यदि कोई भारतीय सेना से जुड़ा मामूली सा भी राज किसी दुश्मन देश को दे दे, तो उसे ताउम्र देशद्रोही कहा जाएगा और वह जेल की कालकोठरी में सड़ेगा। लेकिन क्या होगा अगर हमारी खुद की सेना दुश्मनों को खुफिया जानकारियां देने लगे, वो भी बेहद संवेदनशील? कल्पना कीजिए, जिन रहस्यों को सुरक्षित रखने के लिए हमारे जासूस अपनी जान की बाजी लगा देते हैं, वही राज अगर हम खुद अपने पड़ोसियों को सौंप दें, तो आप इसे क्या कहेंगे? हाल ही में पुणे की टॉप सीक्रेट मिलिट्री इंटेलिजेंस लैब से श्रीलंका के 22 सैन्य अधिकारियों ने अपना विशेष प्रशिक्षण पूरा किया है। सवाल यह है कि क्या भारत अपनी जासूसी के गुर दुनिया को सिखाकर कोई गलती कर रहा है? या फिर यह पर्दे के पीछे बुना गया चाणक्य नीति का वो जाल है, जिसे ड्रैगन आज तक समझ नहीं पाया है? आखिर भारत ऐसा क्या कर रहा है जिससे बीजिंग की नींद उड़ी हुई है? आज हम रक्षा कूटनीति के उसी सच को डिकोड करेंगे जो आपको मुख्यधारा की मीडिया में नहीं मिलेगा।
खुफिया प्रशिक्षण और रणनीतिक बिसात
तारीख थी 25 जुलाई 2026। भारतीय सेना के ‘आर्मी ट्रेनिंग कमांड’ ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर एक पोस्ट साझा की। देखने में यह पोस्ट बहुत साधारण थी, जिसमें बताया गया कि पुणे के ‘मिलिट्री इंटेलिजेंस ट्रेनिंग स्कूल एंड डिपो’ (MINTSD) में श्रीलंका के 22 सैन्य अधिकारियों ने सफलतापूर्वक खुफिया प्रशिक्षण कोर्स पूरा कर लिया है। लेफ्टिनेंट जनरल देविंदर पाल सिंह की मौजूदगी में एक समारोह हुआ और इन विदेशी अफसरों को भारतीय खुफिया ट्रेडक्राफ्ट की डिग्रियां दी गईं। सतह पर यह एक सामान्य सैन्य आदान-प्रदान कार्यक्रम लग सकता है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कोई भी देश बिना किसी बड़े स्वार्थ के दूसरे देश की सेना पर अपना समय और पैसा खर्च नहीं करता। इसके पीछे एक गहरा रणनीतिक खेल है।
गौर कीजिए, श्रीलंका वही देश है जहाँ कुछ समय पहले तक चीन ने अपना दबदबा बना लिया था। हंबनटोटा बंदरगाह को 99 साल की लीज पर लेना और कोलंबो में अपनी परमाणु पनडुब्बियों को तैनात करना भारत के लिए सीधा खतरा था। चीन की इस ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ रणनीति को मात देने के लिए भारत ने सीधे टकराव के बजाय ‘मिलिट्री डिप्लोमेसी’ का रास्ता चुना। जब आप किसी विदेशी सैन्य अधिकारी को अपने संस्थान में प्रशिक्षित करते हैं, तो आप उनके मानस पटल पर भारत समर्थक विचार अंकित कर रहे होते हैं। आज जो अधिकारी पुणे में ट्रेनिंग ले रहा है, कल वही श्रीलंका की सेना का शीर्ष कमांडर या रक्षा सलाहकार बनेगा। संकट के समय उसका झुकाव स्वाभाविक रूप से भारत की ओर होगा, जहाँ उसने अपने करियर के महत्वपूर्ण दिन बिताए हैं।
रक्षा कूटनीति का वैश्विक विस्तार
भारत का ‘इंडियन टेक्निकल एंड इकोनॉमिक कोऑपरेशन’ (ITEC) कार्यक्रम आज दुनिया के दर्जनों देशों तक पहुँच चुका है। नेपाल, भूटान, म्यांमार और मॉरीशस जैसे पड़ोसी देशों के शीर्ष सैन्य नेतृत्व अक्सर भारतीय अकादमियों से ही प्रशिक्षित होकर निकलते हैं। अब भारत सरकार अपनी ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ के तहत वियतनाम, फिलीपींस और इंडोनेशिया जैसे देशों के अफसरों को भी प्रशिक्षण दे रही है। अफ्रीका में नाइजीरिया और केन्या तक हमारी पहुंच बढ़ी है। इसका सबसे बड़ा लाभ ‘इंटरऑपरेबिलिटी’ में होता है, यानी जब दो देशों की सेनाएं एक जैसी कार्यप्रणाली सीखती हैं, तो साझा खतरों के खिलाफ संयुक्त ऑपरेशन चलाना बहुत आसान हो जाता है।
इसका एक और पहलू ‘सॉफ्ट पावर’ और रक्षा निर्यात से जुड़ा है। जब विदेशी अफसर भारत में ट्रेनिंग लेते हैं, तो वे हमारे तेजस विमान, ब्रह्मोस मिसाइल और रडार सिस्टम की क्षमताओं को करीब से देखते हैं। जब उन्हें अपनी सेना के लिए हथियार खरीदने होते हैं, तो वे किसी अज्ञात चीनी सिस्टम के बजाय भरोसेमंद भारतीय तकनीक को प्राथमिकता देते हैं। इस प्रकार भारत सिर्फ प्रशिक्षण नहीं, बल्कि हथियारों का एक पूरा इकोसिस्टम निर्यात कर रहा है।
काउंटर-इंटेलिजेंस: सुरक्षा का अभेद्य किला
अक्सर यह शंका जताई जाती है कि विदेशी अफसरों को अपनी जासूसी तकनीक सिखाने से क्या हमारे रहस्य लीक नहीं होंगे? इसका उत्तर भारतीय सेना के ‘काउंटर-इंटेलिजेंस प्रोटोकॉल’ में छिपा है। विदेशी अधिकारियों के लिए तैयार किया गया कोर्स पूरी तरह अलग होता है। उन्हें जासूसी का विज्ञान, सैटेलाइट इमेजरी का विश्लेषण और सर्विलांस के बुनियादी सिद्धांत सिखाए जाते हैं, न कि भारत की ऑपरेशनल डिटेल्स या हमारे एजेंट्स की पहचान। यदि कोई अधिकारी भविष्य में शत्रु देश से हाथ मिला भी ले, तो भी उसके पास कोई ऐसी जानकारी नहीं होगी जिससे भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा हो।
इतिहास के गौरवशाली खुफिया ऑपरेशन
भारतीय खुफिया एजेंसियों की क्षमता को समझने के लिए इतिहास के कुछ पन्नों को पलटना जरूरी है। 1970 के दशक में भारत को अंदेशा था कि पाकिस्तान ‘काहूटा’ में परमाणु बम बना रहा है। वहां की सुरक्षा इतनी सख्त थी कि कोई परिंदा भी पर नहीं मार सकता था। ऐसे में ‘रॉ’ (R&AW) ने एक ऐसा मास्टरस्ट्रोक खेला जिसने अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA को भी हैरान कर दिया।
भारतीय जासूसों ने देखा कि काहूटा के वैज्ञानिक एक विशेष नाई की दुकान पर बाल कटवाने आते हैं। जासूसों ने उस दुकान के फर्श से वैज्ञानिकों के बाल इकट्ठे किए और उन्हें गुप्त रूप से लैब में जांच के लिए भारत भेजा। जब उन बालों का परीक्षण हुआ, तो उनमें रेडिएशन और यूरेनियम के अंश मिले। बिना किसी घुसपैठ के, सिर्फ कचरे से भारत ने साबित कर दिया कि पाकिस्तान परमाणु बम बना रहा है।
इसी तरह 1965 का ‘नंदा देवी मिशन’ भी अत्यंत महत्वपूर्ण था। चीन के मिसाइल परीक्षणों पर नजर रखने के लिए CIA और भारतीय आईबी (IB) ने नंदा देवी की चोटी पर एक परमाणु संचालित सेंसर लगाने का प्रयास किया। हालांकि एक बर्फीले तूफान के कारण वह डिवाइस वहीं कहीं खो गई, जो आज भी एक रहस्य बनी हुई है।
यह डिवाइस आज भी नंदा देवी के ग्लेशियरों में कहीं दबी हुई है, जिसे दशकों तक दोनों सरकारों ने पूरी तरह गुप्त रखा। यह मिशन दर्शाता है कि भारत की सुरक्षा के लिए हमारी एजेंसियां किस हद तक जोखिम उठाती रही हैं।
हिंद महासागर और म्यांमार में रणनीतिक बढ़त
कूटनीति का खेल समंदर की लहरों पर भी खेला जाता है। 1986 में सेशेल्स के राष्ट्रपति के खिलाफ तख्तापलट की साजिश रची जा रही थी। राष्ट्रपति रेने ने भारत से मदद मांगी। बिना किसी अंतरराष्ट्रीय हो-हल्ले के, भारत ने अपने जंगी जहाज ‘आईएनएस विंध्यगिरि’ को सेशेल्स भेज दिया।
जहाज पर मौजूद मार्कोस कमांडो की भनक लगते ही विद्रोहियों का साहस टूट गया और बिना एक भी गोली चलाए तख्तापलट रुक गया। यही असली ‘नेवल डिप्लोमेसी’ है, जहाँ आपकी उपस्थिति ही शांति स्थापित करने के लिए पर्याप्त होती है।
जब बात राष्ट्रीय हितों की आती है, तो भारत कठोर रुख भी अपनाता है। 1998 का ‘ऑपरेशन लीच’ इसका गवाह है, जहाँ म्यांमार के उग्रवादियों और हथियार तस्करों के खिलाफ अंडमान द्वीप समूह में एक बड़ा ऑपरेशन चलाकर उनके नेटवर्क को ध्वस्त कर दिया गया। इसने दुनिया को संदेश दिया कि भारत की समुद्री सीमाओं में घुसपैठ बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
ग्लोबल स्पेशल फोर्सेज के साथ समन्वय
भारतीय सेना न केवल दूसरों को सिखाती है, बल्कि दुनिया की बेहतरीन सेनाओं से सीखती भी है। पैरा एसएफ और मार्कोस जैसे एलीट बल अमेरिका की ‘नेवी सील्स’ के साथ ‘वज्र प्रहार’ युद्धाभ्यास करते हैं। रूस की ‘स्पेट्सनाज़’ से हम बर्फीले इलाकों में लड़ना सीखते हैं, जबकि इजरायल की ‘सयेरेत मटकल’ के साथ क्लोज क्वार्टर बैटल का प्रशिक्षण साझा किया जाता है। यह हाइब्रिड वॉरफेयर की तैयारी है।
चीन के खिलाफ ‘नेकलेस ऑफ डायमंड्स’
भारत की इन तमाम गतिविधियों का केंद्र बिंदु चीन को संतुलित करना है। चीन जहां तानाशाह देशों को निगरानी और सर्विलांस की तकनीक देता है, वहीं भारत लोकतांत्रिक मूल्यों और आपसी विश्वास पर आधारित साझेदारी बनाता है। चीन के ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ के जवाब में भारत ने ‘नेकलेस ऑफ डायमंड्स’ की रणनीति अपनाई है।
भारत ने मॉरीशस, मालदीव और श्रीलंका जैसे देशों में ‘कोस्टल सर्विलांस रडार’ (CSR) नेटवर्क स्थापित किया है। इन रडार्स की लाइव फीड सीधे गुरुग्राम स्थित नौसेना मुख्यालय पहुँचती है। अब हिंद महासागर में चीन की कोई भी पनडुब्बी भारत की नजरों से छिप नहीं सकती।
इतना ही नहीं, फिलीपींस को ब्रह्मोस मिसाइल बेचना और वियतनाम को आईएनएस कृपाण उपहार में देना यह दर्शाता है कि भारत अब चीन के ‘बैकयार्ड’ में उसे घेरने की क्षमता रखता है। भारत का संदेश साफ है—यदि आप हमारे क्षेत्र में हस्तक्षेप करेंगे, तो हम आपके पड़ोसियों को इतना मजबूत बना देंगे कि आप वहीं उलझे रह जाएंगे।
इंडोनेशिया के सबंग पोर्ट और ओमान के दुक्म पोर्ट तक भारत की रणनीतिक पहुंच ने पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह के महत्व को कम कर दिया है। QUAD (क्वाड) के जरिए अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर भारत एक ऐसी व्यवस्था बना रहा है जहाँ नियम-आधारित व्यवस्था कायम रहे।
मालदीव की चुनौती और भविष्य का विजन
मालदीव में सरकार बदलने के बाद ‘इंडिया आउट’ के नारे लगे, लेकिन भारत ने धैर्य और परिपक्व कूटनीति का परिचय दिया। हमने सैन्य कर्मियों के स्थान पर असैन्य स्टाफ नियुक्त किया ताकि वहां की जनता को मिल रही स्वास्थ्य और तकनीकी सेवाएं बाधित न हों। यह भारत की परिपक्वता का प्रतीक है।
राष्ट्रीय सुरक्षा अब केवल सीमाओं की सुरक्षा तक सीमित नहीं है। जब भारत का रक्षा निर्यात बढ़ता है, तो विदेशी निवेश भी बढ़ता है क्योंकि निवेशक मजबूत सुरक्षा व्यवस्था वाले देशों को प्राथमिकता देते हैं। हमारी अर्थव्यवस्था और सैन्य शक्ति एक-दूसरे के पूरक हैं।
पुणे में श्रीलंकाई अफसरों का प्रशिक्षण लेना इस बात का प्रमाण है कि पड़ोसी देश अब चीन के कर्ज जाल के बजाय भारत के विश्वसनीय साथ को चुन रहे हैं। भारत आज एक ‘नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर’ बन चुका है, जो न केवल खुद को सुरक्षित रखता है बल्कि पूरे क्षेत्र में शांति और स्थिरता का आधार भी है।

