ब्रिक्स मंच से दिल्ली की महा-हुंकार
वैश्विक भू-राजनीति और महाशक्तियों का पुराना अहंकार नई दिल्ली के एक साहसिक फैसले से पूरी तरह डगमगा गया है। भारत, अमेरिका और चीन जैसी बड़ी ताकतें इस समय कूटनीति की बिसात पर आमने-सामने हैं। वाशिंगटन के अनुभवी राजनयिक और बीजिंग के रणनीतिकार भारतीय कूटनीति की बढ़ती रफ्तार और तेवर देखकर दंग हैं। सवाल यह है कि जो अमेरिका कल तक ब्रिक्स को धमकियां दे रहा था, वह अचानक बैकफुट पर क्यों आ गया? चीन से लेकर वाशिंगटन तक यह बेचैनी क्यों है? भारत ने ब्रिक्स की बैठक में अपना रुख साफ किया और तुरंत बाद अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो का दिल्ली दौरा तय हो गया। क्या ट्रंप प्रशासन को यह आभास हो गया है कि अब भारत को दबाना मुमकिन नहीं? क्या अमेरिका को डॉलर की बादशाहत और पश्चिमी प्रभुत्व के ढहने का डर सता रहा है? क्योंकि दिल्ली से जो कड़ा संदेश गया है, उसने वाशिंगटन के गलियारों में खलबली मचा दी है।
दिल्ली की धरती पर हुई ब्रिक्स देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक कोई औपचारिक मुलाकात नहीं थी, बल्कि यह वह मंच बना जहां भारत ने अपनी संप्रभुता का लोहा मनवाया। भारत ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय के समक्ष बिना किसी संकोच के स्पष्ट किया कि एकतरफा प्रतिबंधों और पश्चिमी देशों की मनमानी के दिन अब बीत चुके हैं। भारत ने वैश्विक मंच से आवाज उठाई कि जो देश अंतरराष्ट्रीय कानूनों और संयुक्त राष्ट्र चार्टर का उल्लंघन कर आर्थिक प्रतिबंधों को हथियार बनाते हैं, उनकी मनमानी पर लगाम लगनी चाहिए। यह अमेरिका और उसके सहयोगियों की दशकों पुरानी नीति पर सीधा प्रहार था। भारत का यह आक्रामक रुख देखकर वाशिंगटन में सन्नाटा पसर गया, क्योंकि उन्हें उम्मीद नहीं थी कि भारत इतनी बेबाकी से उनकी कमजोर नस पर हाथ रखेगा।
अमेरिका को लगी मिर्ची, एक तीर से कई निशाने
भारत ने पश्चिम एशिया के तनाव और होर्मुज स्ट्रेट व लाल सागर के समुद्री व्यापारिक मार्गों पर मंडराते खतरों को लेकर कड़ा संदेश दिया। भारत ने चेतावनी दी कि समुद्री मार्गों में अस्थिरता वैश्विक अर्थव्यवस्था और सप्लाई चेन को तबाह कर सकती है। दिलचस्प बात यह है कि भारत का यह बयान तब आया जब ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची दिल्ली में मौजूद थे। भारत ने अमेरिका को साफ संकेत दे दिया कि वह अपनी विदेश नीति वाशिंगटन के निर्देशों पर नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर तय करता है। भारत अपनी संप्रभुता के फैसले खुद लेने में सक्षम है, चाहे सामने कोई भी महाशक्ति क्यों न हो।
जैसे ही यह संदेश वाशिंगटन पहुंचा, अमेरिकी प्रशासन में खलबली मच गई और दो दिनों के भीतर ही बाजी पलट गई। भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने सोशल मीडिया पर घोषणा की कि अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो अगले हफ्ते भारत आ रहे हैं। इस दौरे की टाइमिंग बहुत कुछ बयां करती है। ईरान के विदेश मंत्री के दौरे और ब्रिक्स में भारत के कड़े रुख के तुरंत बाद अमेरिका को यह पहल करनी पड़ी। मार्को रुबियो का यह दौरा दर्शाता है कि अमेरिका की नजर दिल्ली की हर हलचल पर है। अमेरिका को अब भारत के साथ संवाद का रास्ता खोजने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
चीन के विस्तारवाद पर ब्रेक और ग्लोबल साउथ की लीडरशिप
अमेरिका को अब यह हकीकत समझ आ गई है कि भारत सिर्फ एक क्षेत्रीय ताकत नहीं, बल्कि ब्रिक्स और ग्लोबल साउथ का सबसे मजबूत नेतृत्वकर्ता बन चुका है। चीन ब्रिक्स का इस्तेमाल अपने अमेरिका विरोधी एजेंडे के लिए करना चाहता था, लेकिन भारत ने अपनी कूटनीति से चीन की चालों को नाकाम कर दिया। भारत ने स्पष्ट किया कि ब्रिक्स किसी का व्यक्तिगत एजेंडा नहीं, बल्कि एक बहुध्रुवीय दुनिया का मॉडल है जहां संप्रभुता का सम्मान सर्वोपरि है। यही कारण है कि ट्रंप प्रशासन भारत के साथ टकराव के बजाय द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने की रणनीति अपना रहा है।
14 साल बाद अमेरिकी विदेश मंत्री का कोलकाता कनेक्शन
इस घटनाक्रम में मार्को रुबियो का दिल्ली के साथ-साथ कोलकाता जाने का कार्यक्रम भी चर्चा में है। यदि वे कोलकाता जाते हैं, तो 14 साल बाद यह किसी शीर्ष अमेरिकी नेता की पहली कोलकाता यात्रा होगी। इससे पहले 2012 में हिलेरी क्लिंटन वहां गई थीं। पश्चिम बंगाल में हालिया राजनीतिक बदलाव और भाजपा की नई सरकार के गठन के बाद अमेरिका इस क्षेत्र को भारत-अमेरिका संबंधों के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण मान रहा है। अमेरिका बंगाल के नए राजनीतिक परिदृश्य पर बारीकी से नजर रख रहा है।
आर्थिक मोर्चे पर भारत का भारी पलड़ा
अमेरिका के बदले रुख के पीछे केवल कूटनीति नहीं, बल्कि मजबूत आर्थिक आंकड़े भी हैं। ट्रंप प्रशासन जानता है कि भारत के साथ तनाव अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए हानिकारक होगा। भारतीय कंपनियां अमेरिका में टेक्नोलॉजी और फार्मा जैसे क्षेत्रों में रिकॉर्ड तोड़ निवेश कर रही हैं, जिससे वहां हजारों रोजगार पैदा हो रहे हैं। अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने खुद स्वीकार किया है कि जल्द ही दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक व्यापारिक समझौते होने वाले हैं। जब आर्थिक शक्ति के रूप में भारत का पलड़ा भारी है, तो अमेरिका के लिए भारत की शर्तों को मानना मजबूरी बन गया है।
नौसैनिक ताकत और वैश्विक सुरक्षा का नया रक्षक
वैश्विक समुद्री सुरक्षा में भी भारत की स्थिति बेहद मजबूत हुई है। होर्मुज स्ट्रेट और लाल सागर में तनाव के बीच भारत ने अपनी नौसैनिक शक्ति से व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित की है। पश्चिमी देश समझ चुके हैं कि भारत के सहयोग के बिना इस क्षेत्र में स्थिरता संभव नहीं है। अरब देशों से लेकर ईरान तक भारत की साख बढ़ी है क्योंकि भारत ने हमेशा संतुलित और न्यायसंगत रुख अपनाया है। भारत ने सिद्ध कर दिया है कि उसकी कूटनीति किसी के दबाव में नहीं, बल्कि सिद्धांतों पर अडिग रहती है।
भारत की अद्भुत कूटनीतिक मास्टरक्लास
भारत एक तरफ ब्रिक्स में रूस-चीन के साथ वैश्विक सुधारों पर चर्चा करता है, तो दूसरी तरफ क्वाड के जरिए अमेरिका-जापान के साथ हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा का स्तंभ बना हुआ है। मार्को रुबियो की यात्रा क्वाड विदेश मंत्रियों की बैठक के लिए भी महत्वपूर्ण है। यह भारत की वह बेजोड़ कूटनीति है जिसे देखकर दुनिया हैरान है। भारत अब पूर्व और पश्चिम के बीच एक अनिवार्य सेतु बन चुका है। अमेरिका को समझ आ गया है कि भारत को दबाने की कोशिश डॉलर की बादशाहत को खतरे में डाल सकती है। भारत अब अपनी शर्तों पर दुनिया से बात कर रहा है।

