सीबीएसई का नया ‘भाषा नियम’ या छात्रों पर बोझ? 9वीं कक्षा में नीति बदलाव पर सुप्रीम कोर्ट में संग्राम

क्या हमारे देश का एजुकेशन सिस्टम केवल नए-नए प्रयोगों की एक लैब बन चुका है? क्या एयर-कंडीशन्ड कमरों में बैठकर अफसरों द्वारा बनाए गए नियम बच्चों के भविष्य पर सवालिया निशान लगा रहे हैं? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या नई शिक्षा नीति (NEP) के नाम पर सीबीएसई कोई ऐसा एजेंडा ला रही है, जो छात्रों के करियर और उनके ग्लोबल सपनों को नुकसान पहुंचाएगा?

ये चिंताजनक सवाल आज देश के लाखों माता-पिता, विद्यार्थी और शिक्षक उठा रहे हैं। सीबीएसई की ‘तीन भाषा नीति’ को लेकर शुरू हुआ विवाद अब क्लासरूम से निकलकर देश की सबसे बड़ी अदालत, यानी सुप्रीम कोर्ट की दहलीज तक जा पहुंचा है।

सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकंडरी एजुकेशन (CBSE) ने एक ऐसा आदेश पारित किया है, जिसने 9वीं कक्षा के छात्रों और उनके परिजनों के बीच हलचल पैदा कर दी है। सत्र 2026-27 से, 9वीं कक्षा के लिए तीन भाषाओं का अध्ययन अनिवार्य होगा, जिसमें से कम से कम दो भाषाएं भारतीय मूल की होनी चाहिए।

अब आप सोच सकते हैं कि स्वदेशी भाषाओं को बढ़ावा देने में क्या बुराई है? निश्चित रूप से अपनी भाषाओं का सम्मान होना चाहिए। लेकिन क्या यह सम्मान छात्रों की आकांक्षाओं की कीमत पर होगा? क्या यह फैसला उस नाजुक मोड़ पर थोपा जा रहा है, जब छात्र अपने करियर की नींव तैयार कर रहे होते हैं?

सीबीएसई का चौंकाने वाला नियम: सपनों की राह में रोड़ा?

कल्पना कीजिए उस छात्र की, जिसने कक्षा 6 से ही जर्मन या फ्रेंच सीखने के लिए कड़ी मेहनत की है। उसका लक्ष्य स्पष्ट है—यूरोप जाकर उच्च शिक्षा प्राप्त करना। उसने तीन साल एक विदेशी भाषा पर पकड़ बनाने के लिए समर्पित किए, ताकि वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुकाबला कर सके।

लेकिन जैसे ही वह 9वीं में आता है, उसे पता चलता है कि अब उसे एक और भारतीय भाषा अनिवार्य रूप से पढ़नी होगी। सीबीएसई के अनुसार, अब जर्मन केवल एक अतिरिक्त (चौथी) भाषा हो सकती है। यानी उस छात्र को, जो पहले से ही पढ़ाई के बोझ तले दबा है, अब शून्य से संस्कृत या कोई अन्य क्षेत्रीय भाषा सीखनी होगी।

क्या यह छात्र के साथ किया गया अन्याय नहीं है? क्या यह उसकी पसंद के अधिकार का उल्लंघन नहीं है? एक चिंतित पिता सवाल करते हैं, ‘मेरा बेटा ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग के लिए जर्मनी जाना चाहता है और उसने तीन साल जर्मन सीखी। अब 9वीं में अचानक उसे संस्कृत सीखने को मजबूर करना उसके भविष्य के साथ खिलवाड़ जैसा है।’

यह केवल एक परिवार की समस्या नहीं है, यह एक व्यापक सामाजिक चिंता है। जो माता-पिता अपने बच्चों को ग्लोबल लीडर बनाना चाहते हैं, क्या उनकी सोच को सीबीएसई संकीर्ण मानती है? क्या विदेशी भाषा सीखना किसी भी तरह से कमतर है?

NEP 2020 और सीबीएसई की जटिल रणनीतियां

हम जानते हैं कि यह पहल राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के तहत बहुभाषी शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए है। बच्चों को अपनी संस्कृति और जड़ों से जोड़ना सराहनीय है। लेकिन क्या सीबीएसई के नौकरशाहों को जमीनी हकीकत का अंदाजा है? क्या वे जानते हैं कि इसे लागू करने में छात्रों को किन व्यावहारिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा?

अभिभावकों का विरोध इस नीति के ‘समय’ और ‘तरीके’ पर है। एक मां, रूपा, बताती हैं कि इस नियम के कारण उनके बेटे को शायद फ्रेंच छोड़नी पड़े। उनके अनुसार, जब बच्चे को गणित और विज्ञान पर ध्यान देना चाहिए, तब एक नई भाषा का बोझ उन पर दबाव बढ़ाएगा।

रूपा का तर्क वजनदार है: ‘अगर ये भाषाएं प्राथमिक स्तर (कक्षा 1 से 5) में सिखाई जातीं, तो छात्र इसके आदी हो जाते। 9वीं कक्षा में अचानक नई भाषा थोपना मानसिक स्वास्थ्य और एकेडमिक प्रदर्शन पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगा।’

अभिलाषा नामक एक अन्य अभिभावक कहती हैं: ‘माध्यमिक स्तर पर इतने बड़े बदलाव धीरे-धीरे होने चाहिए थे। इसे कक्षा 6 से शुरू किया जाना चाहिए था ताकि बच्चों की पढ़ाई की निरंतरता बनी रहे।’ उनकी बेटी अब अपने भविष्य को लेकर अनिश्चित है।

अचानक आए फरमान से स्कूलों में मची अफरा-तफरी

सीबीएसई की इस नीति ने स्कूलों के सामने भी संकट खड़ा कर दिया है। जब बोर्ड ने 16 मई को यह घोषणा की, तब तक कई स्कूलों में नया सत्र शुरू हो चुका था। छात्र अपनी पसंद के विषयों की पढ़ाई शुरू कर चुके थे।

अभिभावक अनुष्का रोहतगी के अनुसार: ‘मेरे बेटे ने नए नियमों के आने से पहले ही अंग्रेजी और फ्रेंच के यूनिट टेस्ट दे दिए थे।’ अब छात्रों से कहा जा रहा है कि उनकी मेहनत का कोई मोल नहीं है क्योंकि नियम बदल गए हैं। क्या यह प्रशासनिक विफलता नहीं है?

यह विवाद केवल एक भाषा सीखने तक सीमित नहीं है, यह भविष्य की संभावनाओं से जुड़ा है। क्या सीबीएसई यह आश्वासन दे सकती है कि संस्कृत या अन्य क्षेत्रीय भाषा सीखने से छात्रों को वे अंतरराष्ट्रीय अवसर मिलेंगे, जो उन्हें जर्मन या फ्रेंच सीखने से मिल सकते थे?

एक अभिभावक का तीखा सवाल है: ‘रोजगार के लिहाज से संस्कृत कितनी सहायक होगी?’ यह सवाल भाषा के विरोध में नहीं बल्कि भविष्य की व्यावहारिकता को लेकर है। हमें अपने बच्चों को 21वीं सदी की ग्लोबल मार्केट के लिए तैयार करना होगा।

स्कूलों का संकट: शिक्षक और समय का अभाव

स्कूलों के लिए इसे लागू करना सिरदर्द साबित हो रहा है। दूसरी भाषा के लिए अतिरिक्त पीरियड्स जोड़ने से पूरे टाइम-टेबल को फिर से बनाना होगा। इससे स्पोर्ट्स, लाइब्रेरी और अन्य गतिविधियों का समय कम हो जाएगा, जो बच्चे के सर्वांगीण विकास के लिए जरूरी हैं।

नाम न छापने की शर्त पर एक प्रिंसिपल ने बताया कि उनके पास पर्याप्त भाषा शिक्षक नहीं हैं। वे छात्रों को संस्कृत लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं क्योंकि केवल उसी के शिक्षक उपलब्ध हैं। क्या यह छात्रों की पसंद की स्वतंत्रता का गला घोंटना नहीं है?

ममता मॉडर्न स्कूल की प्रिंसिपल पल्लवी शर्मा का कहना है कि योग्य भाषा शिक्षकों की भारी कमी है। स्कूलों पर खर्च का बोझ बढ़ेगा और विज्ञान जैसे महत्वपूर्ण विषयों में छात्रों की रुचि कम हो सकती है, जिसका असर उनकी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी पर भी पड़ेगा।

एमएम पब्लिक स्कूल की प्रिंसिपल रूमा पाठक के अनुसार, कई छात्रों को 8वीं तक संस्कृत का कोई बुनियादी ज्ञान नहीं होता, ऐसे में 9वीं में सीधे प्रवेश उनके लिए बेहद कठिन होगा।

हमारा पक्ष: राष्ट्रवाद और छात्र अधिकार

‘डेक्कन लाइन’ का मानना है कि सच्चा राष्ट्रवाद देश के युवाओं के भविष्य को सुरक्षित करने में है। हम भारतीय भाषाओं के प्रचार-प्रसार के पक्षधर हैं, लेकिन यह छात्रों के वैश्विक सपनों की बलि देकर नहीं होना चाहिए। सीबीएसई की यह नीति बच्चों के ऊपर एक अनावश्यक मानसिक दबाव बना रही है।

शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो पंख दे, बेड़ियाँ नहीं। छात्रों को उनकी पसंद की भाषा चुनने का अधिकार होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट में दायर जनहित याचिका (PIL) इस दिशा में एक बड़ा कदम है। हम इस मुद्दे पर अपनी नजर बनाए रखेंगे। क्योंकि यह केवल भाषा का नहीं, बल्कि हमारे देश की आने वाली पीढ़ी के भविष्य का सवाल है। जय हिंद!

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