तुर्की की घेरेबंदी: भारत का चक्रव्यूह और ब्रह्मोस मिसाइल का खौफ, मुश्किल में एर्दोगन

भारत की संप्रभुता को चुनौती देने का क्या अंजाम होता है, यह अब तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन को स्पष्ट रूप से समझ आ रहा होगा। खुद को इस्लामी जगत का नया खलीफा बनाने की होड़ में एर्दोगन ने पाकिस्तान के साथ मिलकर ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के जरिए भारत को घेरने की जो साजिश रची थी, वह अब तुर्की के लिए ही संकट बन गई है। नई दिल्ली के रणनीतिक गलियारों से निकले एक गुप्त एक्शन प्लान ने अंकारा की नींद उड़ा दी है। आज स्थिति यह है कि तुर्की न केवल भारत, बल्कि मध्य पूर्व की महाशक्ति इजरायल के सीधे निशाने पर है। तुर्की में मची खलबली के बीच एर्दोगन रातों-रात सैन्य नियम बदल रहे हैं और आपातकालीन शक्तियों को बढ़ा रहे हैं। उन्हें एहसास हो चुका है कि भारत ने तुर्की को जवाब देने के लिए तीन देशों में अपनी अचूक ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल तैनात करने का मास्टरप्लान सक्रिय कर दिया है।

‘ऑपरेशन सिंदूर’ और एर्दोगन की विफल साजिश

इस पूरे तनाव की जड़ में तुर्की और पाकिस्तान का वह नेक्सेस है, जो भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने की कोशिश कर रहा था। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के नाम से चलाए गए इस गुप्त अभियान का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के खिलाफ दुष्प्रचार करना और कश्मीर मुद्दे पर जहर उगलना था। एर्दोगन को लगा था कि भारत केवल कूटनीतिक विरोध दर्ज कराएगा, लेकिन भारत ने बिना किसी शोर-शराबे के यूरेशिया का नक्शा बदलकर तुर्की को उसकी सीमाओं में घेरने का चक्रव्यूह तैयार कर लिया। भारत ने तुर्की के खिलाफ कोई खोखली धमकी देने के बजाय सीधे जमीन पर सामरिक बदलाव शुरू कर दिए हैं।

तुर्की के पड़ोस में भारत की दस्तक: आर्मेनिया से ग्रीस तक घेरेबंदी

भारत ने तुर्की को जवाब देने के लिए उसके विरोधियों—आर्मेनिया, ग्रीस और साइप्रस के साथ रक्षा संबंधों को अभूतपूर्व गति दी है। कॉकसस क्षेत्र में आर्मेनिया, जो तुर्की-अजरबैजान के बायरकतार ड्रोन्स का सामना कर रहा था, उसे भारत ने पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर और स्वाती वेपन लोकेटिंग रडार देकर शक्तिशाली बना दिया है। स्वाती रडार दुश्मन की लोकेशन ट्रैक करता है, जिसके बाद पिनाका महज 44 सेकंड में 72 रॉकेट दागकर दुश्मन के बेस को तबाह कर सकता है। भारतीय हथियारों की तैनाती ने तुर्की के सैन्य विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है।

भूमध्य सागर में ब्रह्मोस का बढ़ता साया

बात सिर्फ आर्मेनिया तक ही सीमित नहीं है। भूमध्य सागर में भारत ने ग्रीस और साइप्रस के साथ मिलकर एर्दोगन की ‘ब्लू होमलैंड’ नीति को कड़ी चुनौती दी है। जब भारतीय युद्धपोत ग्रीस के बंदरगाहों पर पहुँचते हैं, तो अंकारा में हलचल मच जाती है। सबसे बड़ी चिंता ग्रीस और साइप्रस में भारत की ‘ब्रह्मोस’ मिसाइल की संभावित तैनाती को लेकर है। अगर ब्रह्मोस को ग्रीस की सामरिक स्थिति के अनुसार तैनात किया गया, तो तुर्की का पश्चिमी तट और उसके प्रमुख नौसैनिक ठिकाने सीधे भारतीय मिसाइलों की जद में होंगे।

इजरायल का रडार और यरूशलम पोस्ट का खुलासा

भारत के कूटनीतिक प्रहार के साथ-साथ अब तुर्की इजरायल के रडार पर भी आ गया है। ‘यरूशलम पोस्ट’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, तुर्की के निर्वासित पत्रकार अब्दुल्ला बोजकुर्ट ने खुलासा किया है कि एर्दोगन सरकार सामान्य मिलिट्री रूटीन से हटकर कुछ बड़ी और गुप्त युद्ध की तैयारी कर रही है। तुर्की के रक्षा मंत्रालय में सैनिकों की छुट्टियां रद्द की जा रही हैं और हथियारों का जखीरा सीमाओं की ओर भेजा जा रहा है। इन तैयारियों का मुख्य लक्ष्य इजरायल को माना जा रहा है।

व्यापारिक अंत और युद्ध का मनोवैज्ञानिक माहौल

एर्दोगन ने खुद को मुस्लिम दुनिया का नेता दिखाने के लिए इजरायल के साथ वर्षों पुराने व्यापारिक रिश्ते लगभग खत्म कर दिए हैं। तुर्की के बंदरगाहों से इजरायल जाने वाले जहाजों को रोक दिया गया है। जब देशों के बीच व्यापार बंद हो जाता है, तो यह अक्सर युद्ध की आहट होती है। तुर्की के भीतर इजरायल के खिलाफ नफरत का माहौल बनाया जा रहा है ताकि सरकार के किसी भी आक्रामक फैसले को जनता का समर्थन मिल सके।

मई का ‘ब्लैक लॉ’: एर्दोगन की सैन्य तानाशाही

इस साल मई में एर्दोगन ने एक नया कानून लागू किया है, जो तुर्की को ‘वॉर-इकोनॉमी’ की ओर ले जा रहा है। इस नियम के तहत युद्ध जैसी स्थिति में सरकार किसी भी निजी कंपनी, नागरिक की संपत्ति, वाहनों और संसाधनों को सैन्य नियंत्रण में ले सकती है। यह स्थिति विश्व युद्ध के दौरान अधिनायकवादी देशों जैसी है। इस कानून के कारण विदेशी निवेशक तुर्की से भाग रहे हैं, जिससे वहां की अर्थव्यवस्था संकट में है, लेकिन एर्दोगन का पूरा ध्यान अपनी सैन्य महत्वाकांक्षाओं पर है।

बिना मंजूरी के ‘इमरजेंसी मोड’

नया कानून एर्दोगन को संसद की मंजूरी के बिना देश को ‘इमरजेंसी मोड’ में डालने की असीमित शक्ति देता है। अब उन्हें किसी भी सैन्य कार्यवाही के लिए विपक्ष या कैबिनेट की आवश्यकता नहीं है। लोकतंत्र के नाम पर यह तानाशाही अब पूरी तरह स्पष्ट हो चुकी है। जो भी इस सैन्य मोबिलाइजेशन पर सवाल उठाता है, उसे देशद्रोही बताकर जेल भेज दिया जाता है।

सीरिया बनेगा महाशक्तियों का युद्धक्षेत्र

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तुर्की और इजरायल के बीच सैन्य टकराव हुआ, तो उसका केंद्र सीरिया होगा। तुर्की ने पहले ही उत्तरी सीरिया में अपनी भारी सेना तैनात कर रखी है। वहीं इजरायल सीरिया के भीतर उन ठिकानों पर हमले कर रहा है जो उसकी सुरक्षा के लिए खतरा हैं। सीरिया अब एक ऐसा खतरनाक बोर्ड बन गया है जहाँ दोनों देशों की सेनाएं आमने-सामने हैं।

आसमान में टाइम बम और महायुद्ध का खतरा

सीरियाई हवाई क्षेत्र में इजरायल के F-35 और तुर्की के F-16 या ड्रोन्स अक्सर एक-दूसरे के करीब होते हैं। इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर के इस युग में रडार की एक छोटी सी गलती भी भीषण युद्ध शुरू कर सकती है। यदि किसी भी तरफ से कोई मिसफायर हुआ, तो सीरिया में एक ऐसा पूर्ण विकसित युद्ध शुरू हो जाएगा जिसे रोकना अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए असंभव होगा।

एर्दोगन को सता रहा है तख्तापलट का डर?

इजराइली विशेषज्ञों का मानना है कि एर्दोगन के इन आक्रामक फैसलों के पीछे अपनी ही सेना पर नियंत्रण रखने की कोशिश भी हो सकती है। 2016 के तख्तापलट के प्रयास के बाद से एर्दोगन डरे हुए हैं। देश में ‘बाहरी खतरे’ और युद्ध का डर पैदा करके वे सेना को अपने प्रति वफादार बनाए रखना चाहते हैं ताकि कोई उनके खिलाफ विद्रोह न कर सके।

विनाश की ओर तुर्की के कदम

स्पष्ट है कि तुर्की ने एक साथ कई मोर्चों पर दुश्मनी मोल लेकर जोखिम भरा रास्ता चुना है। भारत ने आर्मेनिया और ग्रीस को घातक हथियारों से लैस करके तुर्की को घेर लिया है, वहीं दूसरी ओर एर्दोगन इजरायल से टकराने की तैयारी कर रहे हैं। भारत और इजरायल के बीच गहरा सामरिक सहयोग तुर्की के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है। एर्दोगन की महत्वाकांक्षाएं तुर्की को तबाही की ओर ले जा रही हैं।

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