शुभेंदु अधिकारी का बड़ा प्रहार: हावड़ा स्टेशन पर चला बुलडोजर, बांग्लादेशी घुसपैठियों में मचा हड़कंप!

पश्चिम बंगाल की पावन भूमि से वर्तमान में जो हृदयविदारक और साहसी तस्वीरें सामने आ रही हैं, उन्होंने समूचे राष्ट्र का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लिया है। दशकों से सुरक्षा विशेषज्ञों द्वारा पश्चिम बंगाल में तुष्टीकरण और वोटबैंक की राजनीति के कारण राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौते की जो चिंता जताई जाती थी, वह अब अतीत की बात होती दिख रही है। राज्य की सत्ता में परिवर्तन और मुख्यमंत्री के रूप में शुभेंदु अधिकारी के कमान संभालते ही प्रशासन ने न्याय का ऐसा हंटर चलाया है, जिसकी गूंज सीमा पार बैठे भारत विरोधियों के होश उड़ा रही है। अपराधियों, भू-माफियाओं और देश की आंतरिक सुरक्षा को चुनौती देने वाले सिंडिकेट्स के विरुद्ध अब आर-पार की जंग शुरू हो गई है। हावड़ा के व्यस्त बाजारों से लेकर मालदा की सीमाओं और उत्तर 24 परगना के भीतरी गांवों तक, सरकारी बुलडोजर उन अवैध ढांचों को नेस्तनाबूद कर रहे हैं जो कभी कानून की पहुंच से बाहर समझे जाते थे। प्रशासनिक हलकों में इसे ‘बंगाल का योगी मॉडल’ कहा जा रहा है, जिसने घुसपैठियों और उनके संरक्षकों की नींद हराम कर दी है। आखिर आधी रात को हावड़ा स्टेशन पर ऐसी क्या कार्रवाई हुई कि वहां पुलिस छावनी बन गई? बुलडोजर के खौफ से माफिया क्यों भाग रहे हैं? इन सभी सवालों के जवाब आज हम इस विशेष रिपोर्ट में देंगे।

इस बड़े प्रशासनिक फेरबदल का प्रथम दृश्य हावड़ा रेलवे स्टेशन के मुख्य द्वार पर दिखाई दिया। हावड़ा स्टेशन केवल बंगाल की ही नहीं, बल्कि देश की लाइफलाइन माना जाता है, जहां प्रतिदिन लाखों यात्रियों का आवागमन होता है। पिछले कई वर्षों से एक सोची-समझी रणनीति के तहत इस महत्वपूर्ण क्षेत्र को अवैध कब्जों का केंद्र बना दिया गया था। गंगा घाट और बस स्टैंड के पास के फुटपाथों पर अवैध दुकानों और झुग्गियों का ऐसा जाल बिछाया गया था कि आम नागरिकों का चलना भी मुश्किल था। सरकारी जमीनों पर सरेआम कब्जे हो रहे थे, परंतु पूर्ववर्ती सरकारों के वोटबैंक के मोह के कारण कोई कार्रवाई नहीं होती थी। लेकिन नई सरकार ने पदभार ग्रहण करते ही यह स्पष्ट कर दिया कि कानून का शासन सर्वोपरि है। इसी संकल्प का परिणाम था कि बिना किसी पूर्व सूचना और ढिलाई के, भारी पुलिस बल के साथ प्रशासनिक दस्ता देर रात हावड़ा स्टेशन पहुंच गया।

जब पूरा शहर विश्राम कर रहा था, तब हावड़ा स्टेशन के बाहर सरकारी मशीनों और बुलडोजरों का शोर सुनाई दे रहा था। इस मेगा ऑपरेशन का नेतृत्व रेलवे के IOW विभाग, रेलवे सुरक्षा बल (RPF) और हावड़ा सिटी पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी स्वयं कर रहे थे। किसी भी अप्रिय घटना या हिंसक विरोध को रोकने के लिए पूरे स्टेशन परिसर को सुरक्षा घेरे में ले लिया गया था। जैसे ही बुलडोजरों ने वर्षों पुराने अवैध निर्माणों को ढहाना शुरू किया, वहां कब्जा जमाए बैठे लोगों में अफरा-तफरी मच गई। प्रशासन ने किसी भी राजनीतिक दबाव को दरकिनार करते हुए सभी पक्के और कच्चे अवैध ढांचों को मिट्टी में मिला दिया। स्थानीय लोग इसे हावड़ा के इतिहास की अब तक की सबसे कठोर अतिक्रमण विरोधी कार्रवाई बता रहे हैं।

कार्रवाई के बाद हावड़ा स्टेशन के सामने की सड़कें अब काफी चौड़ी और स्वच्छ दिखाई दे रही हैं, जिससे यात्रियों को बहुत सुविधा हो रही है। मुख्यमंत्री ने इस कदम से स्पष्ट संदेश दिया है कि संवेदनशील क्षेत्रों को अतिक्रमण मुक्त रखना उनकी प्राथमिकता है। अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि यदि दोबारा अवैध कब्जा करने की कोशिश की गई, तो बुलडोजर फिर चलेगा और इस बार कार्रवाई और भी सख्त होगी। गौरतलब है कि यह अभियान केवल हावड़ा तक सीमित नहीं है; हाल ही में कोलकाता के तिलजाला और हसनाबाद में भी इसी तरह की कार्रवाई कर सरकारी भूमि को मुक्त कराया गया है। यह पूरे बंगाल में स्वच्छता और कानून व्यवस्था की स्थापना का एक वृहद अभियान है।

इस घटनाक्रम का दूसरा पहलू और भी गंभीर है, जो उत्तर 24 परगना के हिंगलगंज से सामने आया है। वहां पुलिस ने स्थानीय ग्रामीणों की सतर्कता से शाहिदुल गाजी नामक एक अवैध बांग्लादेशी घुसपैठिये को गिरफ्तार किया है। पूछताछ में जो खुलासे हुए, उन्होंने सुरक्षा एजेंसियों के कान खड़े कर दिए हैं। आरोपी ने बताया कि वह 2007 में अवैध रूप से सीमा पार कर भारत आया था और उसे तृणमूल कांग्रेस के स्थानीय पंचायत सदस्य जयनाल आबेदीन ने अपने घर में शरण दी थी। यह बेहद चिंताजनक है कि एक विदेशी नागरिक को सत्ताधारी दल के नेता ने न केवल पनाह दी, बल्कि उसे एक ‘सुरक्षा कवच’ भी प्रदान किया।

शाहिदुल गाजी ने स्वीकार किया कि टीएमसी नेता जयनाल आबेदीन ने उसके फर्जी भारतीय दस्तावेज तैयार करवाए थे। फर्जी फोटो और जानकारी के आधार पर उसका और उसके पिता का वोटर आईडी कार्ड बनवाया गया। इन नकली दस्तावेजों के सहारे वह खुद को भारतीय नागरिक बताकर मछली बाजार में काम करने लगा, शादी की और उसके बच्चे भी यहां भारतीय बनकर रहने लगे। जब इस गहरे राज का पर्दाफाश हुआ, तो आरोपी टीएमसी नेता और उसका परिवार फरार हो गया है, जिनकी तलाश में पुलिस जगह-जगह छापेमारी कर रही है।

इस खुलासे के बाद बंगाल की राजनीति में तूफान आ गया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्होंने पहले भी कई बार इसकी शिकायत पुलिस से की थी, लेकिन पिछली सरकार के दबाव में कोई कार्रवाई नहीं हुई। इस बार भाजपा नेता पलाश सरकार ने आक्रामक रुख अपनाते हुए कहा कि अब बंगाल पुलिस किसी की गुलाम नहीं है और राष्ट्रहित में कार्य कर रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि घुसपैठियों को शरण देने वाले किसी भी व्यक्ति को छोड़ा नहीं जाएगा, चाहे वह कितना ही रसूखदार क्यों न हो।

मुख्यमंत्री के इस कड़े रुख से बांग्लादेश और भारत में बैठे उनके गुर्गों में भय व्याप्त है। इसके पीछे मुख्य कारण नई सरकार द्वारा सीमावर्ती जिलों के अधिकारियों को दी गई ‘फ्री हैंड’ की शक्ति है। अब सीमा सुरक्षा बल (BSF) को स्थानीय पुलिस का पूरा सहयोग मिल रहा है, जिससे घुसपैठ के पुराने रास्तों पर पहरा कड़ा हो गया है और संदिग्ध गतिविधियों पर तुरंत लगाम लगाई जा रही है।

दूसरा महत्वपूर्ण कारण जनसांख्यिकीय परिवर्तन (Demographic Change) की साजिश पर प्रहार है। फर्जी राशन कार्ड और वोटर आईडी बनाने वाले सिंडिकेट्स पर सरकार ने शिकंजा कस दिया है। अब सरकारी योजनाओं के लिए दस्तावेजों की जांच बहुत बारीकी से की जा रही है, जिससे घुसपैठियों के लिए अपनी पहचान छिपाना अब संभव नहीं रहा। राजनीतिक संरक्षण खत्म होने से तस्करों का व्यापारिक मॉडल भी पूरी तरह ध्वस्त हो गया है।

तीसरा कारण ‘जीरो-टोलरेंस’ की नीति है। सीमावर्ती क्षेत्रों के मछली बाजारों, गोदामों और ईंट-भट्टों की सघन जांच शुरू हो गई है, जो पहले घुसपैठियों के छिपने के सुरक्षित ठिकाने हुआ करते थे। नियोक्ताओं को चेतावनी दी गई है कि यदि कोई अवैध नागरिक काम करते पाया गया, तो मालिक पर कठोर कार्रवाई होगी। इस कड़े प्रशासनिक पहरे ने बंगाल को ‘सुरक्षित चारागाह’ समझने वाले तत्वों के हौसले पस्त कर दिए हैं।

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