सुपरपावर अमेरिका में इस वक्त इबोला वायरस को लेकर भारी दहशत का माहौल है। वॉशिंगटन के गलियारों में एक ऐसे फैसले ने खलबली मचा दी है, जिसने कोरोना महामारी के उस भयावह काल की यादें ताज़ा कर दी हैं। यह नया खतरा कोविड से भी कहीं अधिक घातक और डरावना माना जा रहा है। अमेरिका ने एक बड़ा कदम उठाते हुए अपने देश के स्थायी निवासियों यानी ग्रीन कार्ड होल्डर्स की एंट्री पर भी पाबंदी लगा दी है। नियम के मुताबिक, अगर कोई ग्रीन कार्ड धारक पिछले 21 दिनों के भीतर अफ्रीका के इबोला प्रभावित देशों में रहा है, तो फिलहाल उसके लिए अमेरिका की सीमाएं पूरी तरह बंद कर दी गई हैं। गौर करने वाली बात यह है कि कोविड के चरम पर भी ग्रीन कार्ड धारकों पर ऐसी रोक नहीं लगी थी, जो दिखाती है कि अमेरिका इस वक्त कितने बड़े संकट को महसूस कर रहा है।
यह कोई सामान्य वायरस नहीं, बल्कि इबोला का खतरनाक ‘बुंडीबुग्यो’ वेरिएंट है, जो युगांडा और कांगो में मौत का तांडव मचा रहा है। अमेरिका के सेंटर फॉर डिसीज कंट्रोल (CDC) ने शुक्रवार को स्पष्ट किया कि इस जानलेवा वायरस को मुल्क में घुसने से रोकने के लिए ग्रीन कार्ड धारकों पर यह पाबंदी लगाना बेहद जरूरी था। अमेरिका अपनी सीमाओं को सुरक्षित रखने के लिए हर संभव प्रयास कर रहा है।
टाइटल 42: अमेरिका का वह कठोर कानून जो फिर बना सुरक्षा कवच
CDC ने इस यात्रा प्रतिबंध के लिए अमेरिकी सार्वजनिक स्वास्थ्य कानून के ‘टाइटल 42’ को आधार बनाया है। यह वही कानून है जो स्वास्थ्य अधिकारियों को महामारी के दौरान प्रवासियों को सीमा पर ही रोकने की असीमित शक्ति प्रदान करता है। इतिहास गवाह है कि ग्रीन कार्ड धारकों को हमेशा यात्रा प्रतिबंधों से छूट दी जाती रही है, यहाँ तक कि ट्रंप प्रशासन के कड़े फैसलों में भी उन्हें रियायत मिली थी। लेकिन बुंडीबुग्यो वेरिएंट की गंभीरता ने अमेरिका को अपने सबसे मजबूत कवच को हटाने पर मजबूर कर दिया है, जो इस खतरे के अभूतपूर्व होने का प्रमाण है।
बुंडीबुग्यो वेरिएंट: वह महामारी जिसका कोई सटीक इलाज नहीं
आखिर सुपरपावर अमेरिका इस कदर खौफ में क्यों है? बुंडीबुग्यो वेरिएंट में ऐसी क्या बात है जिसने दुनिया की नींद उड़ा दी है? रिसर्च के आंकड़े रूह कंपा देने वाले हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने कांगो में इस वायरस के प्रसार को देखते हुए जोखिम के स्तर को ‘उच्च’ से बढ़ाकर ‘बहुत उच्च’ श्रेणी में डाल दिया है। WHO ने इसे अंतरराष्ट्रीय चिंता का सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित किया है।
सबसे बड़ी चिंता की वजह यह है कि इबोला के इस विशेष वेरिएंट के लिए फिलहाल कोई स्वीकृत वैक्सीन या अचूक इलाज मौजूद नहीं है। वर्तमान में उपलब्ध इबोला टीके ‘ज़ैरे’ वेरिएंट पर तो काम करते हैं, लेकिन बुंडीबुग्यो के सामने वे निष्प्रभावी हैं। यह वायरस बेहद खामोशी से फैलता है और जब तक इसकी पहचान होती है, तब तक यह काफी तबाही मचा चुका होता है। कांगो में इसका प्रकोप वर्तमान में सबसे अधिक भयावह है।
कांगो और युगांडा: संक्रमण की सुनामी और बढ़ता मौत का आंकड़ा
WHO के महानिदेशक टेड्रोस अधानोम घेब्रेयेसस ने अमेरिकी फैसले का समर्थन करते हुए कांगो की स्थिति पर चिंता व्यक्त की है। आधिकारिक तौर पर वहां 82 मामलों और 7 मौतों की पुष्टि हुई है, लेकिन जानकारों का मानना है कि वास्तविक स्थिति कहीं अधिक डरावनी है। वहां अब तक करीब 750 संदिग्ध मामले और 177 संभावित मौतें दर्ज की जा चुकी हैं। ये आंकड़े इशारा कर रहे हैं कि यह एक ऐसी सुनामी की शुरुआत हो सकती है जो पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले ले।
क्षेत्रीय स्तर पर संक्रमण का खतरा चरम पर है। कांगो की सीमा से सटे युगांडा में भी संक्रमित मरीज मिलने से हड़कंप मच गया है। यह वायरस किसी पासपोर्ट या सरहद को नहीं पहचानता, यह केवल संक्रमण फैलाने के लिए इंसानी शरीर की तलाश करता है।
सावधान भारत: सुपरपावर के इस कदम से लें सबक
जब अमेरिका जैसा देश, जिसकी स्वास्थ्य प्रणाली दुनिया में सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है, इतना डरा हुआ है कि वह अपने ही निवासियों के लिए दरवाजे बंद कर रहा है, तो यह पूरी दुनिया के लिए एक बड़ा अलर्ट है। राष्ट्रहित में कई बार कठोर निर्णय लेने अनिवार्य होते हैं। भारत को भी मौजूदा वैश्विक स्थिति पर कड़ी नजर रखनी होगी। हमारे हवाई अड्डों और सीमाओं पर सुरक्षा चक्र को अभेद्य बनाना समय की मांग है।
अमेरिका का यह ऐतिहासिक फैसला साबित करता है कि नागरिकों की जान बचाने के लिए कोई भी परंपरा या छूट मायने नहीं रखती। सुपरपावर ने अपनी सरहदें इसलिए सील की हैं क्योंकि वह जानता है कि इस अदृश्य दुश्मन से जंग बेहद कठिन है। भारत को भी पूरी तरह अलर्ट रहकर अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी। जय हिंद!

