आखिरकार क्यों 30 शक्तिशाली तेजस फाइटर जेट्स को बिना इंजनों के रनवे पर खड़ा छोड़ना पड़ा था? क्या यह दुनिया की दिग्गज एयरोस्पेस कंपनी की एक साधारण चूक थी, या फिर अमेरिका के गलियारों में बुनी गई कोई गहरी साजिश, जिसका लक्ष्य भारत के ‘आत्मनिर्भर’ मिशन को नाकाम करना था? साल 2016 से 2021 के बीच पर्दे के पीछे ऐसा कौन सा खेल हुआ कि General Electric (GE) ने उस फैक्ट्री पर ही ताला लगा दिया, जो भारतीय विमानों के लिए इंजनों का मुख्य स्रोत थी? अब ऐसा क्या हुआ कि सालों तक भारत को एक-एक इंजन के लिए इंतजार कराने वाली अमेरिकी कंपनी अचानक घुटनों पर आ गई है? क्या यह 8,300 करोड़ रुपये का मास्टरस्ट्रोक है, जिसने अमेरिका को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि अगर जल्द इंजन नहीं भेजे, तो दुनिया की सबसे बड़ी डिफेंस डील उनके हाथ से निकल जाएगी?
जो कंपनी कल तक डिलीवरी में महीनों लगा रही थी, उसने रातों-रात भारत के लिए ‘फ्लाइट डेक’ के नाम से एक समर्पित प्रोडक्शन लाइन क्यों शुरू कर दी? कैसे एक खरीदार ने दुनिया के सबसे ताकतवर सप्लायर को अपनी शर्तों पर झुकने पर मजबूर किया? आज हम खुलासा करेंगे उस बिलियन-डॉलर जंग का, जिसमें बिना किसी गोली के भारत ने अमेरिका के पूरे सिस्टम को सरेंडर करा दिया। इस कूटनीतिक खेल की पूरी कहानी आपके होश उड़ा देगी।
HAL के एयरफ्रेम और इंजनों का गंभीर संकट
हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के पास करीब 30 तेजस Mk1A के ढांचे (एयरफ्रेम) पूरी तरह तैयार थे। ये आधुनिक विमान आसमान में गरजने के लिए बेताब थे, लेकिन इंजनों की अनुपलब्धता के कारण ये केवल धातु के महंगे टुकड़े बनकर रह गए थे। भारतीय वायुसेना को 83 तेजस Mk1A की तत्काल आवश्यकता थी, जो दुश्मन की नींद उड़ाने वाला भारत का सबसे ऐतिहासिक कदम था। किसी भी लड़ाकू विमान का ‘दिल’ उसका इंजन होता है, और इस पर अमेरिका का नियंत्रण था। भारत पूरी तरह से GE के F404-IN20 इंजनों पर निर्भर था, लेकिन मार्च 2023 की समय सीमा निकल चुकी थी। 2024 तक हालात इतने बिगड़ गए कि एक इंजन के लिए भी महीनों का इंतजार करना पड़ रहा था।
संकट तब और गहरा गया जब अप्रैल 2026 में छठा इंजन पहुंचा और उसमें भी तकनीकी खामी मिली। इसे सुधारने के लिए दोनों देशों की टीमों को मशक्कत करनी पड़ी। बिना इंजन के 30 फाइटर जेट्स का खड़ा रहना किसी भी वायुसेना के लिए किसी बुरे सपने जैसा है। एक तरफ चीन अपने J-20 स्टेल्थ विमानों की संख्या बढ़ा रहा था और पाकिस्तान JF-17 ब्लॉक 3 तैनात कर रहा था, वहीं हमारे स्वदेशी जेट्स इंजनों की राह देख रहे थे। सवाल यह था कि दुनिया की सबसे बड़ी विमान कंपनी अपने वादों से पीछे क्यों हट गई?
सप्लाई चेन की चुनौती और अमेरिकी ‘डीप स्टेट’ की थ्योरी
दरअसल, 2016 से 2021 के बीच GE ने भारत को शुरुआती खेप देने के बाद F404 की प्रोडक्शन लाइन को ठप कर दिया था। कंपनी का ध्यान अधिक मुनाफे वाले अन्य प्रोजेक्ट्स पर चला गया था। जब 2021 में HAL ने 99 नए इंजनों के लिए 5,375 करोड़ रुपये का विशाल ऑर्डर दिया, तब GE के पास कोई तैयार सप्लाई चेन नहीं थी। उन्हें सब कुछ नए सिरे से खड़ा करना पड़ा, और इसी बीच कोविड महामारी ने कलपुर्जे बनाने वाले छोटे वेंडर्स को बर्बाद कर दिया।
न्यू इंडिया का आक्रामक रुख और भारी जुर्माना
यहीं से ‘न्यू इंडिया’ के आक्रामक कूटनीतिक रुख की शुरुआत हुई। आज का भारत विदेशी सप्लायर्स के सामने गुहार लगाने वाला पुराना भारत नहीं है। नई दिल्ली के रणनीतिकारों ने तय किया कि GE को उसी की भाषा में जवाब दिया जाएगा। रक्षा मंत्रालय ने वाशिंगटन और GE के बोर्ड को साफ संदेश दिया कि अब और देरी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। भारत ने व्यापारिक और कूटनीतिक दबाव का ऐसा जाल बुना, जिसमें GE को फंसना ही पड़ा।
पहला प्रहार ‘पेनाल्टी क्लॉज’ के जरिए हुआ। रक्षा मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि देरी के बदले भारी आर्थिक जुर्माना वसूला जाएगा। कोई भी बड़ी कंपनी अपना लाभ इस तरह खोना नहीं चाहती। भारत ने साफ कह दिया कि कंपनी की आंतरिक समस्याएं भारत का सिरदर्द नहीं हैं। इस कानूनी और आर्थिक हमले ने GE के शीर्ष प्रबंधन को हिलाकर रख दिया।
अरबों डॉलर की भावी डील्स का अल्टीमेटम
असली मास्टरस्ट्रोक था भविष्य के अरबों डॉलर के सौदे। भारत ने 97 और तेजस Mk1A जेट्स को मंजूरी दी है, जिसके लिए 8,300 करोड़ रुपये के इंजनों का सौदा पाइपलाइन में है। इसके अलावा, तेजस Mk2 के लिए GE के F414 इंजन और AMCA प्रोजेक्ट के लिए भी इसी कंपनी के इंजनों की योजना थी।
भारत ने वाशिंगटन को समझा दिया कि यदि F404 इंजनों में लापरवाही हुई, तो भारत भविष्य के बड़े सौदों के लिए फ्रांस की Safran या ब्रिटेन की Rolls Royce जैसे विकल्पों पर विचार कर सकता है। फ्रांस की कंपनी तो तकनीक हस्तांतरण (ToT) के लिए भी तैयार है। GE के लिए यह दशकों का सबसे बड़ा व्यापारिक नुकसान होता।
GE का सरेंडर और भारत के लिए समर्पित प्रोडक्शन लाइन
मामला जब वाशिंगटन के राजनीतिक गलियारों तक पहुँचा, तो बाइडन प्रशासन को दखल देना पड़ा। भारत ने iCET का हवाला देते हुए पूछा कि एक तरफ अमेरिका रणनीतिक साझेदारी की बात करता है, वहीं दूसरी तरफ उसकी कंपनी भारत के सुरक्षा प्रोजेक्ट को रोक रही है। इस कूटनीतिक प्रहार ने काम किया।
अंततः GE एयरोस्पेस ने घुटने टेक दिए और केवल भारत के लिए एक विशेष F404-IN20 प्रोडक्शन फैसिलिटी स्थापित की। किसी एक देश के विशिष्ट वेरिएंट के लिए अलग असेंबली लाइन बनाना एक बहुत बड़ा निवेश है, लेकिन GE को अपना भविष्य बचाने के लिए यह करना पड़ा।
GE ने इस नई यूनिट में अपना आधुनिक ‘FLIGHT DECK’ मॉडल लागू किया है ताकि उत्पादन बिना किसी बाधा के हो। भारत के लिए यह एक बड़ी कूटनीतिक और आर्थिक जीत है।
इंजनों की नई खेप और HAL की तैयारी
इस दबाव का परिणाम यह है कि अगस्त 2026 में भारत को एक साथ दो इंजनों की खेप मिलने वाली है। यह एक बड़ा बदलाव है, क्योंकि पहले एक-एक इंजन के लिए महीनों इंतजार करना पड़ता था। 2026 के अंत तक GE 20-22 इंजन सौंपने का वादा कर चुका है और 2027 में 30 इंजन देने का लक्ष्य है।
इस दौरान HAL ने भी जबरदस्त काम किया। बिना इंजनों के भी उन्होंने विमानों का निर्माण जारी रखा और 30 एयरफ्रेम तैयार कर लिए। जैसे ही इंजन आएंगे, उन्हें बस फिट करना होगा और विमान वायुसेना में शामिल होने के लिए तैयार होंगे।
आत्मनिर्भरता की ओर मजबूत कदम
इंजनों की नियमित आपूर्ति से तेजस के निर्यात (Export) के रास्ते भी खुलेंगे। अर्जेंटीना, मिस्र और फिलीपींस जैसे देश तेजस में रुचि दिखा रहे हैं, और अब इंजन की गारंटी मिलने से यह एक भरोसेमंद विकल्प बन गया है।
हालाँकि, इस घटना ने भारत को एक कड़वा सबक भी सिखाया है। किसी भी विदेशी कंपनी पर निर्भरता हमेशा जोखिम भरी होती है। इसीलिए भारत अब ‘कावेरी इंजन’ और फ्रांस के साथ मिलकर 110kN के स्वदेशी इंजन विकसित करने पर मिशन मोड में काम कर रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम ने दुनिया को संदेश दिया है कि ‘न्यू इंडिया’ न केवल संकटों को संभालना जानता है, बल्कि अपनी शर्तों पर दुनिया के दिग्गजों को झुकाना भी जानता है। GE का नया प्लांट और फास्ट-ट्रैक डिलीवरी भारत के बढ़ते भू-राजनीतिक रुतबे का प्रमाण है।

