दुश्मन खेमे में खलबली: भारत को सुखोई-57 का सोर्स कोड देने को तैयार रूस, क्या बदलेगा इतिहास?

ग्लोबल डिफेंस मार्केट में इस समय ऐसी हलचल है जिसने बड़ी महाशक्तियों की चिंता बढ़ा दी है। यह मामला सिर्फ एक नए फाइटर जेट का नहीं, बल्कि उस ‘सीक्रेट सोर्स कोड’ का है जिसे कोई भी देश साझा करने से बचता है। लेकिन मॉस्को से आ रही खबरें भारतीय वायुसेना के बढ़ते कद का प्रमाण हैं। रूस ने भारत के सामने एक ऐसा प्रस्ताव रखा है जो न केवल रक्षा क्षेत्र में गेम-चेंजर साबित होगा, बल्कि दुश्मनों की नींद भी उड़ा देगा।

रूस ने अपने सबसे घातक पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर Su-57 पर भारत को एक ऐसा ऑफर दिया है, जो रक्षा कूटनीति की परिभाषा बदल सकता है। रूस न केवल अपना Su-57D टू-सीटर वेरिएंट देने को तैयार है, बल्कि इसका सोर्स कोड भी भारत के साथ शेयर करने को राजी है। सोर्स कोड किसी भी विमान का वह ‘दिमाग’ होता है जिससे वह संचालित होता है। यदि भारत के पास यह कोड आता है, तो हम इस फाइटर जेट में स्वदेशी हथियार, रडार और एवियोनिक्स अपनी जरूरत के अनुसार आसानी से लगा सकेंगे।

इस डील की गहराई को समझें तो पता चलता है कि रूस ऐसा क्यों कर रहा है। हाल ही में 19 मई को रूस के नए दो-सीट वाले Su-57D ने सफल उड़ान भरी। रूसी टेस्ट पायलट सर्गेई बोगदान के अनुसार, यह वेरिएंट विशेष रूप से उन निर्यात ग्राहकों के लिए है जो इसे खरीदना चाहते हैं। और जब बात रूस के विश्वसनीय साझीदार की आती है, तो भारत का नाम सबसे ऊपर होता है।

रूस का यह दो-सीट वाला मॉडल सीधे तौर पर भारतीय वायुसेना की जरूरतों को ध्यान में रखकर बनाया गया लगता है। भारतीय वायुसेना अपनी ऑपरेशनल रणनीति में दो-सीटर फाइटर जेट्स को अधिक महत्व देती है, जैसा कि हमारे पास Su-30MKI है जो वर्तमान में हमारी वायुसेना की रीढ़ है। पायलट ट्रेनिंग और जटिल युद्ध अभियानों के समन्वय के लिए दो-सीटर विमान अधिक प्रभावी माने जाते हैं।

पिछले दो वर्षों में भारत ने Su-57 प्रोग्राम में अपनी दिलचस्पी बढ़ाई है, जिसके कारण रूस अब लगातार आकर्षक ऑफर दे रहा है। जनवरी 2024 से ही इस सौदे को लेकर उच्च स्तरीय चर्चाएं चल रही हैं। फरवरी में आई रिपोर्ट्स के अनुसार, दोनों देश इस फिफ्थ जनरेशन एयरक्राफ्ट के लाइसेंस उत्पादन की संभावनाओं पर भी मंथन कर रहे हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बात सोर्स कोड तक पहुंच की है। रूस ने भारत को जिस स्तर की एक्सेस देने की पेशकश की है, वैसा उसने पहले कभी किसी देश के साथ नहीं किया। यदि यह एग्रीमेंट सफल होता है, तो यह रूस की निर्यात नीति में एक ऐतिहासिक बदलाव होगा, जो दर्शाता है कि भारत अब वैश्विक मंच पर अपनी शर्तों पर डील करने वाली शक्ति बन चुका है।

डिफेंस एक्सपर्ट्स के मुताबिक, भारत के पास इस सुपर डील को लेकर तीन मुख्य विकल्प मौजूद हैं जो वायुसेना को नई ऊंचाइयों पर ले जा सकते हैं।

पहला विकल्प यह है कि भारत अपनी स्क्वाड्रन शक्ति को तुरंत बढ़ाने के लिए सीधे तौर पर रूस से ये विमान खरीदे। इससे भारतीय वायुसेना को रातों-रात एक रणनीतिक बढ़त मिल जाएगी।

दूसरा विकल्प लाइसेंस के तहत घरेलू उत्पादन का है। यानी मेक इन इंडिया के तहत इस स्टील्थ जेट को भारत में ही बनाया जाए, जिससे हमारी एयरोस्पेस कंपनियों को उच्च तकनीक वाली मशीनों के निर्माण का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त हो सके।

तीसरा और सबसे प्रभावी विकल्प जॉइंट डेवलपमेंट का है। इसके तहत भारत और रूस मिलकर विमान का एक ऐसा कस्टमाइज्ड भारतीय संस्करण तैयार कर सकते हैं जिसमें रूसी एयरफ्रेम के साथ भारतीय मिशन कंप्यूटर, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम और अस्त्र जैसी घातक मिसाइलें लगी हों। यह पूरी तरह से ‘मेड इन इंडिया’ दिल वाला विदेशी फाइटर जेट होगा।

डिफेंस एनालिस्ट्स का मानना है कि तीसरा विकल्प भारत के दीर्घकालिक विजन ‘आत्मनिर्भर भारत’ के अनुकूल है। Su-57D का टू-सीटर मॉडल हमारी नेटवर्क-सेंट्रिक वॉरफेयर की फिलॉसफी को भी पूरा करता है, जहां पीछे बैठा अधिकारी रडार, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और ड्रोन्स को नियंत्रित कर सकता है।

इतना ही नहीं, Su-57D विमान रूस के S-70 ओखोटनिक स्टील्थ कॉम्बैट ड्रोन को सीधे हवा में नियंत्रित करने में सक्षम है। यह ‘मैन्ड-अनमैन्ड टीमिंग’ (MUM-T) भविष्य के युद्धों में गेम-चेंजर होगी और टू-सीटर जेट होने के कारण इसे ऑपरेट करना भारतीय पायलटों के लिए बहुत आसान होगा।

अब सवाल उठता है कि जब भारत अपना स्वदेशी AMCA (Advanced Medium Combat Aircraft) बना रहा है, तो Su-57 की क्या जरूरत? इसका जवाब है समय। AMCA को पूरी तरह से ऑपरेशनल होने में 2033 तक का समय लग सकता है, और वर्तमान भू-राजनीतिक हालातों को देखते हुए भारत तब तक फिफ्थ जनरेशन क्षमता के बिना नहीं रह सकता।

इसलिए Su-57D एक बेहतरीन ‘स्टॉप-गैप’ अरेंजमेंट हो सकता है। यह न केवल हमारी तात्कालिक सुरक्षा जरूरतों को पूरा करेगा, बल्कि इससे मिलने वाला तकनीकी अनुभव हमारे स्वदेशी AMCA प्रोग्राम को और अधिक उन्नत बनाने में भी मदद करेगा।

आज का भारत रक्षा बाजार में सप्लायरों की मर्जी पर निर्भर नहीं है, बल्कि अपनी शर्तें खुद तय करता है। रूस का सोर्स कोड देने का यह ऑफर साबित करता है कि वह भारत जैसे आर्थिक और रणनीतिक रूप से मजबूत साथी को खोना नहीं चाहता है।

वायुसेना के आधुनिकीकरण के लिए भारत सरकार हर विकल्प को बारीकी से देख रही है। आने वाले कुछ महीने इस बड़ी रक्षा डील की दिशा तय करेंगे और पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या सुखोई-57 भारतीय आसमान की रक्षा का जिम्मा संभालेगा।

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