नेपाल में हाहाकार: खाद के लिए भारत के आगे झुका काठमांडू, चीन के धोखे के बाद बढ़ी मुसीबतें

नेपाल के नेताओं की अकड़ अब ढीली पड़ती नजर आ रही है। सत्ता संभालते ही जिन राजनेताओं ने भारत को आंखें दिखाने का दुस्साहस किया था, आज वे ही दिल्ली की चौखट पर गुहार लगा रहे हैं। कुछ समय पहले तक नेपाल को यह भ्रम था कि चीन के झूठे आश्वासनों और कागजी निवेश के सहारे वह दक्षिण एशिया में अपनी अलग धमक बना लेगा। लेकिन कड़वी हकीकत सामने आते ही नेपाल को समझ आ गया है कि संकट के समय केवल भारत ही सच्चा मित्र बनकर खड़ा होता है, जबकि ड्रैगन अपनी पीठ दिखाकर गायब हो जाता है।

हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि नेपाल की बालन शाह सरकार के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है। यदि भारत ने आगामी कुछ हफ्तों में दरियादिली नहीं दिखाई, तो पूरे नेपाल में भीषण खाद्य संकट पैदा हो जाएगा। यह उस देश की दास्तां है जिसने अपने सबसे विश्वसनीय पड़ोसी को नजरअंदाज करने की गलती की और आज उसी से अपने नागरिकों के लिए रोटी बचाने की भीख मांग रहा है।

नेपाल में अन्न का अकाल और हाहाकार

नेपाल वर्तमान में एक ऐसे दुष्चक्र में फंस गया है, जिससे बाहर निकलने का रास्ता केवल नई दिल्ली के पास है। यह महज राजनीतिक खींचतान नहीं है, बल्कि लाखों नेपाली लोगों के भोजन का सवाल है। नेपाल सरकार ने भारत से खाद की आपूर्ति के लिए आपातकालीन अनुरोध किया है। जो नेपाल बीजिंग के इशारों पर भारत विरोधी सुर अलाप रहा था, वही आज आधिकारिक तौर पर खाद के लिए गिड़गिड़ा रहा है ताकि देश को तबाही से बचाया जा सके।

काठमांडू से लेकर नेपाल के दुर्गम गांवों तक त्राहि-त्राहि मची है। बालन शाह सरकार की कैबिनेट मीटिंग में यह डरावना तथ्य सामने आया कि यदि जून तक खाद नहीं पहुंची, तो धान की फसल पूरी तरह बर्बाद हो जाएगी। नेपाल की खाद्य सुरक्षा चावल पर टिकी है, जो वहां की कुल खपत का 67% है। यदि पैदावार गिरती है, तो महंगाई और भुखमरी के कारण जनता सड़कों पर उतर आएगी और सरकार के पास कोई जवाब नहीं होगा।

वैश्विक राजनीति और सप्लाई चैन का संकट

सवाल उठता है कि आखिर हिमालयी देश इस मुसीबत में फंसा कैसे? इसके पीछे मध्य पूर्व में ईरान और इजरायल के बीच बढ़ता तनाव है, जिसने वैश्विक सप्लाई चैन को अस्त-व्यस्त कर दिया है। नेपाल अपनी खाद की जरूरतों के लिए खाड़ी देशों पर निर्भर था, लेकिन युद्ध जैसी स्थितियों के कारण समुद्री मार्ग बाधित हो गए हैं, जिससे माल ढुलाई का खर्च और जोखिम दोनों बढ़ गए हैं।

शिपिंग रूट्स पर हमलों के डर से मालवाहक जहाजों का बीमा महंगा हो गया है और खाद की आपूर्ति लगभग असंभव हो गई है। वैश्विक मुद्रास्फीति ने स्थिति को और बिगाड़ दिया है। परिणाम यह हुआ कि नेपाल के लगभग 94,450 टन खाद के पुराने सौदे रद्द हो गए और सप्लायर्स ने हाथ पीछे खींच लिए, जिससे नेपाल बीच मजधार में फंस गया।

खाली खजाना और भारत से उम्मीदें

जब चारों तरफ अंधेरा दिखा, तब नेपाल को अपने सबसे पुराने मित्र भारत की याद आई। संकट की इस घड़ी में नेपाल ने बिना समय गंवाए भारत के साथ G2G (गवर्नमेंट-टू-गवर्नमेंट) तंत्र सक्रिय कर दिया है। नेपाल ने भारत की कंपनी ‘राष्ट्रीय केमिकल्स एंड फर्टिलाइजर्स लिमिटेड’ से संपर्क कर तत्काल मदद मांगी है और वहां के कृषि मंत्रालय ने खुले तौर पर भारत से उम्मीद जताई है।

नेपाल ने भारत से तुरंत 80,000 टन खाद (60,000 टन यूरिया और 20,000 टन डीएपी) की मांग की है। हालांकि, पहले उनकी योजना 1.5 लाख टन खाद मंगवाने की थी, लेकिन आर्थिक बदहाली के कारण उन्हें अपनी मांग आधी करनी पड़ी क्योंकि खजाने में पर्याप्त धन नहीं है।

समय की कमी और जून की डेडलाइन

बजट की कमी के बाद अब सबसे बड़ी चुनौती समय की है। भारतीय कंपनी को इस खेप की डिलीवरी के लिए 120 दिन चाहिए, लेकिन नेपाल के पास इतना वक्त नहीं है। जून में धान की रोपाई शुरू होनी है। यदि यह समय निकल गया, तो खाद का कोई लाभ नहीं होगा और आने वाले साल नेपाल के लिए भुखमरी का काल साबित होंगे।

यही कारण है कि नेपाली अधिकारी भारत के सामने जल्द से जल्द रैक भेजने की विनती कर रहे हैं। वैश्विक टेंडर की प्रक्रिया में 225 दिन लगते हैं, जो नेपाल के लिए संभव नहीं है, इसलिए उनकी सारी उम्मीदें अब केवल दिल्ली पर टिकी हैं।

चीन का विश्वासघात और भारत की कूटनीति

इस पूरे प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा चीन का रवैया है। नेपाल पिछले कुछ वर्षों से चीन की ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ के मोहपाश में फंसकर भारत को दरकिनार करने की कोशिश कर रहा था। लेकिन जब असल संकट आया, तो चीन ने अपनी आंखें फेर लीं।

बीजिंग ने संकट के समय नेपाल को न कोई राहत पैकेज दिया और न ही खाद की कोई खेप भेजी। चीन केवल वहीं निवेश करता है जहां उसका अपना रणनीतिक स्वार्थ हो। अंततः नेपाल को उसी भारत की शरण में आना पड़ा, जिसे वह कल तक चुनौती दे रहा था।

यही भारत की सॉफ्ट पावर और असली ताकत है। भारत ने हमेशा संकट के समय पड़ोसियों की मदद की है, चाहे वह श्रीलंका की आर्थिक तबाही हो या 2015 का नेपाल भूकंप। कोरोना काल में भी भारत ने ‘वैक्सीन मैत्री’ के जरिए नेपाल को मुफ्त टीके उपलब्ध कराए थे।

2026 की राह और भारत की रणनीति

2026 में भारत के पास भी अपनी चुनौतियां हैं और उसे अपने किसानों की खाद सुरक्षा का भी ध्यान रखना है। ऐसे में नेपाल की मदद करना भारत के लिए एक कूटनीतिक संतुलन बनाने जैसा है। नई दिल्ली को यह सुनिश्चित करना होगा कि पड़ोसी धर्म भी निभ जाए और घरेलू जरूरतें भी प्रभावित न हों।

यह स्थिति उन देशों के लिए एक सबक है जो भारत के खिलाफ किसी दूसरी महाशक्ति के प्यादे बनते हैं। भौगोलिक रूप से नेपाल तीन तरफ से भारत से घिरा है और चीन कभी भी भारत का विकल्प नहीं बन सकता।

अब फैसला भारत के पाले में है। भारत नेपाल के आम नागरिकों को भूखा नहीं छोड़ने देगा, लेकिन साथ ही यह स्पष्ट संदेश भी देगा कि भविष्य में भारत विरोधी एजेंडा चलाने से पहले नेपाल को अपने हितों पर गौर करना चाहिए। अब नेपाल को समझ आ चुका है कि बीजिंग सिर्फ एक छलावा है, जबकि दिल्ली ही असली सहारा है।

Share This Article
Leave a Comment