जब दुनिया की महाशक्ति अमेरिका भारत पर रक्षा सौदों को लेकर दबाव बना रहा हो और फ्रांस जैसा पुराना साथी भी अत्याधुनिक तकनीक देने में हिचकिचा रहा हो, ठीक उसी वक्त ब्राजील ने भारत के लिए अपने हाथ बढ़ाए हैं। ब्राजील का यह ऑफर इतना बड़ा है कि इसने पूरी दुनिया के रक्षा बाजारों में हलचल मचा दी है। रूस के बाद अब ब्राजील ने भारत के साथ ऐसी रणनीतिक साझेदारी का फैसला किया है, जिसने पश्चिमी देशों के बड़े-बड़े जानकारों को हैरान कर दिया है।
ब्राजील ने अपने सबसे आधुनिक सैन्य ट्रांसपोर्ट विमान की न केवल तकनीक, बल्कि उसकी पूरी की पूरी मैन्युफैक्चरिंग फैक्ट्री ही भारत में शिफ्ट करने का प्रस्ताव दिया है। एम्ब्रेयर का कहना है कि वे सिर्फ पुर्जे नहीं देंगे, बल्कि पूरा प्लांट भारत की धरती पर लगाएंगे। ब्राजील की इस धमाकेदार पेशकश ने अमेरिका को सोचने पर मजबूर कर दिया है। अब तक अमेरिका भारत-रूस की नजदीकियों से परेशान था, लेकिन अब एक और ताकतवर देश भारत के साथ मजबूती से खड़ा हो गया है।
इस बड़े खेल को समझने के लिए भारतीय वायुसेना की मौजूदा चुनौतियों को जानना जरूरी है। भारत को अपने पुराने पड़ते ट्रांसपोर्ट विमानों के बेड़े को जल्द से जल्द बदलने की जरूरत है। दशकों तक हम रूसी विमानों पर निर्भर रहे, लेकिन अब हमें ज्यादा आधुनिक और भरोसेमंद तकनीक चाहिए। इसी जरूरत को देखते हुए ब्राजील की एयरोस्पेस दिग्गज कंपनी ‘एम्ब्रेयर’ ने भारत के महिंद्रा ग्रुप के साथ हाथ मिलाया है।
एम्ब्रेयर ने स्पष्ट किया है कि यदि भारतीय वायुसेना उनके विमान को मीडियम ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट प्रोग्राम के लिए चुनती है, तो वे भारत में एक विशाल उत्पादन इकाई स्थापित करेंगे। यह कोई सामान्य बात नहीं है क्योंकि ब्राजील ने आज तक अपने देश के बाहर कहीं भी सैन्य विमान बनाने का प्लांट नहीं लगाया है। उन्होंने भारत को इस खास भरोसे के लिए चुना है, जिसके पीछे एक गहरी रणनीतिक सोच छिपी है।
ब्राजील जानता है कि भारत आज दुनिया की सबसे बड़ी उभरती हुई सैन्य शक्ति है और ‘मेक इन इंडिया’ सरकार की प्राथमिकता है। इस डील के तहत भारत में विमानों की केवल असेंबली नहीं होगी, बल्कि साओ पाउलो जैसा ही पूरा मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम भारत में तैयार किया जाएगा। इसका मतलब है कि केसी-390 मिलेनियम जैसे विमान का ढांचा, वायरिंग और एक-एक पुर्जा भारत में ही निर्मित होगा।
केसी-390 मिलेनियम कोई साधारण जहाज नहीं है। यह एक मल्टीरोल विमान है जो सेना के लिए संकटमोचक की भूमिका निभा सकता है। चाहे सैनिकों को तेजी से सीमा पर पहुंचाना हो, भारी रसद ढोना हो या फिर उड़ते हुए दूसरे लड़ाकू विमानों में ईंधन भरना हो, यह विमान हर मोर्चे पर बेमिसाल है।
जब इसकी तुलना अमेरिका के सी-130जे सुपर हरक्यूलिस से की जाती है, तो ब्राजीली विमान काफी आगे नजर आता है। अमेरिकी विमान जहां प्रोपेलर वाले टर्बोप्रॉप इंजन पर चलता है, वहीं केसी-390 में अत्याधुनिक टर्बोफैन जेट इंजन लगे हैं। जेट इंजन की वजह से यह विमान अमेरिकी जहाज के मुकाबले कहीं ज्यादा तेज उड़ सकता है और ज्यादा वजन ले जाने में सक्षम है।
हिमालय जैसे दुर्गम इलाकों और कम हवा वाले क्षेत्रों में तेज जेट इंजन भारतीय सेना के लिए वरदान साबित होंगे। एम्ब्रेयर ने इसे इस तरह डिजाइन किया है कि यह खराब रनवे या कच्ची मिट्टी वाली पटरियों पर भी आसानी से उतर सकता है, जो युद्ध जैसी स्थितियों में बहुत जरूरी होता है।
इस सौदे की सबसे बड़ी ताकत ‘तकनीक का हस्तांतरण’ है। एम्ब्रेयर ने बिना किसी शर्त के अपनी टॉप-लेवल टेक्नोलॉजी भारत को देने का वादा किया है। ब्राजील के इंजीनियर भारतीय विशेषज्ञों को प्रशिक्षित करेंगे और भारतीय इंजीनियरों को साओ पाउलो में ट्रेनिंग दी जाएगी, ताकि वे भविष्य में खुद ही इस पूरे प्लांट का संचालन कर सकें।
इस साझेदारी का उद्देश्य भारत में एमआरओ (रखरखाव, मरम्मत और ओवरहॉल) का एक विशाल केंद्र बनाना है। यदि यह केंद्र भारत में बनता है, तो यह पूरे एशिया का डिफेंस हब बन जाएगा। भविष्य में कोई भी एशियाई देश अगर ये विमान खरीदता है, तो सर्विसिंग के लिए उसे भारत आना होगा, जिससे देश में भारी विदेशी मुद्रा आएगी।
महिंद्रा और एम्ब्रेयर का यह गठबंधन भारत के निजी रक्षा क्षेत्र में नई जान फूंक देगा। इससे हजारों युवाओं को रोजगार मिलेगा और स्थानीय एमएसएमई कंपनियों को बड़े ऑर्डर मिलेंगे। भारत का लक्ष्य अब केवल अपनी जरूरतें पूरी करना नहीं, बल्कि दुनिया को किफायती दरों पर आधुनिक हथियार निर्यात करना है, जिससे पश्चिमी देशों के एकाधिकार को चुनौती मिलेगी।
भारत और ब्राजील का यह भरोसा पुराना है। भारतीय वायुसेना का ‘नेत्रा’ अवाक्स सिस्टम ब्राजील के ही एम्ब्रेयर ईआरजे 145 प्लेटफॉर्म पर आधारित है। बालाकोट एयर स्ट्राइक के दौरान इसी विमान ने भारतीय बेड़े को कमांड किया था।
अंतरिक्ष के क्षेत्र में भी इसरो ने 2021 में ब्राजील के अमेजोनिया-1 उपग्रह को सफलतापूर्वक लॉन्च किया था। इसके अलावा, पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंडिंग तकनीक के लिए भी ब्राजील भारत का सबसे बड़ा सहयोगी है, जो भारत की ऊर्जा सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
खेती और पशुपालन में भी हमारे रिश्ते बहुत गहरे हैं। ब्राजील की सबसे अधिक दूध देने वाली गायें भारत की ही ‘गीर’ और ‘नेल्लोर’ नस्ल की हैं। आज भारत उन्हीं उन्नत नस्लों के भ्रूण ब्राजील से वापस ले रहा है ताकि अपनी डेयरी उत्पादन क्षमता बढ़ा सके।
समुद्र के भीतर भी दोनों देश बड़ी तैयारी कर रहे हैं। पनडुब्बी निर्माण और परमाणु पनडुब्बी के डिजाइन को लेकर भारत और ब्राजील के बीच उच्च स्तरीय चर्चा जारी है, क्योंकि दोनों ही देश फ्रांसीसी तकनीक का इस्तेमाल करते हैं।
इन सभी कड़ियों को जोड़ने पर साफ पता चलता है कि भारत और ब्राजील का गठबंधन ग्लोबल साउथ की एक नई आवाज है। ब्रिक्स के ये दोनों सदस्य देश अब डॉलर के वर्चस्व और पश्चिमी देशों की मनमानी को कड़ी चुनौती दे रहे हैं।
भारत की ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ विदेश नीति ने यह संदेश दे दिया है कि यदि किसी को भारत के साथ व्यापार करना है, तो उसे ‘मेक इन इंडिया’ को अपनाना होगा। पश्चिमी देशों का यह भ्रम टूट चुका है कि वे अपनी शर्तों पर भारत को हथियार बेचते रहेंगे।
हालांकि कागजी कार्रवाई और टेंडर प्रक्रिया पूरी होने में अभी कुछ समय लगेगा, लेकिन एक बार कॉन्ट्रैक्ट फाइनल होने के बाद भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो जाएगा, जो खुद जंबो साइज सैन्य विमान बना सकते हैं। यह ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान की अब तक की सबसे बड़ी और ऐतिहासिक जीत होगी।

