भारत-पाक गुप्त बैठकें: क्या पाकिस्तान के साथ फिर से शुरू होगी बातचीत? मस्कट से लंदन तक ‘ट्रैक 2’ डिप्लोमेसी का सनसनीखेज दावा

कश्मीर के पहलगाम में हमारे बहादुर जवानों के बलिदान का जख्म अभी भरा नहीं है। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की गूंज अभी शांत नहीं हुई है। मई 2025 के उस भीषण टकराव की बरसी पर सीमा के दोनों तरफ से तनावपूर्ण बयानबाजी जारी थी कि इसी बीच कूटनीतिक गलियारों से एक चौंकाने वाली खबर सामने आई है। यह खबर किसी भी सच्चे भारतीय की चिंता बढ़ा सकती है। क्या भारत और पाकिस्तान के बीच पर्दे के पीछे कोई गुप्त योजना बन रही है? क्या आतंकवाद के पोषकों के साथ अनौपचारिक संवाद शुरू हो गया है? ये सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि इस्लामाबाद के हुक्मरानों में अचानक हलचल बढ़ गई है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के महासचिव दत्तात्रेय होसबले के एक हालिया बयान ने इस कूटनीतिक चर्चा को हवा दे दी है। होसबले ने सुझाव दिया है कि भारत को पाकिस्तान के साथ बातचीत के दरवाजे पूरी तरह बंद नहीं करने चाहिए। यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उस संगठन के शीर्ष स्तर से आया है जो वर्तमान सरकार की वैचारिक बुनियाद है। उम्मीद के मुताबिक, आर्थिक तंगी से जूझ रहे पाकिस्तान ने तुरंत इस बयान का स्वागत किया, जैसे उसे अपनी छवि सुधारने का कोई सुनहरा मौका मिल गया हो।

इस्लामाबाद में उत्साह, नई दिल्ली में मौन

दत्तात्रेय होसबले के इस बयान ने वैश्विक स्तर पर सबका ध्यान आकर्षित किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार की नीति अब तक स्पष्ट रही है—’जब तक सीमा पार से आतंकवाद बंद नहीं होगा, तब तक कोई बातचीत नहीं होगी।’ ‘आतंक और बातचीत’ (Terror and Talks) एक साथ नहीं चल सकते, यह भारत की अडिग लकीर रही है। हालांकि, होसबले के बयान ने इस नीति पर चर्चा के नए द्वार खोल दिए हैं। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ताहिर अंद्राबी ने इस पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी, जिससे उनकी बातचीत की तड़प साफ झलकती है। कंगाली के कगार पर खड़ा पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग पड़ चुका है और वह भारत के साथ संवाद का बहाना खोज रहा है। फिलहाल, भारत सरकार ने इस टिप्पणी पर कोई आधिकारिक मुहर नहीं लगाई है, जिससे संकेत मिलता है कि सरकार अभी भी अपनी मूल नीति पर टिकी है।

क्या पर्दे के पीछे बन रही है कोई रणनीति?

विशेषज्ञों का मानना है कि होसबले का बयान महज संयोग नहीं हो सकता। बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों के बीच शायद दोनों देशों के बीच संबंधों को पुनर्जीवित करने के तर्क गढ़े जा रहे हैं। यद्यपि औपचारिक बातचीत शुरू करना कठिन है, लेकिन भारतीय सेना के पूर्व प्रमुख जनरल मनोज नरवणे ने भी हाल ही में जन-स्तर पर संबंधों को बेहतर बनाने की बात कही है। हालांकि, पाकिस्तान जैसे धोखेबाज पड़ोसी के इतिहास को देखते हुए, जिसने हमेशा ‘क्रिकेट’ या ‘बस’ डिप्लोमेसी की आड़ में कारगिल और मुंबई हमलों जैसी साजिशें रची हैं, ऐसे उदार तर्कों पर विश्वास करना जोखिम भरा हो सकता है। क्या आरएसएस और एक पूर्व सेना प्रमुख के एक ही समय में नरम पड़ते सुर किसी बड़े कूटनीतिक बदलाव का हिस्सा हैं?

‘ट्रैक 2’ डिप्लोमेसी पर सनसनीखेज खुलासे

इस पूरे मामले में पाकिस्तान के पूर्व राजनयिक जौहर सलीम का दावा सबसे अधिक चौंकाने वाला है। सलीम ने अल जजीरा से बात करते हुए दावा किया है कि भारत और पाकिस्तान के पूर्व अधिकारियों, रिटायर्ड जनरलों और खुफिया एजेंसियों से जुड़े लोगों के बीच हाल के दिनों में मस्कट, दोहा, थाईलैंड और लंदन जैसे शहरों में कम से कम चार गुप्त बैठकें हुई हैं। इन्हें ‘ट्रैक 1.5’ और ‘ट्रैक 2’ फॉरमेट की बैठकें बताया जा रहा है। ‘ट्रैक 1.5’ में वर्तमान अधिकारियों के साथ-साथ रिटायर्ड नौकरशाह भी शामिल होते हैं, जबकि ‘ट्रैक 2’ पूरी तरह से अनौपचारिक होती है। इन बैठकों का उद्देश्य अक्सर आधिकारिक बातचीत का रास्ता साफ करना और बड़ी गलतफहमियों को दूर करना होता है।

क्या चीन की चुनौती है मुख्य कारण?

जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर इरफान नूरुद्दीन का विश्लेषण इसे एक अलग नजरिया देता है। उनका मानना है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर चीन के साथ जारी तनाव के कारण भारत शायद दो मोर्चों पर एक साथ युद्ध की स्थिति से बचना चाहता है। ऐसे में पाकिस्तान के मोर्चे पर तनाव कम करना एक रणनीतिक आवश्यकता हो सकती है। नूरुद्दीन के अनुसार, आरएसएस और पूर्व जनरलों के बयान सरकार के लिए एक ‘पॉलिटिकल एस्केप रूट’ तैयार कर रहे हैं। यदि भविष्य में बातचीत शुरू होती है, तो सरकार इसे जनभावना और सामाजिक संगठनों की मांग बताकर अपनी पुरानी कठोर नीति के ‘यू-टर्न’ के आरोप से बच सकती है।

पाकिस्तान पर भरोसे का संकट

इतिहास गवाह है कि भारत की हर दोस्ती की पहल का जवाब पाकिस्तान ने धोखे से दिया है। अटल बिहारी वाजपेयी की लाहौर बस यात्रा के बाद कारगिल हुआ और पीएम मोदी की नवाज शरीफ से मुलाकात के बाद पठानकोट और उरी जैसे हमले हुए। पाकिस्तान की सेना (Deep State) की सत्ता ही भारत-विरोध पर टिकी है, इसलिए वे कभी शांति नहीं चाहेंगे। पूर्व पाकिस्तानी राजदूत तारिक रशीद खान ने भी माना है कि ये अनौपचारिक बातचीत केवल एक ‘सेफ्टी वाल्व’ की तरह हैं, जो केवल तनाव को कुछ समय के लिए कम कर सकती हैं, समस्या का स्थायी समाधान नहीं हैं।

निष्कर्ष: सतर्कता ही सुरक्षा है

डेक्कन लाइन का स्पष्ट मानना है कि संवाद केवल भारत की शर्तों पर और आतंकमुक्त वातावरण में होना चाहिए। जब तक पाकिस्तान हाफिज सईद और मसूद अजहर जैसे आतंकियों को भारत को नहीं सौंपता और अपनी धरती पर पल रहे आतंक के कारखानों को नष्ट नहीं करता, तब तक कोई भी बातचीत हमारे शहीदों का अपमान होगी। सरकार को देश को विश्वास में लेना चाहिए कि क्या वाकई कोई गुप्त बैठकें हो रही हैं। पाकिस्तान की आर्थिक कंगाली के बीच उसे कोई भी ‘लाइफलाइन’ देना भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ खिलवाड़ हो सकता है। हमारी नीति अटल रहनी चाहिए—पहले आतंक का अंत, फिर कोई बात। जय हिंद!

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