ठिकानों को मलबे के ढेर में तब्दील कर दिया? क्या बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में हुए इन हालिया हमलों ने पाकिस्तानी सेना की खोखली हो चुकी ताकत की असली पोल खोलकर रख दी है? अगर काबुल के रक्षा मंत्रालय के दावे पूरी तरह सच हैं, तो क्या इस्लामाबाद अब एक ऐसे गहरे दलदल में फंस चुका है जहां से सुरक्षित निकलना उसके लिए नामुमकिन होगा?
रावलपिंडी का घमंड चूर: आसमान से बरसी मौत
इस पूरी घटना की शुरुआत कोई एक दिन में नहीं हुई। यह उन गिले-शिकवों और साजिशों का नतीजा है जो पिछले कई सालों से सीमा पर धीरे-धीरे सुलग रहे थे। पाकिस्तान के हुक्मरानों को हमेशा से यह गुमान था कि वे जब चाहेंगे, अपने पड़ोसी मुल्क की संप्रभुता को पैरों तले रौंदते हुए सीमा लांघकर आसमान से बम बरसा देंगे। रावलपिंडी के वातानुकूलित कमरों में बैठे जनरलों को लगता था कि उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता और वे पूरे इलाके के चौधरी हैं। पिछले कुछ समय से पाकिस्तान लगातार अंतरराष्ट्रीय कानूनों की धज्जियां उड़ाते हुए अफगानिस्तान के सीमाई प्रांतों में हवाई हमले कर रहा था। आपको याद होगा जब पाकिस्तानी विमानों ने सीमा पार करके एक अस्पताल पर भारी बमबारी की थी, जिसमें करीब 450 आम नागरिकों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी। उस वक्त पूरी दुनिया में एक अजीब सा सन्नाटा छा गया था। पश्चिमी देशों के मानवाधिकार के ठेकेदारों ने भी इस भयानक घटना पर पूरी तरह चुप्पी साध ली थी। लेकिन रावलपिंडी यह भूल गया कि यह खामोशी किसी बड़े तूफान से पहले की शांति थी। काबुल ने उसी दिन अपने जहन में बदला लेने की तारीख तय कर ली थी।
पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आया और उसने काबुल की इस मजबूरी या खामोशी को उसकी कमजोरी समझने की सबसे बड़ी भूल कर दी। पाकिस्तान ने फिर से सीमा पार के कुछ इलाकों पर हवाई हमले किए, जिसमें कम से कम 13 लोग मारे गए और उनमें 11 मासूम बच्चे शामिल थे। यह वो आखिरी गलती थी जिसने काबुल में बैठे नेतृत्व के सब्र का बांध पूरी तरह से तोड़ दिया। उन्होंने साफ कर दिया कि अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है और इस वार को खाली नहीं जाने दिया जाएगा। जवाब बिल्कुल उसी आक्रामक भाषा में दिया जाएगा जो रावलपिंडी के जनरलों को समझ में आती है। काबुल के मिलिट्री कमांडरों ने अपने नक्शे खोले और पाकिस्तान के उन ठिकानों पर लाल घेरे बना दिए, जहां से उनके खिलाफ लगातार साजिशें रची जा रही थीं।
चीन के ‘सुपर’ एयर डिफेंस की खुली पोल
रात के घने अंधेरे में अफगानिस्तान की वायुसेना ने अपना सबसे गुप्त और बड़ा ऑपरेशन शुरू किया। आसमान से मौत बनकर गिरे आधुनिक कामिकाजे ड्रोन्स, जो अपने टारगेट को हवा में ही लॉक करते हैं और सीधे जाकर उस पर ब्लास्ट कर देते हैं। निशाना बने पाकिस्तान के बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा के इलाके। आसमान से एक के बाद एक ड्रोन्स बरसे और करोड़ों डॉलर का पाकिस्तानी रडार सिस्टम सोता रह गया। चीन से मंगाए गए जिस आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम का पाकिस्तान दुनिया भर में डंका पीटता था, उसकी हवा निकल गई। चीनी रडार इन ड्रोन्स को ट्रैक करने में पूरी तरह नाकाम साबित हुए। जब तक रावलपिंडी के मिलिट्री हेडक्वार्टर में खतरे के सायरन बजते, तब तक ये कामिकाजे ड्रोन्स अपना काम तमाम करके पीछे सिर्फ तबाही और राख का ढेर छोड़ चुके थे। यह पाकिस्तान की हवाई सुरक्षा का अब तक का सबसे बड़ा फेलियर है, जिसने साबित कर दिया है कि पाकिस्तान का सुरक्षा तंत्र अंदर से पूरी तरह खोखला हो चुका है।
अफगानिस्तान के रक्षा मंत्रालय ने सीना ठोककर इस पूरी जवाबी कार्रवाई की जिम्मेदारी ली है। उन्होंने दुनिया को आधिकारिक तौर पर बताया कि उन्होंने उन दुश्मन इंटेलिजेंस ग्रुप्स के ऑपरेशनल बेस को पूरी तरह तबाह कर दिया है, जो उनके मुल्क के खिलाफ अशांति फैलाने की साजिशें रच रहे थे। ये वो खुफिया अड्डे थे जहां से लगातार आतंकी गतिविधियों का पूरा कंट्रोल रूम चलाया जाता था, पैसों की फंडिंग होती थी, हथियारों की सप्लाई चेन मेंटेन की जाती थी और सीमा पार घुसपैठ का ब्लूप्रिंट तैयार होता था। जिन जगहों पर सटीक स्ट्राइक की गई, उनके नाम सुनकर ही पाकिस्तानी जनरलों के पसीने छूट गए हैं। सबसे पहला टारगेट बना किला अब्दुल्ला डिस्ट्रिक्ट का गुलिस्तान इलाका, जिसे पाकिस्तानी सेना पूरी तरह से सुरक्षित और अपनी पहुंच में मानती थी।
नक्शे पर लाल घेरे: इन ठिकानों पर हुआ सटीक वार
इसके बाद बलूचिस्तान प्रांत के चगाई जिले के शकर आब जंगल गाड़ी इलाके में उन जॉइंट फैसिलिटीज को ध्वस्त किया गया, जिनका इस्तेमाल दुश्मन तत्व कर रहे थे। अब इस बात को बहुत गहराई से समझने की जरूरत है कि आखिर ये जॉइंट फैसिलिटीज क्या हैं और इन्हें कौन ऑपरेट कर रहा था? जो लोग सीमा पार साजिश रच रहे हैं, उन्हें पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई और वहां की सेना का खुला समर्थन मिलता रहा है। यह उनकी पुरानी स्टेट स्पॉन्सर्ड पॉलिसी का हिस्सा है, जिसके तहत वह हमेशा से हथियारबंद गुटों को पालता-पोषता आया है। ये जॉइंट फैसिलिटीज दरअसल वो सुरक्षित पनाहगाहें थीं, जहां आईएसआई के अधिकारी इन तत्वों के साथ बैठकर अगले हमलों की प्लानिंग करते थे। यही खेल वे दशकों से भारत के खिलाफ भी खेलने की नाकाम कोशिश करते रहे हैं। लेकिन अब उनका यह दांव पूरी तरह से उल्टा पड़ चुका है और वही हथियार उनके अपने ही सीने पर तन गए हैं।
जो खाई पाकिस्तान ने दूसरों के लिए खोदी थी, आज वो खुद उसी में गिर पड़ा है। हमले का दायरा सिर्फ बलूचिस्तान तक सीमित नहीं रहा। खैबर इलाके के ओरकजई एजेंसी के कब्बर खेल इलाके में भी एक बहुत बड़े बेस को निशाना बनाया गया। खबर है कि इस जगह पर कई खास कमांडर अक्सर आते-जाते थे, जिन्हें इस ऑपरेशन में कामयाबी के साथ न्यूट्रलाइज किया गया है। ये वो लोग थे जो खुद को कानून की पकड़ से बाहर मानते थे और बड़े मजे से पाकिस्तान की मेहमाननवाजी का लुत्फ उठा रहे थे। शुरुआती मिलिट्री इंटेलिजेंस रिपोर्ट्स यही बताती हैं कि ऑपरेशन के दौरान पहले से तय किए गए सभी बड़े टारगेट्स पर बिल्कुल सटीक प्रहार किया गया और एक भी निशाना नहीं चूका।
डूरंड लाइन का वो नासूर, जिसने सुलगते अंगारे भड़काए
जब भी पाकिस्तान पर ऐसी कोई बड़ी मिलिट्री मुसीबत आती है, तो उनका एक ही रटा-रटाया ड्रामा शुरू हो जाता है, और वो है चीजों को सिरे से नकार देना। पाकिस्तान का सूचना मंत्रालय इस बार भी अपनी उसी पुरानी ड्यूटी पर लग गया। इस्लामाबाद की तरफ से बयान आया कि यह पूरी खबर ही मनगढ़ंत और फर्जी है। उनका दावा है कि ऐसा कोई हमला उनकी सीमा के अंदर हुआ ही नहीं है। उन्होंने यह जरूर माना कि कुछ ड्रोन उनकी सीमा की तरफ आए थे, लेकिन उनकी चौकस सेना ने उन्हें हवा में ही नष्ट कर दिया। ये बिल्कुल वैसा ही है जैसे बिल्ली आंखें बंद करके दूध पीती है और सोचती है कि उसे कोई नहीं देख रहा। इंटरनेट पर मौजूद सैटेलाइट तस्वीरें और वहां के स्थानीय लोगों द्वारा बनाए गए वीडियो इस सफेद झूठ की धज्जियां उड़ा रहे हैं। लोग आसमान से गिरती आग और धमाकों के गवाह बने हैं।
पाकिस्तान हमेशा इस डिनायल मोड में जीता है। कारगिल का वक्त याद कर लीजिए, तब भी इन्होंने अपने मारे गए सैनिकों के शव लेने से साफ इनकार कर दिया था। आज भी वही कहानी दोहराई जा रही है। लेकिन हकीकत यह है कि जब काबुल डंके की चोट पर कह रहा है कि उसने मल्टीपल स्ट्राइक्स किए हैं और ठिकानों के नाम तक पब्लिक कर रहा है, तो साफ है कि रावलपिंडी कुछ बहुत बड़ा छिपाने की नाकाम कोशिश कर रहा है। करोड़ों डॉलर खर्च करके जो सुरक्षा चक्र तैयार किया गया था, वह ताश के पत्तों की तरह ढह गया। इससे बड़ा मजाक किसी देश की सेना का क्या हो सकता है जो बात-बात पर न्यूक्लियर बटन दबाने की धमकियां देती हो। लेकिन इसके पीछे की असली वजह सिर्फ ये हवाई हमले नहीं हैं, बल्कि दोनों देशों के बीच खिंची वो विवादित लकीर है, जिसका नाम डूरंड लाइन है।
डूरंड लाइन, अंग्रेजों के जमाने की वो बाड़ है जिसे अफगानिस्तान ने कभी भी अंतरराष्ट्रीय सीमा के रूप में मान्यता नहीं दी। यह लकीर परिवारों को, कबीलों को और एक पूरी संस्कृति को बीच से काटती है। पाकिस्तान सालों से इस लाइन पर कंटीले तार लगाकर इसे पक्का करने की कोशिश कर रहा है। उसने इसके लिए करोड़ों डॉलर फूंके और कंक्रीट के खंभे खड़े किए, लेकिन अफगानी लड़ाके बार-बार उन तारों को उखाड़ फेंकते हैं। वे इस सीमा को एक कृत्रिम विभाजन मानते हैं। इसी सीमा विवाद को लेकर पिछले कुछ सालों में दोनों तरफ की सेनाएं कई बार आमने-सामने आ चुकी हैं, भारी गोलाबारी हुई है और दोनों पक्षों को बड़ा नुकसान हुआ है। रावलपिंडी को लगता था कि वह अपनी सैन्य ताकत के दम पर काबुल को डरा देगा, लेकिन एक ऐसी कौम को डराना नामुमकिन है जो दशकों से सिर्फ लड़ना ही जानती हो।
अमेरिकी हथियारों का ‘भस्मासुर’ और सुलगता बलूचिस्तान
इस आग में घी डालने का काम कर रहे हैं पाकिस्तान के अंदर के विद्रोही गुट, जिन्हें टीटीपी के नाम से जाना जाता है। टीटीपी ने तो सीधे तौर पर पाकिस्तान सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ रखा है और उनके कई इलाकों पर अपना समानांतर शासन चला रहे हैं। रावलपिंडी का आरोप रहता है कि काबुल इन विद्रोहियों को पनाह दे रहा है। लेकिन काबुल का सीधा सा जवाब है कि यह तुम्हारी अपनी अंदरूनी समस्या है। जिस सांप को पाकिस्तान ने इतने सालों तक पालकर बड़ा किया, आज वही उसे डस रहा है। पाकिस्तान की सेना इन विद्रोहियों से तो निपट नहीं पा रही और उलटा अपने पड़ोसियों से पंगा ले रही है। जरा पाकिस्तान की आज की आर्थिक हालत देखिए। देश पाई-पाई को मोहताज है, अवाम आटे की एक थैली और बिजली के बिलों के लिए सड़कों पर दंगे कर रही है। अर्थव्यवस्था पूरी तरह से वेंटिलेटर पर है और विदेशी मुद्रा भंडार खत्म होने की कगार पर है। ऐसे में अगर पश्चिमी सीमा पर एक फुल-स्केल जंग छिड़ जाती है, तो पाकिस्तान की सेना उसका खर्च कहां से उठाएगी? ड्रोन्स से हमला करना सस्ता है, लेकिन उनसे बचने के लिए जो मिसाइलें चलाई जाती हैं, वो लाखों डॉलर की होती हैं। हर एक इंटरसेप्शन पाकिस्तान के खजाने पर भारी चोट कर रहा है।
अब एक सवाल यह भी उठता है कि कल तक जिन लड़ाकों के हाथों में सिर्फ पुरानी राइफलें हुआ करती थीं, उनके पास इतने एडवांस ड्रोन और नाइट विजन उपकरण कहां से आ गए? इसका जवाब है साल 2021 में अमेरिका की अफगानिस्तान से जल्दबाजी में हुई वापसी। जाते-जाते अमेरिकी सेना अरबों डॉलर के अत्याधुनिक हथियार, बख्तरबंद गाड़ियां, ब्लैकहॉक हेलिकॉप्टर और ड्रोन्स वहीं छोड़ गई। उस वक्त पाकिस्तान बहुत खुश था, उसे लगा था कि स्ट्रैटेजिक डेप्थ के तहत ये सब उसके काम आएगा। लेकिन आज वही हाई-टेक हथियार पाकिस्तान के लिए काल बन गए हैं। अफगानी लड़ाके उन हथियारों को चलाने में माहिर हो चुके हैं। रात के अंधेरे में जब पाकिस्तानी सैनिक अपनी चौकियों पर कुछ देख नहीं पाते, तब उन पर नाइट विजन से लैस मौत टूट पड़ती है।
एक और बड़ा क्रिटिकल फैक्टर बलूचिस्तान का है। जिन ठिकानों पर काबुल ने स्ट्राइक की है, वो बलूचिस्तान में हैं। बलूच अवाम पहले ही पाकिस्तानी एस्टेब्लिशमेंट से सख्त नफरत करती है। वे सालों से अपने हक और अपनी आजादी की मांग कर रहे हैं, जिसके बदले उन्हें सिर्फ सेना की प्रताड़ना मिली है। अब जब बाहर से भी बलूचिस्तान के अंदर मौजूद सैन्य और खुफिया ठिकानों पर सीधे हमले हो रहे हैं, तो इससे वहां के स्थानीय विद्रोहियों को भी एक नया हौसला मिल रहा है। पाकिस्तान की सरकार अंदर और बाहर, दोनों तरफ से पूरी तरह घिर चुकी है। क्या यह पाकिस्तान के कई टुकड़ों में बंटने की एक नई शुरुआत है? क्या हम 1971 जैसे किसी बड़े भू-राजनैतिक बदलाव के मुहाने पर खड़े हैं? इस पूरे बवाल को देखकर चीन के माथे पर भी पसीना आ रहा है, जिसने सीपेक प्रोजेक्ट के तहत अरबों डॉलर का भारी निवेश कर रखा है। अगर पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच यह टकराव एक बड़े युद्ध में बदला, तो चीन का पूरा इन्वेस्टमेंट मिट्टी में मिल जाएगा।
एक तरफ तबाही का गंदा खेल, दूसरी तरफ भारत की इंसानियत
इस पूरी जियोपॉलिटिकल उथल-पुथल में भारत का रुख सबसे अलग, सबसे परिपक्व और सबसे मजबूत नजर आता है। एक तरफ पाकिस्तान है, जो अपने ही पड़ोसियों पर हमले करके तबाही का गंदा खेल खेल रहा है और पूरे इलाके की शांति भंग कर रहा है। वहीं दूसरी तरफ अपना देश भारत है, जो बिना किसी स्वार्थ के इंसानियत का धर्म निभा रहा है। हाल ही में भारत ने अफगानिस्तान को 5 टन जरूरी जीवनरक्षक दवाइयां भेजी हैं। इससे पहले भी भारत ने वहां टनों गेहूं, कोविड वैक्सीन और कई जरूरी चीजें भेजी हैं, ताकि वहां की आम अवाम भूखी न सोए। भारत ने वहां सलमा बांध बनाया, शिक्षा के लिए स्कूल खोले और वहां का शानदार संसद भवन भी भारत की ही देन है। भारत की पॉलिसी एकदम साफ है कि हुकूमत चाहे किसी की भी हो, सीमा पार की आम अवाम को तकलीफ नहीं होनी चाहिए। क्या पाकिस्तान कभी भारत की इस नेक नीयती और इस विशाल सोच की बराबरी करने की सोच भी सकता है?
ये स्थिति साफ दिखाती है कि एक मुल्क जीवन बचाने वाली दवाइयां भेजकर दिलों पर राज कर रहा है और उसकी सॉफ्ट पावर पूरी दुनिया में डंका बजा रही है, जबकि दूसरा मुल्क जो खुद कंगाली की कगार पर खड़ा है, वह अपनी कब्र खुद खोद रहा है। काबुल ने साफ कर दिया है कि अगर फिर से उनकी तरफ आंख उठाई गई, तो अगला प्रहार इससे भी ज्यादा घातक और विनाशकारी होगा। अब सहने का वक्त खत्म हो चुका है। अब सवाल ये उठता है कि क्या पाकिस्तान अपनी इस करारी बेइज्जती का घूंट चुपचाप पी लेगा या फिर कोई नया पलटवार करने की हिमाकत करेगा? क्या उसकी खस्ताहाल इकॉनमी उसे किसी नए एडवेंचर की इजाजत देगी? इस कहानी का अगला चैप्टर क्या होगा, और क्या दक्षिण एशिया का नक्शा हमेशा के लिए बदलने वाला है?

