कश्मीर के मुद्दे पर दशकों से दुनिया के सामने भारत के खिलाफ जहर उगलने वाले 57 इस्लामिक देशों के संगठन (OIC) में अचानक छाई खामोशी क्या किसी बड़े तूफान का संकेत है? बंद कमरों के भीतर आखिर कौन सी ऐसी कूटनीतिक बिसात बिछाई गई कि सऊदी अरब, यूएई और कतर जैसे दिग्गज मुस्लिम देशों ने पाकिस्तान के कश्मीर एजेंडे को दरकिनार कर दिया? जब दुनिया के सबसे बड़े मुस्लिम आबादी वाले देश इंडोनेशिया में प्रधानमंत्री मोदी का भव्य स्वागत हुआ, तो बीजिंग के सत्ता गलियारों में हलचल क्यों तेज हो गई? एक तरफ समंदर के पूर्वी छोर पर भारत की धमक दिख रही थी, तो दूसरी तरफ पश्चिम में विदेश मंत्री एस जयशंकर चार महत्वपूर्ण खाड़ी देशों में एक गोपनीय और शक्तिशाली मिशन को अंजाम दे रहे थे। यह महज कोई संयोग नहीं है, बल्कि भारत का वह महा-चक्रव्यूह है जिसने रातों-रात वैश्विक शक्ति संतुलन का केंद्र ही बदल दिया है।
होर्मुज जलडमरूमध्य से लेकर मलक्का तक, भारत ने समंदर की उन नसों पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली है जहां से वैश्विक व्यापार और तेल की आपूर्ति होती है। यदि आप इसे केवल सामान्य विदेशी दौरा समझ रहे हैं, तो आप इस सदी के सबसे बड़े भू-राजनीतिक बदलाव को नजरअंदाज कर रहे हैं। दशकों तक भारत की विदेश नीति हिचकिचाहट और डर के साये में रही—जैसे इजरायल के करीब जाने पर अरब देशों के नाराज होने का डर। लेकिन आज के ‘न्यू इंडिया’ ने इस धारणा को पूरी तरह बदल दिया है। भारत अब रक्षात्मक मुद्रा को छोड़कर सीधे तौर पर ‘ऑफेंसिव जियो-इकोनॉमिक्स’ यानी आक्रामक आर्थिक कूटनीति पर उतर आया है। प्रधानमंत्री का पूर्व में इंडोनेशिया जाना और विदेश मंत्री का पश्चिम में कतर, बहरीन, कुवैत और ओमान का दौरा करना इसी सुनियोजित ग्लोबल मास्टरप्लान की कड़ी है।
आंकड़ों की बात करें तो भारत अपनी जरूरत का 85% कच्चा तेल और 50% से अधिक प्राकृतिक गैस आयात करता है। कतर आज दुनिया का सबसे बड़ा एलएनजी निर्यातक है, जबकि कुवैत और ओमान हमारी ऊर्जा सुरक्षा के स्तंभ हैं। लेकिन अब खेल बदल चुका है। भारत अब केवल एक ग्राहक नहीं, बल्कि एक साझीदार बनकर खड़ा है। भारतीय रिज़र्व बैंक और खाड़ी देशों के केंद्रीय बैंकों के बीच स्थानीय मुद्रा (रुपया और दिरहम) में व्यापार के समझौते हो रहे हैं। भारत का यूपीआई सिस्टम अब मिडिल-ईस्ट के वित्तीय तंत्र का हिस्सा बन रहा है। भारत अब इन देशों की बड़ी रिफाइनरियों और पेट्रोकेमिकल परियोजनाओं में निवेश कर रहा है, जो डॉलर पर निर्भरता कम करने की दिशा में एक बड़ा वैश्विक कदम है।
भारत ने अपनी ‘डी-हाइफेनेशन’ नीति को इतना सशक्त बना दिया है कि आज हम एक तरफ इजरायल के साथ मिलकर उन्नत हथियार बना रहे हैं, तो दूसरी तरफ वही अरब देश भारत का पलक-पावड़े बिछाकर स्वागत कर रहे हैं। इसे ‘सामरिक स्वायत्तता’ (Strategic Autonomy) कहते हैं। जैसे-जैसे अमेरिका मिडिल-ईस्ट से अपनी सैन्य उपस्थिति कम कर रहा है और चीन अपने ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ के जरिए कर्ज का जाल बिछा रहा है, भारत ने बिना किसी टकराव के इस क्षेत्र में अपना गहरा प्रभाव बना लिया है। भारत यह सुनिश्चित कर रहा है कि भविष्य की क्षेत्रीय सुरक्षा और व्यापार की मेज पर उसकी भूमिका निर्णायक हो।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा झटका पाकिस्तान को लगा है। पाकिस्तान ने वर्षों तक ओआईसी का इस्तेमाल भारत के खिलाफ नैरेटिव बनाने के लिए किया, लेकिन आज सऊदी अरब और यूएई जैसे देशों के साथ भारत के आर्थिक और रक्षा संबंध इतने गहरे हैं कि कश्मीर पर उनका रुख पूरी तरह बदल गया है। पाकिस्तान का दुष्प्रचार अब नाकाम हो चुका है। वहीं दूसरी ओर, इंडोनेशिया में भारत की बढ़ती सक्रियता से चीन की बेचैनी बढ़ गई है। आसियान का सबसे बड़ा देश इंडोनेशिया आज भारत के साथ सैन्य अभ्यास और रक्षा उद्योग में सहयोग बढ़ा रहा है। ब्रह्मोस मिसाइल जैसे हथियारों के निर्यात की संभावना चीन के समुद्री विस्तारवाद के खिलाफ एक अभेद्य सुरक्षा कवच तैयार कर रही है।
आम भारतीय नागरिक के लिए इस कूटनीति का अर्थ उसकी आर्थिक सुरक्षा और देश की मजबूती से है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में जो व्यवधान आया, उसे देखते हुए भारत को निरंतर ऊर्जा आपूर्ति की आवश्यकता है। खाड़ी देशों के साथ हमारे दीर्घकालिक समझौते यह सुनिश्चित करते हैं कि वैश्विक संकट के समय भी भारत में ईंधन की कीमतें अनियंत्रित न हों। इसके अलावा, खाड़ी देशों में रहने वाले लगभग 90 लाख भारतीय जो विदेशी मुद्रा भेजते हैं, वे हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। इन देशों के शीर्ष नेतृत्व के साथ प्रगाढ़ संबंध हमारे नागरिकों की सुरक्षा के लिए एक मजबूत गारंटी की तरह हैं।
एस जयशंकर की कतर यात्रा केवल व्यापार तक सीमित नहीं थी। कतर से भारत के 8 पूर्व नौसैनिकों की सुरक्षित रिहाई इस कूटनीतिक जीत का सबसे बड़ा प्रमाण है। आज भारत उस नेगोशिएशन टेबल पर मौजूद है जहां अमेरिका और ईरान जैसे देशों के बीच वार्ता होती है। पहले जहां मिडिल-ईस्ट के कुछ हिस्सों से कट्टरपंथी नेटवर्क को शह मिलती थी, आज वहां की इंटेलिजेंस एजेंसियां भारत के साथ रियल-टाइम डेटा साझा करती हैं। भारत विरोधी तत्वों को अब वहां शरण मिलना नामुमकिन है, और उन्हें तुरंत प्रत्यर्पित कर भारत लाया जा रहा है।
समुद्री रास्तों पर नियंत्रण के मामले में भारत ने ‘एक्ट ईस्ट’ और ‘लिंक वेस्ट’ नीतियों के संगम से दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण चोक पॉइंट्स—होर्मुज, बाब-अल-मंडेब और मलक्का—पर अपना प्रभाव बढ़ा लिया है। ओमान के दुक्म पोर्ट तक भारतीय नौसेना की पहुंच एक मास्टरस्ट्रोक है, जो अरब सागर में हमारी सामरिक शक्ति को बेजोड़ बनाता है। यदि भविष्य में इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में हमारे व्यापारिक हितों को कोई चुनौती देता है, तो भारत के पास मित्र देशों के बंदरगाहों का पूरा सहयोग होगा। यह वह अघोषित शक्ति है जिसे अब दुनिया की महाशक्तियां भी महसूस कर रही हैं।
भारत अब किसी महाशक्ति का पिछलग्गू नहीं, बल्कि वैश्विक व्यवस्था का संचालक बन रहा है। इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर (IMEC) इसी दीर्घकालिक योजना का हिस्सा है, जो चीन के ‘कर्ज के जाल’ वाली नीति का एक पारदर्शी और मजबूत विकल्प है। भारत ने खाड़ी देशों का जो भरोसा जीता है, वह दिल्ली की सशक्त लीडरशिप का परिणाम है। पूर्व में आसियान और पश्चिम में खाड़ी देशों के बीच सामंजस्य बिठाना भारत की बढ़ती वैश्विक क्षमता का परिचायक है।
यह रणनीति भारत को एक वैश्विक महाशक्ति के रूप में स्थापित करने की दिशा में निर्णायक है। चीन जहां निवेश के नाम पर देशों को गुलाम बनाता है, वहीं भारत विश्वास, तकनीक और साझा प्रगति के आधार पर स्थायी साझेदारी बना रहा है। जब भारत दुनिया के सबसे बड़े व्यापारिक मार्गों और ऊर्जा केंद्रों को अपने राष्ट्रीय हितों के साथ जोड़ रहा है, तो स्पष्ट है कि विश्व का नया क्रम अब भारत की शर्तों पर तय होगा।

