भारत की नई कूटनीति: चाबहार समझौता और चीन का ‘मलक्का डिलेमा’—नई दिल्ली का मास्टरप्लान

महाशक्तियों की बिसात पर भारत का पहला ग्लोबल मास्टरस्ट्रोक

जब भारत अपने प्रमुख रक्षा सहयोगी इज़राइल के साथ कूटनीतिक मंच साझा करता है, तो मध्य पूर्व की राजनीति में हलचल मच जाती है। लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि ईरान, जो इज़राइल का घोर विरोधी है, भारत के इस कदम पर शांत रहता है। यहाँ तक कि अमेरिकी प्रतिबंधों के भारी दबाव के बीच जब भारत ने ईरान से तेल खरीदना कम किया, तब भी तेहरान ने भारत के लिए अपने रास्ते बंद नहीं किए। मई 2024 में वाशिंगटन की चेतावनियों को दरकिनार करते हुए भारत और ईरान ने चाबहार पोर्ट के लिए 10 साल का ऐतिहासिक समझौता किया, जिसने पूरी दुनिया को चकित कर दिया।

ईरान और भारत के बीच कभी-कभी कश्मीर जैसे मुद्दों पर बयानबाजी जरूर होती है, लेकिन पर्दे के पीछे की यह ‘अनकंडीशनल दोस्ती’ किसी भी वैश्विक दबाव में नहीं टूटती। अंतरराष्ट्रीय संबंधों की इस बिसात पर यह एक ऐसा रणनीतिक मास्टरस्ट्रोक है, जिसे दुनिया के बड़े-बड़े थिंक टैंक्स आज भी समझने की कोशिश कर रहे हैं।

इस गहरे रिश्ते की जड़ें हालिया व्यापारिक समझौतों में नहीं, बल्कि दोनों सभ्यताओं के हजारों साल पुराने साझा इतिहास में हैं। सदियों पहले मध्य एशिया से निकले आर्यों का एक समूह सिंधु घाटी की ओर आया, जबकि दूसरा ईरान के पठार पर बस गया। यही कारण है कि हिंदू धर्म के ऋग्वेद और पारसी धर्म के जेंद अवेस्ता की भाषा और व्याकरण में अद्भुत समानता पाई जाती है।

यह ऐतिहासिक जुड़ाव आज भी जीवंत है। आधुनिक हिंदी और उर्दू के लगभग 30 से 40 प्रतिशत शब्द फारसी से आए हैं। ज़मीन, आसमान, बाज़ार, शादी, और दोस्त जैसे शब्द ईरान की ही सांस्कृतिक देन हैं। जब एक भारतीय और ईरानी मिलते हैं, तो उन्हें किसी अनुवादक की नहीं, बल्कि उस सदियों पुरानी समझ की आवश्यकता होती है जो उनके भीतर रची-बसी है।

कूटनीति के पीछे का अटूट विश्वास और ऐतिहासिक विरासत

ईरानी नेतृत्व यह जानता है कि भारत कभी भी पश्चिम का पिछलग्गू नहीं बनेगा। भारत इज़राइल से रक्षा उपकरण जरूर खरीदता है, लेकिन वह कभी ईरान विरोधी सैन्य गठबंधन का हिस्सा नहीं बना। इस विश्वास की नींव 1979 की इस्लामी क्रांति के दौरान पड़ी थी। अयातुल्लाह खुमैनी के नेतृत्व में हुए सत्ता परिवर्तन के बाद जब पश्चिमी देशों ने ईरान का बहिष्कार किया, तब भारत ने अपनी स्वतंत्र विदेश नीति अपनाते हुए तेहरान के साथ कूटनीतिक और व्यापारिक संबंध बनाए रखे।

जब पूरी दुनिया ईरान से दूरी बना रही थी, तब भारत ने अपने दरवाजे खुले रखे। ईरानियों के मन में यह बात घर कर गई कि संकट के समय भारत ही उनके साथ खड़ा था।

भारतीयों के लिए ईरान में जो सम्मान है, वह गहरा और सामाजिक है। ईरानी समाज में बुजुर्गों का सम्मान और पारिवारिक मूल्यों की प्रधानता भारत के समान ही है। इसी सामाजिक समानता के कारण ईरान में भारतीयों को सहजता से स्वीकार किया जाता है।

भारत की सॉफ्ट पावर ने भी यहाँ बड़ी भूमिका निभाई है। राज कपूर से लेकर शाहरुख खान तक, भारतीय सिनेमा का जो क्रेज ईरान में रहा है, उसने भारतीयों को हर ईरानी घर का हिस्सा बना दिया है।

खुफिया गठजोड़ और सत्ता के गलियारों का अनसुना रहस्य

ईरानी क्रांति के नेता अयातुल्लाह खुमैनी का भारत से खून का रिश्ता था। उनके दादा, सैयद अहमद मूसवी, उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के मूल निवासी थे। खुमैनी अपनी जवानी की कविताओं में ‘हिंदी’ उपनाम का प्रयोग करते थे। उन्होंने अपनी भारतीय जड़ों को कभी नहीं छिपाया, जो भारत के प्रति उनके जुड़ाव को दर्शाता है।

1990 के दशक में जब अफगानिस्तान में पाकिस्तान समर्थित चरमपंथ बढ़ रहा था, तब भारत की रॉ और ईरान की खुफिया एजेंसियों ने मिलकर ‘नॉर्दर्न अलायंस’ की मदद की थी। भारत ताजिकिस्तान के रास्ते और ईरान जमीनी रास्ते से रसद पहुंचाता था। बिना ईरान की भौगोलिक सहायता के भारत अफगानिस्तान में पाकिस्तान के नेटवर्क को काउंटर नहीं कर पाता।

आज भारत ‘डी-हाइपनेशन’ की कूटनीति पर चल रहा है। वह इज़राइल से अत्याधुनिक ‘हार्ड पावर’ (मिसाइल, ड्रोन) लेता है और ईरान से वह ‘जियोस्ट्रैटेजिक डेप्थ’ प्राप्त करता है जो उसे सीधे मध्य एशिया और यूरेशिया तक पहुँचाती है।

चाबहार और आईएनएसटीसी (INSTC): चीन-पाकिस्तान को सीधी चुनौती

पाकिस्तान ने भारत के लिए अफगानिस्तान का जमीनी रास्ता बंद कर रखा है, जिसका अचूक तोड़ ईरान का चाबहार पोर्ट है। मई 2024 का 10 वर्षीय समझौता सीधे तौर पर चीन द्वारा विकसित पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट को चुनौती देता है। भारत का ईरान में निवेश ड्रैगन के विस्तारवादी इरादों पर लगाम लगाने के लिए बेहद जरूरी है।

इसके साथ ही, इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) भारत को ईरान और अजरबैजान के रास्ते सीधे रूस से जोड़ता है। यह स्वेज नहर के मुकाबले 30% सस्ता और 40% छोटा रास्ता है। वैश्विक व्यापार के लिए यह कॉरिडोर एक नया गेम-चेंजर साबित होने वाला है।

पूर्वी मोर्चा: चिकन नेक और ‘ऑफेंसिव डिफेंस’ की नई रणनीति

भारत की रणनीति केवल पश्चिम तक सीमित नहीं है। पूर्वी मोर्चे पर भारत ने अपनी रक्षा नीति को ‘डिफेंसिव’ से बदलकर ‘ऑफेंसिव डिफेंस’ कर दिया है। अगर बांग्लादेश के रास्ते में कभी अस्थिरता आती है, तो भारत के पास ‘प्लान बी’ और ‘प्लान सी’ पूरी तरह से तैयार हैं।

म्यांमार के जरिए तैयार हो रहा कलादान मल्टी-मोडल प्रोजेक्ट भारत का अपना ‘मलक्का बाईपास’ है। यह कोलकाता बंदरगाह को म्यांमार के सिटवे बंदरगाह और फिर मिजोरम से जोड़ता है। भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग भी एक मजबूत विकल्प के रूप में खुला हुआ है।

हवाई क्षेत्र में भारत ने ‘वर्टिकल बाईपास’ तैयार किया है। पूर्वोत्तर में पासीघाट और तवांग जैसे एडवांस लैंडिंग ग्राउंड्स पर सी-17 ग्लोबमास्टर जैसे विशालकाय मिलिट्री विमान आसानी से लैंड कर सकते हैं। चिनूक हेलीकॉप्टर्स की तैनाती ने दुर्गम पहाड़ियों में भारी तोपों को पहुंचाना आसान बना दिया है।

चीन का ‘मलक्का डिलेमा’ और भारत का सामरिक वर्चस्व

चीन का 80% कच्चा तेल मलक्का जलडमरूमध्य से गुजरता है, जिसे भारतीय नौसेना अंडमान-निकोबार से ब्लॉक करने की क्षमता रखती है। इसे चीन का ‘मलक्का डिलेमा’ कहा जाता है। पहले बीजिंग भारत के सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) को कमजोरी मानता था, लेकिन अब भारत ने वहां 17वीं माउंटेन स्ट्राइक कॉर्प्स तैनात कर पासा पलट दिया है।

ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल और पिनाका रॉकेट सिस्टम की तैनाती ने दुश्मन के लिए किसी भी दुस्साहस की गुंजाइश खत्म कर दी है। रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व और पहाड़ों के भीतर सीक्रेट सुरंगें बनाकर भारतीय सेना ने महीनों का गोला-बारूद जमा कर लिया है।

ब्रह्मपुत्र पर बने बोगीबील जैसे मजबूत पुल अब 60 टन के अर्जुन टैंकों का भार उठाने में सक्षम हैं। यह बुनियादी ढांचा भारत के नए सामरिक आत्मविश्वास का प्रतीक है।

भारत अब रक्षा के लिए दूसरों पर निर्भर रहने वाला देश नहीं, बल्कि वैश्विक सप्लाई चेन और सुरक्षा का एक नया केंद्र बन चुका है। भारत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह अपनी समुद्री ताकत और रणनीतिक कूटनीति के दम पर भूगोल को अपनी ढाल बना सकता है। सिलीगुड़ी कॉरिडोर से लेकर चाबहार तक, भारत की यह ‘ऑफेंसिव डिफेंस’ नीति 21वीं सदी की नई वैश्विक व्यवस्था का आधार है।

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