म्यांमार में भारत का गुप्त दांव: ड्रैगन की घेराबंदी नाकाम, शी जिनपिंग की बढ़ी परेशानी

आखिर आधी रात के अंधेरे में भारत ने म्यांमार को ऐसा कौन सा गुप्त हथियार सौंपा, जिसे देखते ही बीजिंग के सत्ता गलियारों में खलबली मच गई? भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ (R&W) ने म्यांमार के जनरलों के सामने शी जिनपिंग का वो कौन सा ‘डर्टी सीक्रेट’ उजागर किया, जिसने रातों-रात पूरे खेल को ही पलट दिया? एक तरफ म्यांमार की ताकतवर सेना और दूसरी तरफ विद्रोही गुट—भारत ने बिना एक भी गोली चलाए चीन को उसके ही बैकयार्ड में कैसे मात दे दी?

8 जुलाई को दिल्ली में बंद दरवाजों के पीछे हुई उस हाई-लेवल मीटिंग की कहानी क्या है? भारतीय गृह मंत्रालय ने म्यांमार के सामने कौन सा ऐसा ‘ब्रह्मास्त्र’ रखा कि चीन का करीबी माना जाने वाला म्यांमार, भारत की सुरक्षा ढाल बनने को तैयार हो गया? म्यांमार के दुर्गम जंगलों में भारतीय सेना के किस खुफिया ऑपरेशन ने टाटमाडॉ (म्यांमार सेना) को भारत का मुरीद बना दिया? जिस चीन ने भारत को घेरने के लिए ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ का जाल बुना था, उसी के सबसे अहम मोहरे को भारत ने कैसे साध लिया? यह कोई साधारण खबर नहीं, बल्कि एक ऐसी रणनीतिक चाल है जिसने दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक मानचित्र को बदल दिया है। इसकी शुरुआत 7-8 जुलाई को नई दिल्ली में हुई एक गुप्त बैठक से हुई, जिसमें भारत के केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन और म्यांमार के उप-गृह मंत्री मेजर जनरल मिन थू शामिल थे।

दुनिया को लगा कि यह एक नियमित सुरक्षा वार्ता है, लेकिन अंदरखाने जो समझौता हो रहा था, उसकी गूंज बीजिंग तक सुनाई दे रही थी। म्यांमार ने भारत को एक ऐसा वचन दिया जिसकी कल्पना चीन या अमेरिका ने भी नहीं की थी। म्यांमार के जनरलों ने स्पष्ट कर दिया कि वे अपनी संप्रभु भूमि का एक इंच भी भारत विरोधी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल नहीं होने देंगे। पहली नजर में यह एक सामान्य पड़ोसी का वादा लग सकता है, लेकिन इसके पीछे की गहराई को समझना जरूरी है।

असली कहानी को समझने के लिए हमें चीन के उस ‘जियोपॉलिटिकल ट्रैप’ को देखना होगा जिसे ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ (मोतियों की माला) कहा जाता है। चीन पिछले दो दशकों से भारत को समुद्र और जमीन—दोनों तरफ से घेरने की कोशिश कर रहा था। पाकिस्तान का ग्वादर, नेपाल में राजनीतिक दखल, श्रीलंका का हंबनटोटा पोर्ट और हाल ही में बांग्लादेश के मोंगला पोर्ट के जरिए चीन ने भारत पर सैन्य दबाव बनाने की हर मुमकिन कोशिश की।

चीन को पूरा विश्वास था कि म्यांमार का ‘क्यौकप्यू’ डीप-सी पोर्ट उसकी मुट्ठी में है और वह भारत के संवेदनशील ‘चिकन नेक’ कॉरिडोर पर आसानी से नजर रख पाएगा। लेकिन भारत की ‘प्रैग्मैटिक डिप्लोमेसी’ (व्यावहारिक कूटनीति) ने इस पूरे पासे को पलट दिया। अचानक ऐसा क्या हुआ कि चीन का चंगुल कमजोर पड़ गया और म्यांमार भारत के पक्ष में खड़ा हो गया?

फरवरी 2021 में म्यांमार में हुए सैन्य तख्तापलट के बाद पश्चिमी देशों ने उस पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए और उसे वैश्विक मंच पर अलग-थलग कर दिया। चीन इसी मौके की तलाश में था ताकि म्यांमार को अपना ‘डमी स्टेट’ बना सके। उसे लगा कि म्यांमार के पास चीन की गोद में बैठने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है।

यहीं पर भारत ने अपना मास्टरस्ट्रोक खेला। पश्चिमी देशों के दबाव के बावजूद भारत ने म्यांमार से अपने कूटनीतिक संबंध नहीं तोड़े। भारतीय रणनीतिकार जानते थे कि म्यांमार को अकेला छोड़ने का मतलब उसे पूरी तरह चीन को सौंप देना होगा, जो भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आत्मघाती होता। भारत की इसी ‘नो-इंटरफेरेंस’ नीति ने म्यांमार के सैन्य नेतृत्व का भरोसा जीत लिया।

भारत ने म्यांमार को चीन के ‘डेट ट्रैप’ (कर्ज के जाल) से बचाने के लिए आर्थिक कूटनीति का सहारा लिया। म्यांमार को समझ आ गया था कि चीन का ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) विकास के नाम पर संप्रभुता छीनने का तरीका है, जैसा श्रीलंका के साथ हुआ। म्यांमार अपने बंदरगाहों का हश्र हंबनटोटा जैसा नहीं करना चाहता था।

भारत का दृष्टिकोण साझेदारी पर आधारित था। ‘कलादान मल्टी-मोडल प्रोजेक्ट’ के जरिए भारत ने म्यांमार के सितवे पोर्ट को विकसित किया और 1360 किलोमीटर लंबे त्रिपक्षीय राजमार्ग (India-Myanmar-Thailand) पर काम तेज किया। भारत ने म्यांमार को यह विश्वास दिलाया कि हमारी दिलचस्पी संसाधनों पर कब्जे में नहीं, बल्कि साझा विकास में है।

कूटनीति के अलावा असली खेल सैन्य शक्ति का था। चीन की म्यांमार में नीति हमेशा ‘डबल क्रॉस’ वाली रही है—एक तरफ वह सरकार को हथियार बेचता है, तो दूसरी तरफ ‘अराकान आर्मी’ जैसे विद्रोही गुटों को फंडिंग और आधुनिक हथियार मुहैया कराता है।

चीन चाहता था कि म्यांमार आंतरिक संघर्ष में उलझा रहे ताकि वह हमेशा बीजिंग पर निर्भर रहे। भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ ने चीन की इस दोहरी चाल के सबूत म्यांमार के सामने रख दिए। जैसे ही म्यांमार को इस धोखे का अहसास हुआ, भारत ने रक्षा सहयोग बढ़ा दिया। भारत ने रडार सिस्टम, आर्टिलरी गन और एडवांस सैन्य उपकरण मुहैया कराकर चीन की रक्षा एकाधिकार को तोड़ दिया। सिप्री (SIPRI) की रिपोर्ट भी इस बात की पुष्टि करती है कि भारत अब म्यांमार का सबसे विश्वसनीय सैन्य आपूर्तिकर्ता बन गया है।

सबसे बड़ा झटका तब लगा जब भारत ने म्यांमार को उसकी पहली पनडुब्बी ‘INS सिंधुवीर’ सौंप दी। जब यह पनडुब्बी म्यांमार की नौसेना में शामिल हुई, तो चीन का मैरीटाइम दबदबा खत्म हो गया। इसके साथ ही, 1643 किलोमीटर लंबी पोरस सीमा पर भारत और म्यांमार ने मिलकर ‘ऑपरेशन सनराइज’ जैसे अभियानों के जरिए उग्रवादियों का सफाया किया, जिसने दोनों सेनाओं के बीच गहरे विश्वास की नींव रखी।

8 जुलाई की बैठक में एक ‘इंटेलिजेंस शेयरिंग एग्रीमेंट’ साइन हुआ है, जो गेम चेंजर साबित होगा। भारत अब म्यांमार को रियल-टाइम सैटेलाइट इमेजरी और सर्विलांस डेटा देगा ताकि वह चीन समर्थित विद्रोहियों को कुचल सके। बदले में म्यांमार ने भारत विरोधी हर नेटवर्क को अपनी धरती से उखाड़ फेंकने की लिखित गारंटी दी है।

भारत द्वारा ‘फ्री मूवमेंट रिजीम’ (FMR) को खत्म करने और स्मार्ट फेंसिंग लगाने के फैसले को भी म्यांमार ने सकारात्मक रूप से लिया है। भारत की ‘ट्रैक-टू डिप्लोमेसी’ इतनी सटीक है कि वह म्यांमार की सेना के साथ-साथ उन स्थानीय गुटों से भी संपर्क बनाए हुए है जिनका रणनीतिक इलाकों पर प्रभाव है।

उदाहरण के लिए, रखाइन राज्य में ‘अराकान आर्मी’ का प्रभाव होने के बावजूद भारत के प्रोजेक्ट्स सुरक्षित हैं। यह भारत की साइलेंट डिप्लोमेसी का नतीजा है, जो चीन अपनी तमाम दौलत के बावजूद हासिल नहीं कर सका। म्यांमार के साथ यह साझेदारी इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के विस्तारवाद के ताबूत में आखिरी कील साबित होगी। भारत ने दिखा दिया है कि वह अब सिर्फ रक्षात्मक नहीं, बल्कि दुश्मन के घर में घुसकर उसकी चालें नाकाम करने वाला ‘न्यू इंडिया’ है।

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