माउंट कोलांग का रहस्य: क्या ईरान का यह अभेद्य किला अमेरिका और इजरायल की नींद उड़ा देगा?

मध्य पूर्व के अशांत क्षेत्र में इस समय एक ऐसी सामरिक बिसात बिछाई जा रही है, जिसने वाशिंगटन, यरूशलम और रियाद के सुरक्षा गलियारों में खलबली मचा दी है। ईरान के एक विशेष पहाड़ के नीचे मौत का ऐसा गुप्त नेटवर्क तैयार हो रहा है, जिसे अमेरिका के सबसे शक्तिशाली बंकर-बस्टर बम भी छू तक नहीं पा रहे हैं। आखिर वह कौन सा राज है जिसे मोसाद जैसी दिग्गज एजेंसियां भी पूरी तरह डिकोड नहीं कर पा रही हैं? इस परमाणु प्रतिस्पर्धा ने सऊदी अरब को भी अमेरिका के सामने एक बड़ी शर्त रखने पर मजबूर कर दिया है, जिससे पूरी दुनिया में एक नए खतरे की सुगबुगाहट तेज हो गई है।

यह मामला महज परमाणु हथियारों की होड़ का नहीं है, बल्कि यह उस तकनीक और दुर्गम नेटवर्क का है जिसे पहाड़ों को काटकर दुनिया की नज़रों से ओझल बनाया गया है।

माउंट कोलांग: ईरान का अजेय ‘पिकएक्स माउंटेन’

वैश्विक खुफिया चर्चाओं के केंद्र में इस वक्त ईरान का माउंट कोलांग है, जिसे विशेषज्ञ ‘पिकएक्स माउंटेन’ भी कहते हैं। नतांज यूरेनियम एनरिचमेंट प्लांट के समीप स्थित यह पहाड़ अब एक अभेद्य सैन्य दुर्ग में तब्दील हो चुका है। नवीनतम खुफिया जानकारी और उपग्रह चित्रों से यह साफ होता है कि ईरान ने अपने सबसे उन्नत सेंट्रीफ्यूज को इसी पहाड़ के गर्भ में सुरक्षित कर दिया है।

इंजीनियरिंग का यह नमूना इतना मजबूत है कि अमेरिका का GBU-57 बंकर-बस्टर बम भी इसकी सुरंगों को भेदने में असमर्थ है। थिंक टैंकों के विश्लेषण बताते हैं कि यहां वेपन्स-ग्रेड यूरेनियम के लिए ऐसी सुविधाएं बनाई गई हैं जिन्हें सैन्य हमले से नष्ट करना असंभव के करीब है। इस पिकएक्स माउंटेन ने इजरायल और अमेरिका की पारंपरिक हमले की रणनीति को एक बड़ी चुनौती दे दी है।

सऊदी अरब का जवाब और विजन 2030 की रणनीति

ईरान की बढ़ती ताकत ने मध्य पूर्व के शक्ति संतुलन को बदल दिया है। इसके जवाब में सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने भी स्पष्ट कर दिया है कि यदि ईरान परमाणु क्षमता हासिल करता है, तो सऊदी अरब भी पीछे नहीं रहेगा।

सऊदी अरब और अमेरिका के बीच चल रहे परमाणु समझौते की जड़ें इसी सामरिक चिंता में छिपी हैं। आधिकारिक तौर पर ‘विजन 2030’ के माध्यम से सऊदी अरब अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए परमाणु विकल्प तलाश रहा है ताकि तेल पर निर्भरता कम हो सके, लेकिन इसके पीछे की कूटनीति कहीं अधिक गहरी है।

यूरेनियम संवर्धन की शर्त और वैश्विक दबाव

सऊदी अरब अब अपनी धरती पर यूरेनियम संवर्धन (Enrichment) का अधिकार मांग रहा है, जो अमेरिका के ‘गोल्ड स्टैंडर्ड’ नियमों के खिलाफ है। अमेरिका आमतौर पर तकनीक साझा करते समय देशों को खुद संवर्धन करने की अनुमति नहीं देता।

संवर्धन की यह तकनीक दोधारी तलवार है; इसका उपयोग शांतिपूर्ण बिजली उत्पादन और घातक हथियार बनाने, दोनों के लिए किया जा सकता है। चूंकि सऊदी अरब के पास चीन और रूस जैसे वैकल्पिक साझेदार मौजूद हैं, इसलिए अमेरिका इस मामले में कड़े रुख और समझौते के बीच फंसा हुआ है।

चीन की भागीदारी और ‘येलोकेक’ का खेल

खुफिया रिपोर्टों के अनुसार, सऊदी अरब ने अल उला के पास चीन की मदद से एक गुप्त संयंत्र स्थापित किया है जहां यूरेनियम अयस्क से ‘येलोकेक’ तैयार किया जा रहा है। यह प्रक्रिया परमाणु ईंधन बनाने की दिशा में शुरुआती और महत्वपूर्ण कदम है।

इतना ही नहीं, सऊदी अरब अपनी मिसाइल क्षमता को भी चीन की मदद से बढ़ा रहा है। इस स्थिति को ‘न्यूक्लियर लेटेंसी’ कहा जाता है, जहां कोई देश तकनीकी रूप से उस दहलीज पर खड़ा होता है जहां से वह बहुत ही कम समय में परमाणु बम का निर्माण कर सके।

पाकिस्तान के साथ पुराना रक्षा सहयोग

सऊदी अरब और पाकिस्तान के रक्षा संबंध हमेशा से चर्चा का विषय रहे हैं। 1990 के दशक में पाकिस्तान के संकट के समय सऊदी अरब की मदद और इसके बदले परमाणु तकनीकी सहयोग की अनौपचारिक संभावनाओं ने हमेशा खुफिया एजेंसियों को सतर्क रखा है। हालांकि, मौजूदा समय में सऊदी अरब खुद को आत्मनिर्भर बनाने और घरेलू बुनियादी ढांचे को मजबूत करने पर ज्यादा जोर दे रहा है।

इजरायल की ‘बिगिन डॉक्ट्रिन’ और नई चुनौतियां

इजरायल की ऐतिहासिक नीति रही है कि वह अपने शत्रुओं को परमाणु हथियार हासिल नहीं करने देगा। इसी ‘बिगिन डॉक्ट्रिन’ के तहत उसने पहले इराक और सीरिया के परमाणु रिएक्टरों को नष्ट किया था।

लेकिन आज ईरान और सऊदी अरब के बीच के समीकरण बदल चुके हैं। ‘अब्राहम एकॉर्ड्स’ के साये में इजरायल चाहता है कि सऊदी अरब का कोई भी परमाणु कार्यक्रम सख्त निगरानी में हो। इसके बावजूद, संवर्धन की छूट देना भविष्य के लिए एक बड़ा जोखिम साबित हो सकता है।

भारत पर पड़ने वाला प्रभाव और संतुलन

खाड़ी देशों में होने वाली कोई भी उथल-पुथल भारत को सीधे प्रभावित करती है। ऊर्जा सुरक्षा और वहां रहने वाले लाखों भारतीयों की सुरक्षा भारत की प्राथमिकता है।

भारत ने इस क्षेत्र में एक संतुलित नीति अपनाई है:

  • सऊदी अरब: भारत के साथ रक्षा और आईएमईईसी (IMEEC) जैसे बड़े आर्थिक प्रोजेक्ट्स पर काम चल रहा है।

  • ईरान: चाबहार बंदरगाह के माध्यम से भारत अपनी पहुंच बढ़ा रहा है।

  • इजरायल: रक्षा और उन्नत तकनीक के क्षेत्र में भारत की इजरायल से गहरी दोस्ती है।

भारत की बेदाग परमाणु छवि उसे इस जटिल क्षेत्र में एक विश्वसनीय मध्यस्थ और तकनीकी साझेदार के रूप में खड़ा करती है।

भविष्य की आशंकाएं: डोमिनो इफेक्ट

यदि सऊदी अरब को संवर्धन की अनुमति मिलती है, तो तुर्की और मिस्र जैसे देश भी इसी तरह की मांग उठा सकते हैं। इससे पूरे क्षेत्र में परमाणु हथियारों की एक अंधी दौड़ शुरू होने का खतरा है।

माउंट कोलांग की गहराइयों में चल रही गतिविधियां और रियाद-तेहरान के बीच की कूटनीति यह दर्शाती है कि 21वीं सदी का परमाणु क्रम एक बहुत ही नाज़ुक स्थिति में पहुंच गया है।

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