बलूचिस्तान का $1 ट्रिलियन का सोना: क्या पाक सेना का कब्ज़ा और ‘सुरक्षा गलियारा’ रोक पाएगा विद्रोहियों का खौफ?

क्वेटा की वह गोपनीय बैठक और $1 ट्रिलियन का यक्ष प्रश्न

कल्पना कीजिए, एक ऐसा क्षेत्र जहाँ धरती के भीतर सोने और तांबे का इतना विशाल भंडार मौजूद है, जिसका मूल्य $1 ट्रिलियन से लेकर $6 ट्रिलियन के बीच होने का अनुमान है। यह एक ऐसा खजाना है जो पाकिस्तान की चरमराती अर्थव्यवस्था को नया जीवन दे सकता है। मगर, इसी खजाने के ऊपर नफरत, असंतोष और बारूद की एक ऐसी परत जमी है, जिसे भेदना पाकिस्तान के लिए लगभग असंभव होता जा रहा है। मंगलवार को बलूचिस्तान की राजधानी क्वेटा एक बेहद संवेदनशील बैठक का केंद्र बनी। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने प्रांतीय शीर्ष समिति की अध्यक्षता की। आधिकारिक तौर पर एजेंडा सुरक्षा स्थिति की समीक्षा था, लेकिन असल मकसद बलूचिस्तान की अरबों डॉलर की खनिज संपदा पर सैन्य नियंत्रण और विदेशी निवेश को सुरक्षा देना था।

प्रधानमंत्री कार्यालय के बयान ने वैश्विक स्तर पर सबका ध्यान खींचा है। शहबाज शरीफ ने बलूचिस्तान में अर्धसैनिक बल ‘फ्रंटियर कोर’ (FC) की अतिरिक्त टुकड़ियों की तैनाती का आदेश दिया है। यह महज एक प्रशासनिक फैसला नहीं है, बल्कि एक सोची-समझी सैन्य रणनीति है। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब स्थानीय लोग और विद्रोही गुट प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के खिलाफ हथियार उठाए हुए हैं।

सुरक्षा गलियारा: क्या यह पाकिस्तान की आखिरी उम्मीद है?

बलूचिस्तान का रखशान डिवीजन, जहाँ सैंदक और रेको डिक जैसी विश्व स्तरीय खदानें हैं, पाकिस्तान के लिए सोने का अंडा देने वाली मुर्गी की तरह है। पाकिस्तान सरकार विदेशी निवेशकों को लुभाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है ताकि आर्थिक बदहाली से उबरा जा सके। लेकिन जिसे पाकिस्तान ‘विकास’ कह रहा है, बलूच उसे अपनी जमीन की ‘लूट’ मान रहे हैं।

क्वेटा बैठक में एक नए ‘सुरक्षा गलियारे’ (Security Corridor) का प्रस्ताव रखा गया। इसके तहत केवल अतिरिक्त फौज ही नहीं, बल्कि राजमार्गों पर चौकियों का जाल और हाई-टेक निगरानी सिस्टम लगाया जाएगा। आर्मी चीफ जनरल असीम मुनीर के नेतृत्व में सेना इस योजना को अमलीजामा पहनाने के लिए तैयार है। यह गलियारा उन विदेशी कंपनियों के लिए एक अभेद्य किला बनाने की कोशिश है जो यहाँ खनन करेंगी। पर सवाल यह है कि क्या बंदूक के साये में विकास संभव है?

बलूचिस्तान में हिंसा, विद्रोह और अरबों की संपदा का संघर्ष

खनिज समृद्ध यह प्रांत दशकों से अलगाववादी आंदोलनों का गवाह रहा है। बलूच विद्रोही समूहों का स्पष्ट कहना है कि इन संसाधनों पर पहला अधिकार यहाँ के भूमिपुत्रों का है। वे पाकिस्तान और चीन जैसी विदेशी शक्तियों पर संसाधनों की चोरी का आरोप लगाते हैं।

बीते महीने चगाई में हुए हमले ने सुरक्षा की पोल खोल दी थी, जहाँ 10 लोगों की जान चली गई थी। बीएलए (BLA) जैसे संगठन लगातार पाकिस्तानी सेना को निशाना बना रहे हैं। उनका तर्क है कि वे अपनी पहचान और अपनी मिट्टी के हक के लिए लड़ रहे हैं और वे किसी भी कीमत पर बाहरी कंपनियों को यहाँ जमने नहीं देंगे।

रेको डिक: वो खजाना जिस पर दुनिया की निगाहें हैं

विभिन्न अध्ययनों के अनुसार, बलूचिस्तान के खनिज भंडार की कीमत $1 ट्रिलियन से $6 ट्रिलियन तक हो सकती है। इसमें सोना, तांबा, कोयला और क्रोमाइट के साथ-साथ दुर्लभ ‘रेयर अर्थ’ तत्व भी शामिल हैं। ये तत्व आधुनिक तकनीक और स्मार्टफोन निर्माण के लिए बेहद जरूरी हैं। अकेले रेको डिक में 5.9 अरब टन अयस्क होने का अनुमान है।

कनाडा की बैरिक गोल्ड कंपनी रेको डिक प्रोजेक्ट में 50% हिस्सेदारी के साथ काम कर रही है। हालांकि पाकिस्तान सरकार सुरक्षा का आश्वासन दे रही है, लेकिन जमीन पर विद्रोहियों के हमले निवेशकों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच रहे हैं। विदेशी निवेश तभी टिकेगा जब शांति होगी, और शांति बिना स्थानीय सहमति के नामुमकिन लगती है।

असीम मुनीर और ‘विशेष निवेश सुविधा परिषद’ का दबाव

पाकिस्तानी सेना प्रमुख असीम मुनीर ने देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए ‘स्पेशल इन्वेस्टमेंट फैसिलिटेशन काउंसिल’ (SIFC) के जरिए खनिज क्षेत्र को प्राथमिकता दी है। लेकिन बलूच जनता इसे ‘सैन्य कब्जा’ करार दे रही है। उन्हें लगता है कि फ्रंटियर कोर का बढ़ता दायरा उनकी आजादी और उनके संसाधनों को छीनने के लिए है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह पाकिस्तान के लिए एक कठिन डगर है। यदि सेना खदानों को सुरक्षित कर भी लेती है, तो भी जनता के दिल में बसी नफरत को कम करना बड़ी चुनौती होगी। स्थानीय भागीदारी के बिना किया गया विकास केवल संघर्ष को जन्म देता है।

निष्कर्ष: बलूचिस्तान का भविष्य किस दिशा में?

आज बलूचिस्तान एक बड़े संकट के मुहाने पर खड़ा है। एक तरफ समृद्धि की चमक है, तो दूसरी तरफ दशकों के शोषण से उपजा आक्रोश। शहबाज शरीफ और जनरल मुनीर की रणनीति स्पष्ट है—ताकत के बल पर संसाधन निकालना। लेकिन इस योजना की सफलता इस बात पर टिकी है कि वे विद्रोहियों के हमलों को कैसे रोकते हैं।

बलूच समूहों के लिए यह अस्तित्व की लड़ाई है। वे झुकने को तैयार नहीं हैं। अंततः, विकास तभी सार्थक है जब वह समावेशी हो। क्वेटा की बैठक भले ही समाप्त हो गई हो, लेकिन बलूचिस्तान के इस $1 ट्रिलियन के खजाने पर नियंत्रण की यह जंग अब एक नए और खतरनाक दौर में प्रवेश कर चुकी है।

Share This Article
Leave a Comment