हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी के शांत दिखने वाले पानी के नीचे इस समय 21वीं सदी का सबसे बड़ा रणनीतिक शक्ति-संतुलन का खेल चल रहा है। यह केवल कूटनीति की बिसात नहीं है, बल्कि एक ऐसा मास्टरस्ट्रोक है जिसने बीजिंग में बैठे चीनी रणनीतिकारों और पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की धड़कनें तेज कर दी हैं। चीन जिस ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ के माध्यम से पूरी दुनिया पर अपनी पकड़ बनाना चाहता था, भारत ने उसके सबसे संवेदनशील चोकपॉइंट पर अपना अभेद्य शिकंजा कसना शुरू कर दिया है।
ग्रेट निकोबार द्वीप पर भारत की हालिया गतिविधियां मात्र एक बुनियादी ढांचा परियोजना नहीं हैं, बल्कि यह समुद्र के बीचों-बीच भारत की वह ढाल है, जिसने चीन की सबसे बड़ी रणनीतिक कमजोरी—जिसे ‘मलक्का डायलेमा’ कहा जाता है—को उसके लिए एक वास्तविक संकट में बदल दिया है। इसे विस्तार से समझने के लिए हमें चीन की उस घबराहट को जानना होगा जो उसकी ऊर्जा आपूर्ति से जुड़ी है।
मलक्का डायलेमा: चीन की नाजुक गर्दन
चीन भले ही आर्थिक महाशक्ति होने का दावा करे, लेकिन उसकी पूरी औद्योगिक और सैन्य क्षमता एक पतली सप्लाई चेन पर टिकी है। चीन अपनी ऊर्जा जरूरतों का लगभग 80% कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस मध्य पूर्व और अफ्रीका से आयात करता है। ये विशाल टैंकर हिंद महासागर को पार करने के बाद मलेशिया और इंडोनेशिया के बीच स्थित एक संकरे समुद्री मार्ग, ‘स्ट्रेट ऑफ मलक्का’ (मलक्का जलडमरूमध्य) से होकर साउथ चाइना सी में प्रवेश करते हैं।
वर्ष 2003 में चीन के तत्कालीन राष्ट्रपति हू जिंताओ ने ‘मलक्का डायलेमा’ शब्द का इस्तेमाल करते हुए स्वीकार किया था कि यदि किसी युद्ध की स्थिति में विरोधियों ने इस रास्ते को बंद कर दिया, तो चीन की अर्थव्यवस्था और सेना बिना ईंधन के ठप हो जाएगी। भारत ने अब इसी ‘दुखती रग’ पर अपना हाथ रख दिया है।
सीपेक की नाकामी और म्यांमार का अनिश्चित भविष्य
मलक्का के इस डर से बचने के लिए चीन ने दो वैकल्पिक मार्ग बनाने की कोशिश की, जिसमें अरबों डॉलर खर्च किए गए। पहला रास्ता था ‘चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा’ (CPEC), जो ग्वादर पोर्ट को सीधे चीन से जोड़ता है। हालांकि, बलूचिस्तान में बढ़ते विद्रोह, चीनी नागरिकों पर हमलों और पाकिस्तान की चरमराती अर्थव्यवस्था ने इस प्रोजेक्ट को एक ‘सफेद हाथी’ बना दिया है, जिससे चीन को अब कोई खास उम्मीद नहीं बची है।
पाकिस्तान के बाद चीन ने म्यांमार के ‘क्यौकफ्यू’ पोर्ट के जरिए बंगाल की खाड़ी से सीधे अपने युन्नान प्रांत तक पहुंचने की योजना बनाई। लेकिन म्यांमार में जारी गृहयुद्ध और सैन्य शासन के खिलाफ बढ़ते विद्रोह ने चीन के इस निवेश को भी खतरे में डाल दिया है।
जब ये रास्ते बंद होने लगे, तो चीन ने बांग्लादेश के चटगांव और मोंगला बंदरगाहों के जरिए अपनी मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश की ताकि वह भारत के पूर्वी तटों (विशाखापत्तनम और चेन्नई) पर नजर रख सके। लेकिन भारत की सक्रिय कूटनीति ने चीन के इन मंसूबों पर पानी फेर दिया है।
ग्रेट निकोबार: 72,000 करोड़ रुपये का महाशक्तिशाली प्रोजेक्ट
चीन को चारों तरफ से घेरने के लिए भारत ने अपना सबसे बड़ा रणनीतिक पत्ता खेला है—’ग्रेट निकोबार डेवलपमेंट प्रोजेक्ट’। लगभग 72,000 करोड़ रुपये की इस महा-योजना के तहत हिंद महासागर में एक ऐसा किला तैयार किया जा रहा है जिसके मुख्य भाग इस प्रकार हैं:
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गैलाथिया बे ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल (ICTT): यह एक आधुनिक मेगा पोर्ट होगा, जो दुनिया के सबसे बड़े कंटेनर जहाजों को संभालने की क्षमता रखेगा।
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डुअल-यूज़ इंटरनेशनल एयरपोर्ट: यह हवाई अड्डा नागरिक उड़ानों के साथ-साथ भारत के सबसे आधुनिक फाइटर जेट्स और सैन्य विमानों के लिए 24/7 उपलब्ध रहेगा।
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ट्राई-सर्विसेज मिलिट्री हब: यहां सेना, नौसेना और वायुसेना का एक एकीकृत बेस होगा, जिसमें 450 मेगावाट का बिजली संयंत्र और रसद के आधुनिक इंतजाम होंगे।
सिक्स डिग्री चैनल: भारत का ‘किल स्विच’
ग्रेट निकोबार द्वीप की भौगोलिक स्थिति ‘सिक्स डिग्री चैनल’ के ठीक ऊपर है। दुनिया का 30% व्यापार और मलक्का की ओर जाने वाला सारा ट्रैफिक इसी रास्ते से गुजरता है। यहां भारतीय नौसेना की स्थायी मौजूदगी का मतलब है कि भारत जब चाहे चीन की सप्लाई लाइन का ‘किल स्विच’ दबा सकता है।
अंडमान और निकोबार द्वीप समूह को विशेषज्ञ भारत का ‘कभी न डूबने वाला विमानवाहक पोत’ (Unsinkable Aircraft Carrier) कहते हैं। यहां से पी-8आई पोसाइडन जैसे घातक निगरानी विमान और भारतीय पनडुब्बियां चीन के किसी भी जहाज पर पलक झपकते ही हमला कर सकती हैं।
सबांग पोर्ट और समुद्री निगरानी का जाल
भारत की रणनीति केवल अपने द्वीपों तक सीमित नहीं है। भारत ने इंडोनेशिया के साथ समझौता कर ‘सबांग पोर्ट’ के विकास का अधिकार हासिल किया है। एक तरफ ग्रेट निकोबार और दूसरी तरफ सबांग—ये दोनों मिलकर मलक्का के प्रवेश द्वार पर एक ऐसा अभेद्य ताला लगा देते हैं, जिसे तोड़ना चीन के लिए असंभव है।
इसके साथ ही, भारत अमेरिका और जापान के सहयोग से ‘सोसस’ (SOSUS) जैसी अंडरवाटर सेंसर तकनीक पर काम कर रहा है। यह तकनीक समुद्र की गहराइयों में चीनी पनडुब्बियों की हर हरकत को तुरंत पकड़ लेगी, जिससे हिंद महासागर में चीन की घुसपैठ पूरी तरह रुक जाएगी।
आर्थिक आत्मनिर्भरता और क्षेत्रीय वर्चस्व
यह प्रोजेक्ट केवल सैन्य कारणों से ही नहीं बल्कि आर्थिक कारणों से भी महत्वपूर्ण है। वर्तमान में भारत का बहुत सारा सामान कोलंबो या सिंगापुर होकर आता है, जिससे विदेशी मुद्रा का नुकसान होता है। गैलाथिया बे के बनने से भारत खुद एक वैश्विक शिपिंग हब बन जाएगा।
चीन जहां दूसरे देशों में अस्थिर प्रोजेक्ट्स पर पैसा लगा रहा है, वहीं भारत ने अपनी सीमा के भीतर एक ऐसा अजेय बेस तैयार कर लिया है जो आने वाले दशकों तक एशिया की सुरक्षा को तय करेगा। क्वाड (Quad) के सहयोग और भारत की ‘ऑफेंसिव डिफेंस’ नीति ने स्पष्ट कर दिया है कि हिंद महासागर का असली रक्षक भारत है। ड्रैगन के लिए यह ‘ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट’ किसी बुरे सपने से कम नहीं है।

