पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में इस समय हालात बेहद विस्फोटक हो चुके हैं। इस्लामाबाद के हुक्मरानों में खौफ है और पाकिस्तानी सेना की पकड़ ढीली पड़ती नजर आ रही है। जिस क्षेत्र को पाकिस्तान ने दशकों तक अपनी कॉलोनी समझकर लूटा, आज वहां के नागरिकों ने इस्लामाबाद की सत्ता के खिलाफ सीधा मोर्चा खोल दिया है। स्थिति इतनी गंभीर है कि अब विरोध प्रदर्शनों की जगह गोलियों की आवाजें सुनाई दे रही हैं। यह महज एक सामान्य विरोध नहीं, बल्कि एक बड़े गृहयुद्ध की शुरुआत जैसा है, क्योंकि पीओके की जनता अब पाकिस्तान के अत्याचारों को सहने को तैयार नहीं है।
सड़कों पर होने वाली पत्थरबाजी अब आर-पार की सशस्त्र जंग में तब्दील हो गई है। ढालकोट क्रॉसिंग पर हुई हालिया घटना ने पाकिस्तान के सत्ता गलियारों को हिलाकर रख दिया है। पीओके के पूर्व कथित प्रधानमंत्री सरदार तनवीर इलियास के काफिले पर उस समय हमला हुआ जब वह सेंट्रल बाग में चुनाव प्रचार के लिए जा रहे थे। स्थानीय लोगों का आक्रोश इतना तीव्र था कि उनके काफिले पर जानलेवा फायरिंग की गई, जिसमें उनके एक सुरक्षा गार्ड की जान चली गई। हालांकि तनवीर इलियास सुरक्षित बच गए, लेकिन इस घटना ने स्पष्ट कर दिया है कि पीओके में अब पाकिस्तानी हुक्मरानों के लिए कोई जगह नहीं बची है।
यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर लोग इतने उग्र क्यों हैं? इसका जवाब दशकों से चले आ रहे आर्थिक शोषण और राजनीतिक धोखे में छिपा है। पाकिस्तान सरकार और वहां की सेना ने पीओके को हमेशा एक संसाधन संपन्न ‘एटीएम’ की तरह इस्तेमाल किया है। यहां के प्राकृतिक संसाधनों और पानी का इस्तेमाल पाकिस्तान को रोशन करने के लिए किया जाता है, जबकि पीओके खुद अंधेरे और भारी बिजली बिलों के बोझ तले दबा है। जब भी लोगों ने हक मांगा, उन्हें गोलियों से चुप कराने की कोशिश की गई, जिसका नतीजा आज इस विद्रोह के रूप में सामने है।
इस बड़े विद्रोह का नेतृत्व ‘जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी’ कर रही है। पिछले एक महीने से पूरा इलाका प्रदर्शनों की आग में जल रहा है। प्रदर्शनकारियों का स्पष्ट रुख है कि पाकिस्तान की किसी भी राजनीतिक पार्टी को उनके क्षेत्र में चुनाव लड़ने या प्रचार करने का नैतिक अधिकार नहीं है। गुस्से का आलम यह है कि पिछले दिनों पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (PPP) के एक बड़े नेता की गाड़ी को प्रदर्शनकारियों ने आग के हवाले कर दिया। लोगों का सीधा तर्क है कि जो पार्टियां उन पर गोलियां चलवाती हैं, वे अब वोट मांगने का हक खो चुकी हैं।
यह स्थिति इस्लामाबाद की रणनीतिक और प्रशासनिक विफलता का सबसे बड़ा प्रमाण है। पाकिस्तान वैश्विक मंचों पर कश्मीर का राग अलापता है, लेकिन वह अपने अवैध कब्जे वाले हिस्से को ही संभालने में नाकाम रहा है। पीओके में चुनाव कराने की उसकी जिद केवल दुनिया को यह दिखाने की एक नाकाम कोशिश है कि वहां सब ‘नॉर्मल’ है। हकीकत में, स्थानीय लोग अब इसे अपने अस्तित्व और सम्मान की लड़ाई मान रहे हैं और वे किसी भी तरह के राजनीतिक ढोंग को स्वीकार करने के मूड में नहीं हैं।
पाकिस्तानी सुरक्षा बलों और राजनेताओं के लिए पीओके अब एक दुःस्वप्न बनता जा रहा है। लोग देख रहे हैं कि सीमा के दूसरी तरफ भारत के जम्मू-कश्मीर में विकास की नई इबारत लिखी जा रही है—वहां आधुनिक अस्पताल, स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट और विदेशी निवेश आ रहा है। इसके विपरीत, पीओके की अवाम को दो वक्त के आटे के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। आसमान छूती महंगाई और बिजली की भारी किल्लत ने लोगों के सब्र का बांध तोड़ दिया है।
यह गुस्सा केवल राजनीतिक नहीं है, बल्कि उस पूरे तंत्र के खिलाफ है जिसने पीओके को गुलामी की बेड़ियों में रखा है। मुजफ्फराबाद से लेकर ढालकोट तक, पाकिस्तानी सत्ता को सीधी चुनौती दी जा रही है। लोग अब खोखले वादों से नहीं मानने वाले, वे सीधे तौर पर अपने अधिकारों की मांग कर रहे हैं। उनका संदेश साफ है: यदि अधिकार नहीं मिले, तो बगावत और तेज होगी।
पाकिस्तान ने नीलम-झेलम और मंगला डैम जैसे प्रोजेक्ट्स के जरिए पीओके के पानी का दोहन किया, लेकिन उसका फायदा केवल पंजाब के बड़े शहरों को मिला। पीओके के निवासियों पर भारी टैक्स और सरचार्ज थोपे गए हैं। जब अवामी एक्शन कमेटी ने इसके खिलाफ शांतिपूर्ण आवाज उठाई, तो उन पर लाठियां और आंसू गैस बरसाई गई। इस्लामाबाद की इसी दमनकारी नीति ने आज लोगों को हथियार उठाने और हिंसक विरोध करने पर मजबूर कर दिया है।
आज का युवा सोशल मीडिया के जरिए दुनिया देख रहा है। वह देख रहा है कि भारतीय कश्मीर में अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम हो रहे हैं और पर्यटन नई ऊंचाइयों को छू रहा है। अपनी तुलना में वह खुद को केवल बेरोजगारी और सेना की ज्यादतियों का शिकार पाता है। यही तुलना उनके भीतर असंतोष की अग्नि को और भड़का रही है। पाकिस्तानी हुक्मरान यह भूल गए कि जब जुल्म की इंतहा होती है, तो विद्रोह ही एकमात्र रास्ता बचता है।
इस्लामाबाद की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति अब काम नहीं कर रही है। वे वहां अपनी कठपुतली सरकारें बैठाते रहे हैं जो रावलपिंडी के जनरलों के इशारे पर चलती हैं। लेकिन इस बार अवाम ने फैसला कर लिया है कि वे किसी भी पाकिस्तानी दल को अपनी जमीन पर पैर नहीं रखने देंगे। पूर्व प्रधानमंत्री के काफिले पर हमला और पीपीपी नेता की गाड़ी जलाना इस बात का संकेत है कि जबरदस्ती करने पर वहां पूर्ण रूप से गृहयुद्ध छिड़ सकता है।
भारत के लिए भी यह एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक मोड़ है। भारत हमेशा से कहता रहा है कि पीओके उसका अभिन्न हिस्सा है। आज जब वहां की जनता खुद पाकिस्तान के क्रूर शासन के खिलाफ खड़ी है, तो भारत का पक्ष और मजबूत होता है। पाकिस्तान की सेना, जो भारत के खिलाफ आतंकी साजिशें रचती थी, आज अपने ही बनाए जाल में फंस गई है—न तो उसके पास अपनी अर्थव्यवस्था बचाने का रास्ता है और न ही पीओके की इस आग को बुझाने का दम।
अंत में, यह समझना जरूरी है कि जोर-जबर्दस्ती की नींव पर टिके साम्राज्य कभी स्थायी नहीं होते। पीओके में सुलगती यह चिंगारी इस्लामाबाद के लिए अंतिम चेतावनी है। वहां की जनता जाग चुकी है, और यह बगावत पाकिस्तान के दमनकारी शासन के अंत की शुरुआत हो सकती है।

