वैश्विक अर्थव्यवस्था के पटल पर एक बड़ा उलटफेर हुआ है, जो भारत जैसे उभरते सुपरपावर के लिए किसी बड़ी खुशखबरी से कम नहीं है। अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल यानी ‘काले सोने’ की कीमतों में बड़ी गिरावट आई है। यह कोई सामान्य कमी नहीं है, बल्कि पिछले सात हफ्तों की सबसे ऐतिहासिक गिरावट मानी जा रही है। जो तेल हाल के दिनों तक वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय बना हुआ था, अब उसकी कीमतों में नरमी देखी जा रही है।
बाज़ार का मिजाज: डर का अंत और तेल की कीमतों में गिरावट
आखिर अचानक तेल की कीमतों में यह भूचाल कैसे आया? इसका मुख्य कारण पश्चिम एशिया में शांति की उम्मीदें हैं। ईरान और इजराइल के बीच महीनों से जारी तनाव, जिसने दुनिया को युद्ध के मुहाने पर खड़ा कर दिया था, अब वहां हालात सुधरने के संकेत मिल रहे हैं। कूटनीतिक कोशिशें रंग ला रही हैं और युद्धविराम की चर्चा तेज है। बाजार, जो हमेशा अनिश्चितता से घबराता है, उसने अब राहत की सांस ली है। जैसे ही संघर्ष के बादल छंटे, कच्चे तेल के सट्टेबाजों ने हाथ खींच लिए और कीमतें नीचे गिर गईं।
आंकड़ों पर गौर करें तो इस हफ्ते ब्रेंट क्रूड की कीमत में लगभग 11 फीसदी की भारी गिरावट दर्ज की गई है। यह सात हफ्तों की सबसे बड़ी साप्ताहिक गिरावट है। इसी तरह, अमेरिकी बेंचमार्क डब्ल्यूटीआई क्रूड भी 9 फीसदी से ज्यादा गिर गया है। शुक्रवार को जुलाई डिलीवरी वाला ब्रेंट क्रूड 1.66 डॉलर यानी 1.8 फीसदी की कमी के साथ 92.05 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ। वहीं, डब्ल्यूटीआई भी 1.7 फीसदी गिरकर 87.36 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया। यह साफ करता है कि बाज़ार अब जमीनी हकीकत को समझ रहा है।
होर्मुज की खाड़ी और भारत की कूटनीतिक सूझबूझ
इस पूरे घटनाक्रम में ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ यानी होर्मुज की खाड़ी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह दुनिया का सबसे बड़ा तेल पारगमन बिंदु है, जहां से वैश्विक कच्चे तेल का करीब 20 फीसदी हिस्सा गुजरता है। तनाव के दौरान डर था कि कहीं ईरान इस मार्ग को बंद न कर दे, जिससे तेल संकट पैदा हो सकता था और कीमतें 150 डॉलर तक जा सकती थीं। लेकिन भारत ने अपनी मजबूत कूटनीति से ऊर्जा सप्लाई लाइन को सुरक्षित रखने का प्रयास किया। आज जब इस रास्ते के खुले रहने की उम्मीद बढ़ी है, तो कीमतों में गिरावट स्वाभाविक है।
भारत के लिए राहत: महंगाई पर नियंत्रण की उम्मीद
भारत के लिए इस गिरावट का बड़ा महत्व है, क्योंकि भारत अपनी जरूरत का 85-90 फीसदी तेल आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में एक डॉलर की कमी भी भारत के आयात बिल में हजारों करोड़ की बचत कराती है। मोदी सरकार के लिए, जो महंगाई को नियंत्रित करने के लिए प्रयासरत है, यह एक बड़ी आर्थिक राहत है।
तेल सस्ता होने से माल ढुलाई और परिवहन लागत कम होगी, जिससे महंगाई पर लगाम लगेगी। हर वह वस्तु जो परिवहन पर निर्भर है, सस्ती हो सकती है। सरकारी तेल कंपनियों के लिए भी यह मुनाफे की ओर बढ़ने का मौका है, क्योंकि अब तक वे पिछले घाटों की भरपाई कर रही थीं। कच्चा तेल 90 डॉलर से नीचे आने पर उनका पूरा वित्तीय समीकरण बदल जाएगा।
क्या पेट्रोल-डीजल की कीमतें कल से ही कम होंगी? इस पर सरकार और कंपनियां स्थिति की बारीकी से निगरानी कर रही हैं। यदि कीमतें 80-85 डॉलर के दायरे में स्थिर रहती हैं, तो भविष्य में आम जनता को कीमतों में कटौती का बड़ा तोहफा मिल सकता है। फिलहाल सरकार का ध्यान राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने पर है।
वैश्विक चुनौतियां और भविष्य का परिदृश्य
हालांकि, जश्न के साथ सतर्कता भी जरूरी है। विशेषज्ञों का मानना है कि तेल प्रतिष्ठानों और सप्लाई चेन को पूरी तरह सामान्य होने में समय लग सकता है।
सऊदी अरामको के सीईओ अमीन नासिर ने चेतावनी दी है कि वैश्विक तेल बाजार में 2027 तक उथल-पुथल रह सकती है। फिलहाल अमेरिका से बढ़े निर्यात और चीन में मांग की कमी के कारण कीमतें नियंत्रण में हैं। चीन की सुस्त अर्थव्यवस्था भारत के लिए अवसर बन रही है, लेकिन सप्लाई चेन में बाधा फिर से कीमतों में उबाल ला सकती है।
आत्मनिर्भर भारत: ऊर्जा सुरक्षा का लक्ष्य
निष्कर्ष यह है कि भारत को विदेशी तेल पर अपनी निर्भरता कम करने की दिशा में तेजी से बढ़ना होगा। आत्मनिर्भर भारत और एथेनॉल ब्लेंडिंग जैसे कदम इसी दिशा में हैं। हमें इलेक्ट्रिक वाहनों, सौर ऊर्जा और ग्रीन हाइड्रोजन को युद्धस्तर पर अपनाना होगा।
ऊर्जा सुरक्षा के लिए किसी दूसरे देश पर निर्भर रहना जोखिम भरा है। यह गिरावट हमारी आर्थिक नींव को मजबूत करने और विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ाने का एक बेहतरीन मौका है।
भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है, और ऊर्जा सुरक्षा इसमें सर्वोपरि है। तेल का खेल चाहे जो भी हो, भारत अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए पूरी तरह तैयार है और ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने का संकल्प रखता है।

