पश्चिम बंगाल की धरती पर राजनीतिक परिवर्तन के साथ ही पड़ोसी देश बांग्लादेश की राजधानी ढाका में हलचल तेज हो गई है। बंगाल के प्रशासनिक ढांचे में हुए बड़े बदलावों ने सीधे तौर पर चटगांव और ढाका के सत्ता गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी संभालते ही शुभेंदु अधिकारी ने जिस आक्रामक तेवर के साथ ‘योगी मॉडल’ पर काम शुरू किया है, उसने सीमा पार के सभी रणनीतिक गणित को ध्वस्त कर दिया है। शासन के शुरुआती दिनों में ही लिए गए कठोर फैसलों ने अवैध घुसपैठियों के नेटवर्क की कमर तोड़ दी है। आज जहां पूरा बंगाल इस नई प्रशासनिक सख्ती का स्वागत कर रहा है, वहीं सीमा के दूसरी ओर बेचैनी और असुरक्षा का माहौल साफ देखा जा सकता है। इस ताबड़तोड़ एक्शन ने बांग्लादेशी हुकूमत को इस कदर विचलित कर दिया है कि वे अब भारत के खिलाफ जहर उगलने पर उतर आए हैं। जो देश कल तक कूटनीतिक मर्यादा में रहता था, वह अब सीधे टकराव और धमकियों की भाषा बोल रहा है। उत्तर प्रदेश की तर्ज पर बंगाल में लागू हुए कड़े शासन मॉडल ने उन ताकतों को बेनकाब कर दिया है जो दशकों से भारतीय संसाधनों पर कुंडली मारकर बैठी थीं। इसी बौखलाहट में बांग्लादेश अब जल विवाद को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहा है।
ढाका का आक्रोश और पानी पर सियासत
बंगाल में राष्ट्रवाद की लहर और प्रशासनिक कड़ाई के बीच आखिर क्यों ढाका और चटगांव के राजनेता तिलमिला उठे हैं? क्यों अचानक बांग्लादेशी नेतृत्व गंगा के जल, फरक्का बैराज और भारत विरोधी एजेंडे को हवा देने लगा है? वह देश जो कुछ समय पहले तक मित्रता का ढोंग कर रहा था, आज खुलेआम कह रहा है कि भविष्य के संबंध केवल गंगा जल समझौते की शर्तों पर निर्भर करेंगे। वास्तव में, यह विवाद केवल नदियों के पानी का नहीं है, बल्कि उस डर का है जो बंगाल में सत्ता बदलते ही बांग्लादेश के नीति-निर्धारकों के मन में घर कर गया है। घुसपैठ के खिलाफ जीरो टॉलरेंस, बीएसएफ की बढ़ती सक्रियता और सीमा पर फेंसिंग के काम में आई तेजी ने बांग्लादेश की चिंताएं बढ़ा दी हैं। हालात यह हैं कि भारत पर दबाव बनाने के लिए अब पानी के मुद्दे को ढाल बनाया जा रहा है।
दशकों तक जिस बंगाल को कुछ दलों ने घुसपैठ का सुरक्षित गलियारा बना रखा था, वही अब राष्ट्रीय सुरक्षा की सबसे मजबूत दीवार बन गया है। यही कारण है कि बांग्लादेश की कट्टरपंथी ताकतें और बीएनपी (BNP) जैसी पार्टियां भारत को अल्टीमेटम देने की जुर्रत कर रही हैं। बांग्लादेशी मंत्री मिर्ज़ा फखरुल इस्लाम आलमगीर ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि गंगा जल समझौता उनकी शर्तों पर नहीं हुआ, तो द्विपक्षीय संबंधों में भारी गिरावट आएगी।
1971 के बलिदान को भूलता बांग्लादेश
यह विडंबना ही है कि जिस भारत ने 1971 में अपने वीरों का रक्त बहाकर बांग्लादेश को आजादी दिलाई, आज उसी को आंखें दिखाई जा रही हैं। भारत ने हमेशा बड़े भाई का फर्ज निभाते हुए बिजली से लेकर व्यापार तक में बांग्लादेश की सहायता की, लेकिन बदले में आज उसे जल कूटनीति के जरिए ब्लैकमेल किया जा रहा है। बंगाल की नई सरकार ने साफ कर दिया है कि अब घुसपैठियों के राशन कार्ड और वोटर आईडी की सघन जांच होगी और देश विरोधी नेटवर्क को जड़ से मिटाया जाएगा। जब सीमा पार बैठे आकाओं को लगा कि उनका साम्राज्य ढह रहा है, तो उन्होंने अंतरराष्ट्रीय जल संधियों का राग अलापना शुरू कर दिया।
मिर्ज़ा फखरुल ने अपनी जनसभाओं में आरोप लगाया है कि भारत ने 54 साझा नदियों पर एकतरफा बांध बनाकर बांग्लादेश का जल प्रवाह बाधित किया है। उनका दावा है कि इससे बांग्लादेश का एक बड़ा हिस्सा बंजर हो जाएगा। वे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पीड़ित बनने का स्वांग रचकर भारत पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
फरक्का बैराज और 1996 की ऐतिहासिक संधि
इस विवाद की गहराई को समझने के लिए इतिहास के पन्नों को देखना जरूरी है। भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा जल के बंटवारे को लेकर 12 दिसंबर 1996 को एक 30 वर्षीय समझौता हुआ था, जिसकी मियाद 2026 में पूरी होने जा रही है। इसी संधि के आधार पर फरक्का बैराज से पानी का वितरण तय किया जाता है।
1975 में मुर्शिदाबाद में निर्मित फरक्का बैराज का मुख्य उद्देश्य हुगली नदी में जल स्तर बनाए रखना था ताकि कोलकाता बंदरगाह को सिल्ट (गाद) से मुक्त रखा जा सके। कोलकाता पोर्ट की उपयोगिता बनाए रखने के लिए यह प्रोजेक्ट भारत के लिए सामरिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
हालांकि, निचले बहाव वाला देश होने के कारण बांग्लादेश हमेशा शिकायत करता रहा है कि सूखे के मौसम में उसे पर्याप्त पानी नहीं मिलता। उनका तर्क है कि इससे उनकी कृषि और पर्यावरण (विशेषकर सुंदरवन) पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसी तनाव को कम करने के लिए 1996 का समझौता किया गया था।
जल बंटवारे का तकनीकी समीकरण
इस संधि के तहत 1 जनवरी से 31 मई के बीच पानी का बंटवारा 10-10 दिनों के स्लॉट में होता है। इसकी गणना ‘क्यूसेक’ में की जाती है। नियमों के अनुसार, यदि प्रवाह 70,000 क्यूसेक से कम है, तो दोनों देशों को 50-50 प्रतिशत पानी मिलता है।
यदि प्रवाह 70,000 से 75,000 क्यूसेक के बीच है, तो बांग्लादेश को 35,000 क्यूसेक का निश्चित हिस्सा दिया जाता है। वहीं, 75,000 क्यूसेक से अधिक होने पर भारत अपने पास 40,000 क्यूसेक रखता है और शेष पानी बांग्लादेश को दिया जाता है।
इस व्यवस्था की निगरानी के लिए एक संयुक्त समिति भी है, लेकिन आपातकालीन स्थितियों के लिए इसमें विशेष प्रावधान भी किए गए हैं। हालांकि, बदलते वैश्विक परिदृश्य में ये नियम अब विवाद का केंद्र बन गए हैं।
2026 की चुनौतियां और भारत का रुख
जैसे-जैसे 2026 नजदीक आ रहा है, जल विवाद और गहराता जा रहा है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिमालयी नदियों का जलस्तर प्रभावित हुआ है, जिससे 1996 का पुराना फॉर्मूला अब व्यावहारिक नहीं रह गया है।
बांग्लादेश अब पानी की अधिक गारंटी चाहता है, लेकिन वह यह भूल रहा है कि भारत के उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल में भी पानी की मांग कई गुना बढ़ गई है। भारत अपने किसानों और नागरिकों की जरूरतों की अनदेखी कर किसी ऐसे देश को रियायत नहीं दे सकता जो उसके खिलाफ साजिश रच रहा हो।
नया मोर्चा और भारत की दो टूक
गंगा के साथ-साथ अब तीस्ता नदी को लेकर भी कट्टरपंथी ताकतें जैसे जमात-ए-इस्लामी नया मोर्चा खोल रही हैं। बांग्लादेश में ‘तीस्ता बचाओ’ जैसे भड़काऊ नारों के साथ भारत को चुनौती दी जा रही है। लेकिन उन्हें समझना होगा कि आज का भारत अपनी संप्रभुता और सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं करेगा। बंगाल की सीमाओं पर अब ढिलाई का युग बीत चुका है। बीएसएफ को स्पष्ट निर्देश हैं और भारत विरोधी एजेंडा चलाने वालों को अब पानी की हर बूंद पर ब्लैकमेलिंग का करारा जवाब मिलेगा।

