जब दो पड़ोसी मुल्क अपनी दोस्ती की तुलना हिमालय की ऊंचाइयों और समुद्र की गहराइयों से करते हों, तो उनके साझा प्रोजेक्ट्स पर दुनिया की नजरें टिकना स्वाभाविक है। करीब एक दशक पहले कुछ इसी तरह का माहौल बनाया गया था जब बड़े शोर-शराबे के साथ एक मेगा प्रोजेक्ट की शुरुआत हुई थी। इसे ‘गेमचेंजर’ और ‘मास्टरस्ट्रोक’ जैसे बड़े नामों से नवाजा गया और दावा किया गया कि यह पूरे दक्षिण एशिया का भाग्य बदल देगा। लेकिन आज 10 साल बाद, उस तथाकथित मास्टरप्लान की जो हालत हुई है, उसे देखकर पूरी दुनिया स्तब्ध है। 62 अरब डॉलर की भारी-भरकम राशि पानी की तरह बहा दी गई, लेकिन जमीनी हकीकत आज भी ‘सिफर’ ही नजर आती है।
आज हम आपको उस अंदरूनी कहानी से रूबरू करा रहे हैं जिसने बीजिंग से लेकर इस्लामाबाद तक बेचैनी पैदा कर दी है। यह चीन और पाकिस्तान के उस ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’ का किस्सा है जो अब एक भयावह दुःस्वप्न में तब्दील हो चुका है। हम बात कर रहे हैं सीपीईसी (CPEC) यानी चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे की, जिसकी हालिया रिपोर्टों ने चीन की ऐसी पोल खोली है कि ड्रैगन को अब जवाब देते नहीं बन रहा है।
आखिर यह CPEC क्या था और यह दुनिया का सबसे बड़ा ब्लंडर कैसे बन गया? इसे समझने के लिए फ्लैशबैक में जाना जरूरी है। चीन का सबसे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (BRI) है, और CPEC इसी BRI का सबसे अहम हिस्सा (फ्लैगशिप प्रोजेक्ट) था। चीन की योजना पाकिस्तान के रास्ते सीधे अरब सागर तक अपनी पहुंच बनाना थी। प्लान के मुताबिक पूरे पाकिस्तान में सड़कों का जाल, अत्याधुनिक पावर प्लांट्स, हाई-स्पीड रेलवे और विशाल इंडस्ट्रियल जोन बनाए जाने थे।
बीजिंग का मानना था कि वह अपने निवेश के जरिए पाकिस्तान को एक मजबूत आर्थिक केंद्र बना देगा और वहां से वैश्विक व्यापार को नियंत्रित करेगा। लेकिन कहावत है कि कमजोर बुनियाद पर खड़ी इमारत कभी सुरक्षित नहीं होती। ‘यूरोपियन टाइम्स’ की एक रिपोर्ट ने अब इस समूचे प्रोजेक्ट की विफलता का कच्चा चिट्ठा खोलकर रख दिया है।
रिपोर्ट के अनुसार, CPEC अब महज एक ऐसा प्रोजेक्ट रह गया है जिसमें अधूरे इंफ्रास्ट्रक्चर, बढ़ते हुए कर्ज के बोझ और ठप पड़े इंडस्ट्रियल जोन के अलावा कुछ नहीं बचा। दोनों देशों के बीच हताशा इस कदर बढ़ गई है कि चीन अब अपनी साख बचाने के लिए ‘CPEC 2.0’ का नया शिगूफा छोड़ रहा है। हालांकि, विशेषज्ञ इसे कोई नई शुरुआत नहीं, बल्कि अपने असफल मॉडल को राजनीतिक रूप से जीवित रखने की एक नाकाम कोशिश मान रहे हैं।
शुरुआत से ही इस प्रोजेक्ट के मॉडल में बुनियादी कमियां थीं। इसमें दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता के बजाय केवल दिखावे के बुनियादी ढांचे को प्राथमिकता दी गई। पाकिस्तान ने चीनी फंड और कंस्ट्रक्शन क्षमता तो हासिल कर ली, लेकिन वह ऐसा औद्योगिक ढांचा नहीं बना पाया जो लंबे समय तक रेवेन्यू दे सके। बिना उत्पादक उद्योगों, स्थिर निर्यात और प्रभावी प्रशासनिक तंत्र के, केवल सड़कें और बंदरगाह कभी भी विकास नहीं ला सकते।
अब बात करते हैं उस सबसे बड़े कारण की जिसने चीन के 62 अरब डॉलर डुबा दिए। दरअसल, चीन ने पाकिस्तान में जो पैसा लगाया, वह कोई मदद नहीं बल्कि एक व्यापारिक निवेश था। चीन ने खासकर बिजली और ऊर्जा क्षेत्र में भारी मुनाफे की उम्मीद में पैसा लगाया था। चीन और पाकिस्तान के बीच हुए समझौते इतने एकतरफा थे कि उनमें चीनी कंपनियों को डॉलर में ऊंचे रिटर्न की गारंटी दी गई थी।
जब पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था चरमराने लगी और पाकिस्तानी रुपये की वैल्यू गिरने लगी, तो संकट गहरा गया। पाकिस्तान में कमाई स्थानीय मुद्रा में हो रही थी, जबकि चीनी कंपनियों को भुगतान ‘मजबूत डॉलर’ में करना था। परिणाम यह हुआ कि पाकिस्तान इन चीनी कंपनियों का कर्ज चुकाने में पूरी तरह नाकाम हो गया और कर्ज का एक ऐसा दुष्चक्र शुरू हुआ जिसने देश की कमर तोड़ दी।
पाकिस्तान का ऊर्जा संकट (सर्कुलर डेट) इतना बढ़ चुका है कि 2025 तक केवल चीनी पावर कंपनियों का बकाया सात अरब डॉलर के पार पहुंच जाएगा। CPEC ने पाकिस्तान की बुनियादी समस्याओं को सुलझाने के बजाय उस पर और अधिक वित्तीय बोझ डाल दिया। पाकिस्तान का भुगतान संतुलन संकट और आईएमएफ (IMF) के सामने बार-बार हाथ फैलाने की मजबूरी ने इस कॉरिडोर मॉडल के खोखलेपन को पूरी दुनिया के सामने उजागर कर दिया है।
CPEC का सबसे चर्चित हिस्सा ग्वादर पोर्ट था। चीन का सपना ग्वादर को ‘नया दुबई’ या सिंगापुर बनाने का था। इसे एक ग्लोबल ट्रेड हब के रूप में प्रचारित किया गया, जो चीन के पश्चिमी हिस्से को अरब सागर से जोड़ने का शॉर्टकट था। लेकिन आज ग्वादर की हकीकत क्या है? वहां अरबों डॉलर का कंक्रीट का ढांचा तो तैयार है, लेकिन व्यापार नदारद है।
कोई भी बंदरगाह तभी सफल होता है जब वहां से जहाजों की आवाजाही और निर्यात हो। रिपोर्ट बताती है कि बुनियादी ढांचा तो बन गया, लेकिन इतना एक्सपोर्ट नहीं बढ़ पाया कि कर्ज चुकाने की क्षमता पैदा हो सके। निर्माण और आर्थिक उत्पादकता के बीच का यही गैप CPEC की सबसे बड़ी विफलता की वजह बना।
आज ग्वादर एक ‘घोस्ट पोर्ट’ यानी वीरान बंदरगाह बनकर रह गया है। चीन को उम्मीद थी कि इस पोर्ट से उसे इतना मुनाफा होगा कि उसका सारा निवेश वसूल हो जाएगा, लेकिन आज वहां का मेंटेनेंस खर्च निकालना भी मुश्किल हो रहा है। सिर्फ ढांचा खड़ा कर देने से अर्थव्यवस्था नहीं चलती, यह बात ग्वादर ने साबित कर दी है।
आर्थिक विफलता के अलावा CPEC अब चीन के लिए एक ‘सिक्योरिटी नाइटमेयर’ यानी सुरक्षा का सबसे बड़ा सिरदर्द बन गया है। बलूचिस्तान के स्थानीय लोग इस प्रोजेक्ट को अपनी जमीन और संसाधनों के शोषण के रूप में देखते हैं। उनका मानना है कि इस प्रोजेक्ट से न तो उन्हें रोजगार मिला और न ही कोई लाभ, बल्कि केवल उनके संसाधनों का दोहन किया जा रहा है।
इसी वजह से पूरे क्षेत्र में विद्रोह भड़क उठा है और सुरक्षा स्थिति बदतर हो गई है। चीनी इंजीनियरों और श्रमिकों पर लगातार हमले हो रहे हैं। बलूच विद्रोही इस कॉरिडोर को स्थानीय लोगों के खिलाफ एक साजिश मानते हैं, जिसके कारण वहां विरोध और हिंसक घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं।
जरा सोचिए, एक ऐसा आर्थिक प्रोजेक्ट जहां कर्मचारियों को बुलेटप्रूफ गाड़ियों और भारी सेना की सुरक्षा में काम करना पड़े, वह कितना टिकाऊ हो सकता है? चीन के लिए यह एक बड़ा झटका है, क्योंकि पाकिस्तान अपनी जमीन पर चीनी नागरिकों को सुरक्षा देने में विफल रहा है। इससे दोनों देशों के ‘आयरन ब्रदर्स’ वाले दावों की हवा निकल गई है।
कुल मिलाकर निष्कर्ष यह है कि CPEC न केवल एक वित्तीय आपदा है, बल्कि एक रणनीतिक भूल भी साबित हुआ है। चीन ने सोचा था कि वह कर्ज के जाल में फंसाकर पाकिस्तान को अपना मोहरा बना लेगा, लेकिन पाकिस्तान के भ्रष्टाचार, खोखले सिस्टम और विजन की कमी ने चीन के मास्टरप्लान को मिट्टी में मिला दिया।
आज CPEC उन तमाम देशों के लिए एक चेतावनी है जो चीन के BRI मॉडल का हिस्सा बनने की सोच रहे हैं। यह इस बात का सबूत है कि बिना किसी ठोस आर्थिक आधार के केवल कर्ज लेकर बड़े प्रोजेक्ट बनाना किसी भी देश को बर्बादी के रास्ते पर ले जा सकता है। ड्रैगन के 62 अरब डॉलर डूब चुके हैं और चीन अब खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है, क्योंकि उसने गलत जगह दांव लगाया था।

