लिपुलेख विवाद: नेपाल की नई साजिश और भारत का करारा जवाब, काठमांडू से लंदन तक रची जा रही कूटनीतिक व्यूहरचना

दशकों पहले इस उपमहाद्वीप को बांटने वाली ब्रिटिश शक्तियों को आज भारत के खिलाफ एक मोहरे के रूप में इस्तेमाल करने की साजिश रची जा रही है। हैरानी की बात यह है कि यह कोशिश उस पड़ोसी देश द्वारा की जा रही है, जिसका जनजीवन और अर्थव्यवस्था काफी हद तक भारत के सहयोग पर टिकी है। भारत और नेपाल के बीच ‘रोटी-बेटी’ का सदियों पुराना रिश्ता रहा है, लेकिन वर्तमान में काठमांडू की राजनीति में एक ऐसा कूटनीतिक उबाल आया है जिसने दिल्ली को भी चौंका दिया है। काठमांडू के मेयर बालेन शाह ने भारत की सीमाओं और राष्ट्रीय अस्मिता को चुनौती देते हुए एक विवादास्पद बयान दिया है, जो सीधे तौर पर द्विपक्षीय संबंधों पर हमला है।

नेपाल का राजनीतिक तंत्र पिछले कुछ समय से भारत के प्रति आक्रामक रुख अपना रहा है। कभी सीमा पर जांच के नाम पर सख्ती, तो कभी भारतीय वाहनों पर भारी जुर्माना। लेकिन अब मामला और गंभीर हो गया है। नेपाल ने लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा जैसे भारत के रणनीतिक क्षेत्रों पर अपना दावा ठोकना शुरू कर दिया है। हद तो तब हो गई जब बालेन शाह जैसे नेताओं ने इस द्विपक्षीय मुद्दे में ब्रिटेन (UK) को घसीटने की वकालत कर दी। इस पुराने सीमा विवाद को अंतरराष्ट्रीय मंच पर ले जाने की नापाक कोशिश ने दुनिया का ध्यान खींचा है। आखिर नेपाल अचानक ब्रिटेन से मदद क्यों मांग रहा है? क्या भारत अपनी जमीन पर किसी तीसरे पक्ष की दखलंदाजी स्वीकार करेगा? आइए जानते हैं इस भू-राजनीतिक खेल की पूरी कहानी।

इस विवाद की जड़ें इतिहास के उन पन्नों में छिपी हैं, जो आज भी हिमालयी क्षेत्र में तनाव का कारण हैं। नेपाल का दावा 1816 की सुगौली संधि पर आधारित है। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के बीच हुई इस संधि में महाकाली नदी को पश्चिमी सीमा माना गया था। हालांकि, अंग्रेजों ने जानबूझकर नक्शों में नदी के उद्गम स्थल को लेकर अस्पष्टता छोड़ दी थी, जो आज दोनों देशों के बीच विवाद का मुख्य कारण बन गई है।

नेपाल का तर्क है कि महाकाली नदी का उद्गम लिम्पियाधुरा से होता है, इसलिए वह इन क्षेत्रों को अपना मानता है। इसके विपरीत, भारत के पास मौजूद पुख्ता ऐतिहासिक दस्तावेज, ब्रिटिश काल के राजस्व रिकॉर्ड और पुराने नक्शे प्रमाणित करते हैं कि नदी का वास्तविक उद्गम कालापानी के पास है। इसलिए ये क्षेत्र भारत के अभिन्न अंग हैं। नेपाल अपनी घरेलू राजनीति को चमकाने के लिए अक्सर सुगौली संधि का अधूरा राग अलापता रहता है।

सवाल यह उठता है कि इस मामले में ब्रिटेन की एंट्री क्यों? नेपाल के नेताओं का मानना है कि चूंकि ये सीमाएं ब्रिटिश राज के दौरान तय हुई थीं, इसलिए ब्रिटेन को इसकी मध्यस्थता करनी चाहिए। नेपाल ने न केवल चीन के साथ करीबी बढ़ाई है, बल्कि इस मुद्दे पर यूके सरकार से कूटनीतिक संपर्क साधने की भी कोशिश की है, ताकि भारत पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाया जा सके।

नेपाल की यह चाल स्पष्ट करती है कि वह इस मुद्दे का अंतरराष्ट्रीयकरण करना चाहता है। लेकिन उसे यह समझना होगा कि आज का भारत किसी भी वैश्विक दबाव के आगे नहीं झुकता। कश्मीर के मामले में भी भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अपने आंतरिक और द्विपक्षीय मामलों में किसी तीसरे देश का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं करेगा। कूटनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, ब्रिटेन का इस मामले से कोई लेना-देना नहीं है और भारत मध्यस्थता के किसी भी प्रस्ताव को सिरे से खारिज करता है।

भारत के लिए लिपुलेख दर्रा रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह उत्तराखंड और चीन के तिब्बत क्षेत्र के बीच स्थित है और आजादी के बाद से ही भारत के नियंत्रण में रहा है। यह दर्रा कैलाश मानसरोवर यात्रा का सबसे छोटा और सुगम मार्ग है। सैन्य दृष्टि से भी यह ऊंचाई पर स्थित होने के कारण चीन की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए एक अभेद्य किला है। इस क्षेत्र पर पकड़ ढीली करना भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ समझौता करने जैसा होगा।

तनाव तब और बढ़ गया जब भारत ने लिपुलेख मार्ग पर एक आधुनिक सड़क का निर्माण किया। यह सड़क भारतीय सेना को सीमा तक त्वरित पहुंच प्रदान करती है और तीर्थयात्रियों का समय बचाती है। यही विकास नेपाल और उसके पीछे खड़े चीन को खटक रहा है। नेपाल इसे अपनी संप्रभुता के लिए खतरा बता रहा है, जबकि यह भारत का अपने क्षेत्र में किया गया विकास कार्य है।

भारत सरकार ने नेपाल के इन दावों को पूरी तरह से निराधार बताया है। कूटनीतिक स्तर पर स्पष्ट कर दिया गया है कि लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा भारत के अटूट हिस्से हैं। नेपाल के एकतरफा नक्शे और दावे ऐतिहासिक तथ्यों से परे हैं और भारत इन्हें कभी स्वीकार नहीं करेगा। जब नेपाल ने इस संबंध में औपचारिक विरोध दर्ज कराया, तो भारत ने उसे तथ्यों के साथ खारिज कर दिया।

तनाव के बावजूद, भारत ने शांतिपूर्ण समाधान की पहल की है। दोनों देशों के बीच विशेषज्ञों, इतिहासकारों और सर्वेक्षकों की एक टीम बनाने पर सहमति बन रही है, जो वैज्ञानिक रूप से दस्तावेजों की जांच करेगी। भारत चाहता है कि विवाद का हल टकराव के बजाय संवाद और तथ्यों के आधार पर निकले। यह भारत का एक मास्टरस्ट्रोक है, जो केवल सच्चाई पर आधारित समाधान चाहता है।

नेपाल के भीतर भी इस मुद्दे पर मतभेद हैं। कट्टरपंथी दल इसे राष्ट्रवादी मुद्दा बनाकर भारत से टकराना चाहते हैं, जबकि समझदार वर्ग जानता है कि भारत से संबंध बिगाड़ना नेपाल की अर्थव्यवस्था के लिए आत्मघाती होगा। नेपाल ईंधन, दवाओं और खाद्यान्न के लिए भारत पर निर्भर है। लाखों नेपाली नागरिक भारत में कार्यरत हैं। केवल राजनीतिक फायदे के लिए भारत विरोधी भावनाओं को भड़काना नेपाल के लिए भविष्य में भारी पड़ सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि नेपाल यह सब चीन के उकसावे पर कर रहा है। इसी बीच नेपाल के पूर्व गृह मंत्री रबि लमिछाने की दिल्ली यात्रा को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या उनकी यह यात्रा काठमांडू और दिल्ली के बीच जमी कड़वाहट की बर्फ को पिघला पाएगी या नेपाल अपनी हठधर्मिता पर कायम रहेगा।

अंततः, नेपाल को यह समझना होगा कि ब्रिटेन जैसे बाहरी देशों को बुलाने से रिश्ते सुलझने के बजाय और अधिक जटिल हो जाएंगे। जिस ब्रिटेन के औपनिवेशिक शासन ने दुनिया को विभाजित किया, उससे न्याय की उम्मीद करना एक बड़ी भूल होगी। सीमा विवाद का समाधान अब लंदन या बीजिंग के इशारे पर नहीं, बल्कि दिल्ली की शर्तों और ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर ही होगा।

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