रूस का मास्टर स्ट्रोक: अफगानिस्तान की पाकिस्तान पर भीषण एयरस्ट्राइक, रावलपिंडी में मची तबाही!

दशकों से अपने पड़ोसियों के साथ विश्वासघात करने वाले पाकिस्तान को आज उसी की भाषा में करारा जवाब मिला है। तालिबान ने पाकिस्तान की सीमा के भीतर घुसकर जो विध्वंसक कार्रवाई की है, उसने वैश्विक रक्षा विशेषज्ञों को चौंका दिया है। भारत के पुराने और भरोसेमंद मित्र रूस का इसमें एक बड़ा गुप्त कनेक्शन सामने आया है। रूस ने एक बार फिर भारत के साथ अपनी दोस्ती का मान रखा है और इस्लामाबाद में हुई इस तबाही की गूंज पूरी दुनिया में सुनाई दे रही है। पाकिस्तान की धरती पर तालिबान के इस बड़े सैन्य ऑपरेशन का असली मास्टरमाइंड मॉस्को माना जा रहा है। क्या पीओके, बलूचिस्तान और अब अफगानिस्तान के इन हमलों ने पाकिस्तान को ऐसे चक्रव्यूह में फंसा दिया है जहां से निकलना मुमकिन नहीं? और कैसे रूसी तकनीक ने तालिबान की सैन्य शक्ति को रातों-रात इतना घातक बना दिया कि रावलपिंडी के जनरल अब खौफ में हैं?

पूरी दुनिया में अस्थिरता और आतंक की नर्सरी के रूप में पहचाना जाने वाला पाकिस्तान आज उसी जाल में फंस चुका है जो उसने दूसरों के लिए बुना था। कल तक जो मुल्क भारत के जम्मू-कश्मीर और पंजाब में अशांति फैलाने की नापाक कोशिशें करता था, आज वह खुद चौतरफा संकट से घिरा है। इतिहास गवाह है कि मई 2025 में भारत के ‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने इनके ठिकानों को तहस-नहस कर पतन की शुरुआत कर दी थी। इसके बाद बलूचिस्तान में बीएलए की कार्रवाई और पीओके के विद्रोह ने पाकिस्तानी फौज के खोखलेपन को उजागर कर दिया। लेकिन अफगानिस्तान के इस ताजा और सबसे घातक हमले ने पाकिस्तान के पास अब आत्मसमर्पण के अलावा कोई विकल्प नहीं छोड़ा है।

अफगानिस्तान के रक्षा मंत्रालय के हालिया ऐलान ने पाकिस्तानी जनरलों की नींद हराम कर दी है। काबुल ने आधिकारिक तौर पर स्वीकार किया है कि उनकी वायुसेना ने अंतरराष्ट्रीय सीमा लांघकर पाकिस्तान के बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा प्रांतों में घुसकर आतंकी ठिकानों को जमींदोज कर दिया है। इस हाई-स्टेक्स ऑपरेशन को पाकिस्तानी सेना के सुरक्षित माने जाने वाले गढ़ों में अंजाम दिया गया। काबुल ने इन ठिकानों को ‘बुराई का केंद्र’ बताया है और दावा किया है कि यहां से अफगानिस्तान के खिलाफ साजिशें रची जा रही थीं। सबसे बड़ा रहस्य यह है कि जिस तालिबान के पास अपनी वायुसेना नहीं थी, उसने अचानक पाकिस्तान के अमेरिकी रक्षा तंत्र को हवा में मात कैसे दे दी?

इस्लामाबाद के लिए सबसे शर्मनाक बात यह है कि काबुल ने इसे दो देशों का युद्ध नहीं, बल्कि एक ‘सफाई अभियान’ करार देकर पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को धूल में मिला दिया है। तालिबान ने स्पष्ट संदेश दिया कि उनका लक्ष्य पाकिस्तान की जनता नहीं, बल्कि वहां पल रहा ISIS का वो ढांचा है जो पूरे क्षेत्र के लिए खतरा है। पाकिस्तान जो सालों से दुनिया की आंखों में धूल झोंकता आया था, आज उसी के दांव से उसे चित कर दिया गया है। लेकिन इस कहानी के पीछे की रणनीतिक सच्चाई और भी हैरान करने वाली है—आखिर तालिबान को इतना सटीक इंटेलिजेंस और घातक हथियार मिले कहां से?

इस एयरस्ट्राइक के बाद मिलिट्री एक्सपर्ट्स के बीच रूस के अत्याधुनिक ड्रोन्स और हथियारों के इस्तेमाल की चर्चा तेज हो गई है। इस पूरी घटना की क्रोनोलॉजी समझना जरूरी है। कुछ सप्ताह पहले ही अफगानिस्तान के रक्षा मंत्री मुल्ला मोहम्मद याकूब मुजाहिद ने मॉस्को का गुप्त दौरा किया था। वहां रूस के शीर्ष अधिकारियों के साथ एक रक्षा सहयोग समझौता हुआ था। याकूब ने इस दौरे को ऐतिहासिक सफलता बताया था, लेकिन बंद कमरों में हुई इस डील की भनक वाशिंगटन को भी नहीं लगी। क्या रूस ने अपने अचूक हथियारों की शक्ति काबुल के हाथों में दे दी है? पाकिस्तान के जलते हुए ठिकाने इसी सवाल का जवाब दे रहे हैं।

अंतरराष्ट्रीय खुफिया रिपोर्टों के मुताबिक, मॉस्को और काबुल के बीच एक बड़ा डिफेंस एग्रीमेंट हुआ है। इस समझौते के तहत अफगान सेना को रूस से आधुनिक सर्विलांस सिस्टम, एयर-डिफेंस रॉकेट और सटीक निशाना लगाने वाले टोही ड्रोन्स की खेप मिली है। रूसी विशेषज्ञ तालिबान के पुराने सोवियत हथियारों को भी अपग्रेड कर रहे हैं। रूस से लौटने के बाद रक्षा मंत्री याकूब ने पाकिस्तान को खुली चेतावनी दी थी कि अब इस्लामाबाद अफगान धरती की तरफ आंख उठाकर देखने की हिम्मत न करे। इस हमले में रूसी सैटेलाइट इनपुट का इस्तेमाल होना लगभग तय माना जा रहा है। पर सवाल है कि रूस पाकिस्तान पर इतना आगबबूला क्यों है?

रूस की इस नाराजगी के पीछे का मुख्य कारण ISIS-K का बढ़ता नेटवर्क है। यह गुट रूस की संप्रभुता के लिए बड़ा खतरा बन चुका है। 2024 में मॉस्को के कॉन्सर्ट हॉल पर हुए भीषण हमले ने रूस को हिला दिया था, जिसके बाद केजीबी ने इसके मास्टरमाइंड्स को खत्म करने की कसम खाई थी। इसी साझा दुश्मन से लड़ने के लिए रूस और तालिबान आज रणनीतिक रूप से साथ खड़े हैं। मॉस्को जानता है कि इस क्षेत्र से चरमपंथ खत्म करने के लिए तालिबान को मजबूत करना होगा और इन संगठनों की असली जड़ें कहां हैं, यह रूस से बेहतर कोई नहीं जानता। रूस ने अब पाकिस्तान को उसी के पाले हुए सांपों के जरिए खत्म करने का प्लान बना लिया है।

कूटनीति के मैदान में तालिबान ने पाकिस्तान को उसी की कड़वी दवा पिलाई है। बरसों से पाकिस्तान सीमा पार हमले कर इसे आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई बताता था, अब तालिबान ने भी वही किया। उन्होंने पाकिस्तान के रडार को विफल कर सीमा के भीतर हमला किया और बड़ी चतुराई से कह दिया कि हम केवल अपनी सुरक्षा के लिए आईएसआईएस के ठिकानों को उड़ा रहे थे। पाकिस्तान की स्थिति अब अत्यंत दयनीय हो गई है—वह न तो दुनिया के सामने रो सकता है और न ही इस सार्वजनिक बेइज्जती को सहन कर पा रहा है।

अस्थिरता का केंद्र रहे पाकिस्तान के लिए यह नया नहीं है कि कोई देश उस पर आतंकियों को पनाह देने का आरोप लगाए। 2011 में अमेरिकी नेवी सील्स द्वारा ओसामा को मार गिराना और 2019 की बालाकोट एयरस्ट्राइक इसके गवाह हैं। अब 2026 में अफगानिस्तान ने भी पाकिस्तान के अंदर घुसकर तबाही मचा दी है। क्या पाकिस्तान की धरती अब दुनिया की आधुनिक सेनाओं के लिए एक ‘ओपन प्रैक्टिस ग्राउंड’ बन गई है? भारत दशकों से पाकिस्तान के इस घिनौने चेहरे को बेनकाब करता रहा है, और अब दुनिया के अन्य देश भी वही कर रहे हैं।

भारत ने संयुक्त राष्ट्र में बार-बार साबित किया है कि लश्कर और जैश जैसे संगठन पाकिस्तानी सेना और आईएसआई की कठपुतली हैं। अब अफगानिस्तान ने भी पुख्ता सबूत दे दिए हैं कि पाकिस्तान का इस्तेमाल क्रॉस-बॉर्डर आतंक के लिए हो रहा है। इस सैन्य कार्रवाई से चीन और अमेरिका जैसे देशों की रणनीतियों पर विपरीत असर पड़ा है। चीन का अरबों डॉलर का सीपेक (CPEC) प्रोजेक्ट अब खतरे में है, जिससे बीजिंग में घबराहट है। वहीं, चीन अब पाकिस्तान से अपना निवेश समेटने की तैयारी में है क्योंकि सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं बची है।

पाकिस्तान के भीतर बढ़ती यह अशांति जनरल असीम मुनीर के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। पाकिस्तानी सेना का मनोबल टूट चुका है। जिस एयर डिफेंस पर वे सोशल मीडिया पर गर्व करते थे, उसकी पोल तालिबान ने खोल दी है। पाकिस्तान की जनता पहले से ही महंगाई और कंगाली से परेशान है और अब राष्ट्रीय सुरक्षा के मोर्चे पर भी उसे नाकामी ही मिल रही है। सेना अब तीन तरफ से घिरी है: पश्चिमी सीमा पर अफगानिस्तान, पूर्वी सीमा पर भारत और आंतरिक रूप से बलूच विद्रोही। पाकिस्तान का हर फ्रंट इस वक्त कमजोर पड़ चुका है।

यदि रूस और अफगानिस्तान की यह सैन्य निकटता बनी रही, तो दक्षिण एशिया के शक्ति संतुलन में ऐतिहासिक बदलाव आएगा। यह स्थिति भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक जीत है क्योंकि उसका मित्र रूस अब उस क्षेत्र में सक्रिय है जो कभी अमेरिका का प्रभाव क्षेत्र था। पाकिस्तान आज अपने ही बोए हुए कांटों की सजा भुगत रहा है। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ और अब अफगान एयरस्ट्राइक ने साबित कर दिया है कि आतंक का व्यापार करने वाले मुल्क का अंत भीषण ही होता है। यह सिर्फ एक हमला नहीं, बल्कि संदेश है कि जो दहशत फैलाएगा, उसे उसी की आग में जलना होगा।

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