एक तरफ जहाँ वैश्विक पटल पर ‘क्वाड’ जैसे शक्तिशाली देशों की कूटनीतिक बैठकें हलचल पैदा कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर नेपाल में प्रभाव जमाने के लिए अमेरिका और चीन के बीच खींचतान जारी है। मध्य पूर्व में भी अमेरिका और ईरान के तनाव ने कच्चे तेल की आपूर्ति को संकट में डाल दिया है। पूरी दुनिया जब इन बड़े भू-राजनीतिक संकटों पर नज़रें गड़ाए हुए थी, ठीक उसी समय भारत ने लद्दाख की शांत वादियों में एक ऐसा ‘साइलेंट गेम’ खेला है, जिसने बीजिंग के सत्ता गलियारों में हलचल पैदा कर दी है।
भारत ने वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के करीब लद्दाख में एक रणनीतिक मास्टरस्ट्रोक चला है। 14,000 फीट की उस ऊंचाई पर जहाँ जमा देने वाली ठंड पड़ती है, भारत की महारत्न कंपनी ONGC ने इतिहास रच दिया है। इस दुर्गम इलाके में पत्थरों का सीना चीरकर एक ऐसा कुआं खोदा गया है, जिसने भारत को दुनिया के उन चुनिंदा देशों की कतार में खड़ा कर दिया है जिनके पास पाताल की गहराई से ऊर्जा निकालने की तकनीक है। भारत की इस उपलब्धि ने चीन को रक्षात्मक मुद्रा में ला दिया है।
लद्दाख की इस बंजर ज़मीन के नीचे आखिर वह कौन सा खजाना है जिससे चीन खौफ खा रहा है? इसका उत्तर है ‘जियोथर्मल एनर्जी’ यानी भूतापीय ऊर्जा। सरल शब्दों में कहें तो पृथ्वी की गहराई में मौजूद मैग्मा की प्रचंड गर्मी ही ऊर्जा का वह स्रोत है जिसे पुगा घाटी में खोजा गया है। ONGC के जांबाजों ने 1,000 मीटर (1 किलोमीटर) गहरा कुआं खोदकर उस उबलती हुई गर्मी को छू लिया है। अब इस भूतापीय भाप और दबाव का उपयोग टरबाइन घुमाने और बिना किसी प्रदूषण के 24 घंटे निर्बाध बिजली पैदा करने के लिए किया जाएगा। यह प्रकृति का बनाया वह पावर प्लांट है जिसे चलाने के लिए किसी बाहरी ईंधन की आवश्यकता नहीं है।
सोलर और विंड पावर के साथ लद्दाख में बड़ी समस्या यह है कि वे मौसम और सूरज की उपलब्धता पर निर्भर करते हैं। कड़ाके की ठंड में जब सूरज हफ्तों नहीं निकलता, तब सोलर पैनल काम नहीं करते। लेकिन जियोथर्मल ऊर्जा की सबसे बड़ी ताकत इसकी स्थिरता है। यह साल के 365 दिन और 24 घंटे एक ही रफ्तार से बिजली प्रदान करती है। यह भारत का अब तक का सबसे सफल और गहरा जियोथर्मल मिशन साबित हुआ है।
माइनस 35 से 40 डिग्री सेल्सियस की कड़ाके की ठंड और ऑक्सीजन की भारी कमी के बीच 1000 मीटर की ड्रिलिंग करना किसी चमत्कार से कम नहीं था। जहाँ मशीनों का लोहा जम जाए और इंसानों की सांस फूलने लगे, वहाँ ONGC के इंजीनियरों ने डटे रहकर इस मिशन को पूरा किया। जोजिला और रोहतांग जैसे खतरनाक दर्रों से भारी ड्रिलिंग रिग्स और मशीनों को 14,000 फीट की ऊंचाई तक ले जाना एक अभूतपूर्व लॉजिस्टिक उपलब्धि थी, जिसे भारतीय जज्बे ने सच कर दिखाया।
इस मिशन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसकी सामरिक शक्ति है। पुगा घाटी LAC के पास होने के कारण भारतीय सेना के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। अब तक सैनिकों को हीटिंग और बिजली के लिए महंगे डीजल जनरेटरों पर निर्भर रहना पड़ता था, जिसके लिए भारी बर्फबारी के बीच ईंधन पहुंचाना एक बड़ी चुनौती थी। लेकिन इस जियोथर्मल प्रोजेक्ट के बाद सेना को बिजली की चिंता नहीं रहेगी। सीमा पर लगे रडार, संचार तंत्र और जवानों के बंकर अब बिना रुके और बिना ईंधन की चिंता के चौबीसों घंटे सक्रिय रह सकेंगे।
यह प्रोजेक्ट सीधे तौर पर चीन के लिए एक कड़ा संदेश है। चीन जानता है कि यदि भारत ने लद्दाख की इस प्राकृतिक ऊर्जा पर नियंत्रण पा लिया, तो भारतीय सेना को इस क्षेत्र में डिगा पाना असंभव होगा। चीनी सैनिक जहाँ ठंड से जूझते हैं, वहीं भारतीय जवानों के पास अब जमीन के नीचे से निकलने वाली गर्मी और बिजली का स्थायी समाधान है। खास बात यह है कि यह ऊर्जा स्रोत जमीन के बहुत नीचे सुरक्षित है, जिसे दुश्मन के हवाई हमलों या मिसाइलों से नष्ट करना लगभग नामुमकिन है।
पुगा घाटी अब सिर्फ एक ऊर्जा केंद्र नहीं, बल्कि भारत का एक अभेद्य ‘एनर्जी फोर्ट्रेस’ बनने की ओर अग्रसर है। अमेरिका, आइसलैंड और न्यूजीलैंड जैसे तकनीकी रूप से उन्नत देशों के एलीट क्लब में शामिल होकर भारत ने यह दिखा दिया है कि वह दुनिया के सबसे कठिन भौगोलिक क्षेत्रों में भी अपनी सफलता के झंडे गाड़ सकता है। यह खोज लद्दाख में भारत की स्थायी पकड़ को और भी मजबूत कर देगी।
अंततः, ONGC का यह प्रयास आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक विशाल कदम है। यह कूटनीतिक जीत के साथ-साथ सैन्य रसद (Logistics) की समस्याओं का स्थायी समाधान भी है। सीमा पर सड़कों और सुरंगों के निर्माण के बाद अब यह जियोथर्मल पावर प्लांट लद्दाख में भारत की स्थिति को अजेय बना देगा, जिससे चीन के हर नापाक इरादे विफल होना तय हैं।

