महासागरों की गहराइयों में एक बेहद शांत लेकिन खतरनाक युद्ध छिड़ा हुआ है। वैश्विक व्यापार मार्गों पर नियंत्रण की यह जंग अब एक निर्णायक मोड़ पर आ खड़ी हुई है। बीजिंग में इस समय खलबली मची है क्योंकि अमेरिका ने एक ऐसा दांव खेला है जिसने एशिया के पावर बैलेंस को पूरी तरह बदल दिया है। अमेरिका ने अब बंगाल की खाड़ी में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराई है और इसके लिए उसने हमारे पड़ोसी देश बांग्लादेश को अपना नया रणनीतिक केंद्र बनाया है।
अमेरिका और बांग्लादेश के बीच हुई इस सीक्रेट स्ट्रैटेजिक डील ने समंदर के नए समीकरण लिख दिए हैं। यह कोई साधारण समझौता नहीं है, बल्कि चीन की विस्तारवादी नीति को रोकने के लिए तैयार किया गया एक बड़ा चक्रव्यूह है। ऐसे में सवाल उठता है कि भारत इस पूरी बिसात पर कहाँ है? हमारे अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के इतने करीब अमेरिकी नौसेना की मौजूदगी के क्या मायने हैं? चलिए इस पूरे घटनाक्रम को विस्तार से समझते हैं।
अमेरिका और बांग्लादेश के बीच ऐतिहासिक समझौता
सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि पर्दे के पीछे क्या खिचड़ी पकी है। रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका और बांग्लादेश ने तीन अत्यंत महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं। इन समझौतों ने बंगाल की खाड़ी में अमेरिका की ताकत को कई गुना बढ़ा दिया है।
पहला महत्वपूर्ण समझौता बंदरगाहों के एक्सेस को लेकर है। अब अमेरिकी नौसेना बांग्लादेश के चटगांव (Chittagong) और मतारबाड़ी (Matarbari) बंदरगाहों का सीधे इस्तेमाल कर सकेगी। इसका अर्थ है कि दुनिया की सबसे शक्तिशाली नौसेना के युद्धपोत और विमानवाहक पोत अब यहां लंगर डाल सकेंगे और ईंधन व रसद की आपूर्ति कर सकेंगे। मतारबाड़ी का गहरा बंदरगाह बड़े जंगी जहाजों के लिए सामरिक रूप से काफी अहम है।
दूसरा करार खुफिया जानकारी साझा करने (Intelligence Sharing) से संबंधित है। अब दोनों देश सैन्य और सुरक्षा से जुड़ी टॉप सीक्रेट सूचनाएं एक-दूसरे को देंगे। समंदर में दुश्मन की हर हरकत और पनडुब्बियों की लोकेशन पर अब दोनों देशों की संयुक्त नजर होगी।
तीसरा समझौता रणनीतिक सहयोग को मजबूत करने का है। बंगाल की खाड़ी से लेकर मलक्का स्ट्रेट तक अब ऐसी निगरानी प्रणाली विकसित की जाएगी कि किसी भी विरोधी देश के लिए बिना पहचान में आए आगे बढ़ना लगभग असंभव होगा।
मलक्का स्ट्रेट: वैश्विक अर्थव्यवस्था की सबसे कमजोर नस
अमेरिका की अचानक बांग्लादेश में बढ़ती रुचि का मुख्य कारण ‘मलक्का स्ट्रेट’ (Malacca Strait) है। यह समुद्री रास्ता दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण चोकप्वाइंट है।
इंडोनेशिया, मलेशिया और सिंगापुर के बीच स्थित यह संकरा समुद्री रास्ता दुनिया के कुल समुद्री व्यापार का लगभग 60% वहन करता है। खरबों डॉलर का तेल, गैस और कच्चा माल इसी रास्ते से होकर गुजरता है। जो भी इस रास्ते पर नियंत्रण रखेगा, वह पूरी दुनिया की सप्लाई चेन को नियंत्रित करने की शक्ति रखेगा। अमेरिका की नजर अब इसी नब्ज पर है।
विशेषज्ञों का मानना है कि बांग्लादेश में अपनी पकड़ मजबूत कर अमेरिका मलक्का स्ट्रेट पर अपनी पकड़ को और अधिक फौलादी बना रहा है। यहाँ से अमेरिकी नेवी पूरे क्षेत्र की गतिविधियों पर बारीकी से नजर रख सकती है।
चीन का सबसे बड़ा डर: ‘मलक्का डिलेमा’
इस पूरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू चीन का डर है। चीन एक बड़ी औद्योगिक अर्थव्यवस्था है और उसकी ऊर्जा जरूरतों का लगभग 80% तेल आयात इसी मलक्का स्ट्रेट के रास्ते आता है। चीन का अधिकांश निर्यात भी इसी मार्ग से होता है।
चीन को हमेशा यह डर सताता है कि यदि भविष्य में अमेरिका या भारत के साथ संघर्ष हुआ और मलक्का स्ट्रेट को ब्लॉक कर दिया गया, तो चीन की अर्थव्यवस्था कुछ ही दिनों में घुटनों पर आ जाएगी। चीन की इसी कमजोरी को उसके पूर्व राष्ट्रपति हू जिंताओ ने ‘मलक्का डिलेमा’ (Malacca Dilemma) कहा था।
चीन सालों से इससे बचने के लिए वैकल्पिक रास्ते खोज रहा है, चाहे वह पाकिस्तान का ग्वादर पोर्ट हो या म्यांमार के रास्ते पाइपलाइन। लेकिन मलक्का का कोई वास्तविक विकल्प मौजूद नहीं है। अब बांग्लादेश में अमेरिकी मौजूदगी ने चीन की इस चिंता को कई गुना बढ़ा दिया है।
भारत की रणनीतिक बढ़त और अंडमान का महत्व
भारत इस पूरे खेल का सबसे प्रमुख खिलाड़ी है। भारत का आधा से ज्यादा व्यापार भी इसी क्षेत्र से होता है। भौगोलिक रूप से भारत की स्थिति उसे इस इलाके का असली रक्षक बनाती है।
अंडमान और निकोबार द्वीप समूह मलक्का स्ट्रेट के प्रवेश द्वार पर स्थित हैं, जिन्हें ‘अनसिंकेबल एयरक्राफ्ट कैरियर’ माना जाता है। ये द्वीप भारत को एक ऐसी सामरिक बढ़त देते हैं जिसका कोई मुकाबला नहीं है। पोर्ट ब्लेयर से मलक्का स्ट्रेट तक भारतीय नौसेना पलक झपकते पहुँच सकती है।
भारतीय नौसेना का ‘INS बाज़’ (INS Baaz) इस क्षेत्र की सुरक्षा का सबसे मजबूत स्तंभ है। कैंपबेल बे में स्थित यह नेवल एयर स्टेशन P-8I जैसे विमानों के जरिए पूरे समंदर की रियल टाइम निगरानी करता है।
अब जब अमेरिका चटगांव में आ रहा है, जो अंडमान से मात्र 1100 किलोमीटर दूर है, तो भारत और अमेरिका का सैन्य सहयोग एक नए स्तर पर पहुँचेगा। हिंद महासागर में भारत की मदद के बिना चीन को नियंत्रित करना किसी भी सुपरपावर के लिए संभव नहीं है।
निष्कर्ष: भविष्य की भू-राजनीति
सिंगापुर द्वारा मलक्का स्ट्रेट की गश्त में भारत की भूमिका को स्वीकार करना भी एक बड़े बदलाव का संकेत है। क्षेत्रीय सहयोग अब केवल कागजों पर नहीं बल्कि समंदर में धरातल पर उतर रहा है।
हालाँकि, इस क्षेत्र में इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे देश अपनी संप्रभुता को लेकर काफी संवेदनशील हैं। वे किसी भी बाहरी ताकत का अत्यधिक हस्तक्षेप पसंद नहीं करते। वहीं सिंगापुर स्थिरता चाहता है क्योंकि उसकी पूरी अर्थव्यवस्था इसी व्यापार मार्ग पर टिकी है।
लेकिन बांग्लादेश में अमेरिका का यह कदम बीजिंग के लिए एक सीधा संदेश है। समंदर की इस बिसात पर चीन की मनमानी को रोकने के लिए अब किलेबंदी पूरी हो चुकी है। आने वाले समय में इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की राजनीति और भी दिलचस्प होने वाली है।

