रुपये की ‘सर्जिकल स्ट्राइक’: क्या पेट्रोल और सोने की बचत से रुकेगी डॉलर की हेकड़ी? जानें असली ‘मास्टरप्लान’

अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया एक बार फिर रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया है। पिछले पांच महीनों में रुपया 89 से गिरकर 96 के स्तर पर आ गया है, जिससे हमारी मुद्रा के मूल्य में 6.5% की भारी गिरावट आई है। हर बार रुपये के कमजोर होने पर हमें आयात कम करने, पेट्रोल बचाने और सोना कम खरीदने जैसी परंपरागत सलाहें दी जाती हैं। लेकिन क्या ये सुझाव वाकई कारगर हैं? हकीकत तो यह है कि ये उपाय समस्या की गहराई को छू भी नहीं पाते। यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी गंभीर बीमारी का इलाज केवल पट्टी बांधकर किया जा रहा हो।

असली संकट यह नहीं है कि भारतीय बहुत अधिक खर्च कर रहे हैं। हम असल में पूंजी बाजार की जटिलताओं को व्यापारिक समस्या समझने की भूल कर रहे हैं। मुख्य मुद्दा पूंजी प्रवाह और हमारे वित्तीय ढांचे में छिपी गहरी खामियां हैं, जो पूरी अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रही हैं। रुपया क्यों टूट रहा है और हमारा शेयर बाजार वैश्विक स्तर पर पिछड़ क्यों रहा है, इसके पीछे की सच्चाई कुछ और ही है। आज हम उस ‘असली बीमारी’ का विश्लेषण करेंगे जो डॉलर के सामने रुपये को कमजोर कर रही है।

पेट्रोल और सोना नहीं, बुनियादी ढांचे की खामियों को पहचानें

इस वर्ष निफ्टी 50 इंडेक्स में लगभग 11% की गिरावट देखी गई है, जो प्रमुख वैश्विक सूचकांकों की तुलना में काफी खराब प्रदर्शन है। इसके विपरीत, दक्षिण कोरिया का KOSPI 50% और ताइवान का TAIEX 48% तक ऊपर है। साल की शुरुआत में एक डॉलर की कीमत 89.86 रुपये थी, जो अब 96 के करीब पहुंच चुकी है। आरबीआई के हस्तक्षेप के बावजूद विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI) लगातार बाजार से अपना पैसा निकाल रहे हैं।

क्या पेट्रोल और सोने की खपत कम करने से यह संकट टल जाएगा? बिल्कुल नहीं। भारत की मुख्य चुनौती मांग की कमी नहीं, बल्कि निवेश का गलत आवंटन है। एआई, रक्षा और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में अपार संभावनाएं होने के बावजूद पूंजी की कमी बनी हुई है। विदेशी निवेशकों को भारत में नीतिगत अनिश्चितता का डर सताता है। नियमों में निरंतर बदलाव और पूंजी निकालने में आने वाली बाधाओं के कारण वे सिंगापुर और दुबई जैसे स्थिर बाजारों को बेहतर विकल्प मानते हैं।

निवेशकों का भरोसा तोड़ती अस्थिर नीतियां और टैक्स का डर

टाइगर ग्लोबल द्वारा फ्लिपकार्ट में अपनी हिस्सेदारी बेचने पर 14,500 करोड़ रुपये का भारी टैक्स चुकाना पड़ा। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला कानूनी रूप से सही हो सकता है, लेकिन इसने अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के बीच एक नकारात्मक संदेश भेजा है। इससे यह धारणा बनी है कि भारत में निवेश के नियम कभी भी बदले जा सकते हैं और पुराने निवेशों पर भी नए नियम थोपे जा सकते हैं। ऐसी अनिश्चितता निवेशकों को भारत से दूर करती है।

विदेशी निवेश का एक बड़ा हिस्सा ऐसे फंडों में है जिन्हें बाजार से तुरंत निकाला जा सकता है। सेबी द्वारा नियमों में बार-बार बदलाव करने से अस्थिरता बढ़ती है। हमें एक ऐसे तंत्र की आवश्यकता है जहां विदेशी पूंजी केवल शेयर बाजार तक सीमित न रहकर वास्तविक उद्योगों और इंफ्रास्ट्रक्चर में लगे।

बाजार की अस्थिरता से ऊपर उठकर वास्तविक निवेश की जरूरत

यदि विदेशी निवेश वास्तविक व्यवसायों में लगेगा, तो बाजार के उतार-चढ़ाव का रुपये पर इतना गहरा असर नहीं पड़ेगा। भारत की जीडीपी में सेवाओं, स्वास्थ्य सेवा और लॉजिस्टिक्स का बड़ा हिस्सा है, लेकिन यहां विदेशी निवेश की काफी कमी है। अल्पकालिक सुधारों के लिए ब्याज दरों में मामूली वृद्धि और टैक्स स्पष्टता आवश्यक है। सरकार को यह आश्वासन देना होगा कि पुराने निवेशों पर नए नियम लागू नहीं किए जाएंगे। सेबी को भी कम से कम दो तिमाहियों तक नए नियम लाने से बचना चाहिए ताकि निवेशकों का विश्वास बना रहे।

लंबे समय में, हमें एक ऐसा पारदर्शी वित्तीय ढांचा तैयार करना होगा जहां पूंजी सुरक्षित रहे। सिर्फ बचत के सहारे भारत 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था नहीं बन सकता। इसके लिए एक स्थिर टैक्स व्यवस्था और आसान निकासी प्रक्रिया का होना अनिवार्य है, ताकि विदेशी निवेशक भारत को एक भरोसेमंद गंतव्य के रूप में देखें।

रुपये के लिए 90 दिनों का ‘एक्शन प्लान’

रुपये की गिरावट थामने के लिए तत्काल प्रभाव से कदम उठाने होंगे। पहला, विदेशी पूंजी रोकने के लिए ब्याज दरों में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी की जाए। दूसरा, सरकार पुराने टैक्स मामलों और GAAR नियमों पर स्पष्टता दे। तीसरा, फार्मा और ऊर्जा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में मंजूरी की प्रक्रिया तेज हो। चौथा, नियामक संस्थाएं नीतियों में निरंतरता बनाए रखें। पांचवां, आरबीआई को बाजार हस्तक्षेप और अपनी नीतियों पर स्पष्ट रुख पेश करना चाहिए।

जब तक हम इन बुनियादी समस्याओं का समाधान नहीं करेंगे, रुपया दबाव में रहेगा। पेट्रोल या सोने की बचत केवल एक तात्कालिक उपचार है। हमें अपने सिस्टम को इतना पारदर्शी बनाना होगा कि विदेशी पूंजी के लिए भारत पहली पसंद बने, न कि निवेशक डर के मारे दूसरे देशों का रुख करें। डॉलर की मजबूती का सामना करने के लिए भारत को दुनिया का सबसे भरोसेमंद निवेश केंद्र बनना ही होगा।

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