भारत के हाईवे नेटवर्क में आएगी क्रांति: 28 नेशनल हाईवे के मोनेटाइजेशन से जुटेंगे 35,000 करोड़ रुपये

एक सशक्त और विकसित भारत का लक्ष्य तब तक अधूरा है जब तक हमारा बुनियादी ढांचा वैश्विक मानकों को न छू ले। आज का भारत आत्मनिर्भरता की राह पर है, जो अपने संसाधनों के बल पर विश्व पटल पर नई पहचान बना रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी के नेतृत्व में देश के हाईवे नेटवर्क को ‘सुपरफास्ट’ गति देने की बड़ी तैयारी हो चुकी है। यह कदम भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ को मजबूत करेगा। सरकार ने एक ऐतिहासिक मेगा प्लान बनाया है, जिसके तहत 28 नेशनल हाईवे एसेट्स के मोनेटाइजेशन का रास्ता साफ हो गया है, जो देश के विकास की गति को दोगुना कर देगा।

इस पहल का उद्देश्य केवल फंड जुटाना नहीं, बल्कि उन संपत्तियों को पुनर्चक्रित (Recycle) करना है जो पहले निष्क्रिय पड़ी रहती थीं। नेशनल मोनेटाइजेशन पाइपलाइन 2.0 के तहत हाईवे सेक्टर से अगले पांच वर्षों में 4.42 लाख करोड़ रुपये जुटाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा गया है। इस वर्ष शॉर्टलिस्ट किए गए 28 हाईवे एसेट्स की कुल लंबाई 1,800 किलोमीटर से अधिक है। विशेष बात यह है कि इस योजना का सबसे बड़ा लाभ हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों को मिलेगा, जो अब देश की प्रगति के नए पावरहाउस बनकर उभर रहे हैं।

एसेट मोनेटाइजेशन: विकास का आधुनिक मॉडल

अक्सर एसेट मोनेटाइजेशन को लेकर कुछ लोग यह भ्रम फैलाते हैं कि सरकार संपत्तियां बेच रही है। यह पूरी तरह गलत धारणा है। वास्तव में, यह एक स्मार्ट ‘फाइनेंशियल इंजीनियरिंग’ है। इसमें तैयार सड़कों से मिलने वाले भविष्य के टोल टैक्स को निवेशकों को एक निश्चित समय के लिए लीज पर देकर अग्रिम राशि प्राप्त की जाती है। इसे इनविट (InvIT) और टोल-ऑपरेट-ट्रांसफर (ToT) मॉडल कहा जाता है।

इस प्रक्रिया में सड़कों का पूर्ण मालिकाना हक भारत सरकार के पास ही रहता है। निजी कंपनियां केवल सीमित समय के लिए रखरखाव और टोल वसूली का काम देखती हैं। इससे सरकार को एकमुश्त मोटी पूंजी मिलती है। इस साल सरकार को इन 28 हाईवे प्रोजेक्ट्स से 35,000 करोड़ रुपये का राजस्व मिलने की उम्मीद है, जिसका उपयोग नए एक्सप्रेसवे और ग्रामीण सड़कों के निर्माण में किया जाएगा।

स्वदेशी पूंजी से आत्मनिर्भरता का संकल्प

इस प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि इसमें भारतीय पैसे को ही देश की तरक्की में लगाया जा रहा है। अब हमें विदेशी कर्ज पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं है। मोदी सरकार ने पेंशन फंड्स और सॉवरेन वेल्थ फंड्स को इन प्रोजेक्ट्स में निवेश की अनुमति दी है। इससे देश के नागरिकों की बचत का पैसा देश की सड़कों के निर्माण में काम आएगा और उन्हें सुरक्षित रिटर्न भी मिलेगा।

पिछले आंकड़े इस रणनीति की सफलता की गवाही देते हैं। वित्त वर्ष 2025-26 में सड़क मंत्रालय को इस नीति से 29,000 करोड़ रुपये मिले थे। हाल ही में पांच बड़े हाईवे सेक्शंस के मोनेटाइजेशन से उम्मीद से अधिक 9,000 करोड़ रुपये खजाने में आए, जो यह दर्शाता है कि निवेशकों का भारतीय बुनियादी ढांचे और मोदी-गडकरी की कार्यशैली पर अटूट भरोसा है।

यूपी और हरियाणा: औद्योगिक क्रांति के नए केंद्र

सरकार इस योजना में बीओटी (BOT), ईपीसी (EPC) और हाइब्रिड एन्युटी मॉडल (HAM) को शामिल कर रही है ताकि जोखिम को कम से कम रखा जा सके और लाभ को अधिकतम किया जा सके। उत्तर प्रदेश और हरियाणा का इस सूची में शीर्ष पर होना यह संकेत देता है कि यहाँ व्यापार और उद्योगों का बड़ा जाल बिछने वाला है।

उत्तर प्रदेश अब ‘एक्सप्रेसवे प्रदेश’ के रूप में अपनी पहचान बना चुका है, वहीं हरियाणा ऑटोमोबाइल और औद्योगिक हब के रूप में विकसित हो रहा है। इन सड़कों के मोनेटाइजेशन से जो नया फंड आएगा, उससे लॉजिस्टिक्स लागत कम होगी, जिससे भारतीय उत्पाद वैश्विक बाजारों में अधिक प्रतिस्पर्धी बनेंगे।

2030 तक का भविष्योन्मुखी रोडमैप

सरकार की योजना केवल वर्तमान तक सीमित नहीं है। अगले पांच वर्षों के लिए स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं। वित्त वर्ष 2027 के लिए 68,770 करोड़ रुपये और वित्त वर्ष 2028 के लिए 91,800 करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य है। रफ्तार यहीं नहीं थमेगी, वित्त वर्ष 2029 में 1,04,430 करोड़ रुपये और 2030 तक इस महा-अभियान के जरिए कुल 1,17,860 करोड़ रुपये जुटाने का अभूतपूर्व खाका तैयार है।

ये आंकड़े भारत सरकार की इन्फ्रास्ट्रक्चर के प्रति गंभीरता को दर्शाते हैं। यह पैसा सीधे देश के विकास और कनेक्टिविटी में निवेश किया जा रहा है। नितिन गडकरी का विजन और प्रधानमंत्री का संकल्प भारत को विश्व की तीसरी सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति बनाने की दिशा में निर्णायक साबित होगा।

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