दुनिया अभी ठीक से जाग भी नहीं पाई थी कि यूक्रेन की राजधानी कीव का आसमान खतरों के सायरन से गूंज उठा। सोमवार की तड़के, जब शहर गहरी नींद में था, रूस ने अपनी सैन्य शक्ति का खौफनाक रूप दिखाया। आसमान से बैलिस्टिक मिसाइलों, क्रूज मिसाइलों और घातक ड्रोन्स की बारिश होने लगी। कीव के केंद्र में एक के बाद एक हुए जोरदार धमाकों ने वैश्विक कूटनीति में खलबली मचा दी है। यह केवल एक सैन्य हमला नहीं, बल्कि व्लादिमीर पुतिन द्वारा वाशिंगटन और यूरोप के शक्ति केंद्रों को भेजा गया एक कड़ा भू-राजनीतिक संदेश है।
इस हमले के समय (टायमिंग) को समझना अत्यंत आवश्यक है। यह कोई आकस्मिक हमला नहीं है, बल्कि तुर्की की राजधानी अंकारा में होने वाले महत्वपूर्ण नाटो शिखर सम्मेलन (NATO Summit) से ठीक पहले किया गया है। इस सम्मेलन में पश्चिमी देशों के दिग्गज नेताओं के साथ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी शामिल होने वाले हैं। अंकारा समिट से मात्र 24 घंटे पहले कीव पर मिसाइलें दागकर पुतिन ने स्पष्ट कर दिया है कि वह किसी दबाव में नहीं आएंगे। पुतिन ने एक तरह से नाटो के एजेंडे को प्रभावित किया है, अब वहां चर्चा की शुरुआत कीव के इन धमाकों से ही होगी।
तकनीकी दृष्टिकोण से देखें तो यह एक बड़ा ऑपरेशन था। यूक्रेनी वायु सेना के अनुसार, रूस ने अपनी उन्नत बैलिस्टिक मिसाइलों का उपयोग किया जो पलक झपकते ही लक्ष्य को भेद देती हैं। इसके साथ ही क्रूज मिसाइलों और ‘कामिकाज़े’ ड्रोन्स का झुंड भेजा गया ताकि यूक्रेन की वायु रक्षा प्रणाली (Air Defense System) को उलझाया जा सके। आसमान में युद्ध का एक भयावह दृश्य बन गया था। हालांकि यूक्रेन के डिफेंस सिस्टम ने कई मिसाइलों को मार गिराया, लेकिन इस टकराव के विनाशकारी निशान जमीन पर साफ देखे जा सकते हैं।
कीव के मेयर विटाली क्लिट्स्को के अनुसार, मार गिराई गई मिसाइलों और ड्रोन्स का मलबा कीव के दो प्रमुख जिलों में गिरा है। इससे कई इमारतों में आग लग गई और नागरिक बुनियादी ढांचे को काफी नुकसान पहुंचा है। धमाकों से पहले बजते सायरनों ने लोगों को बंकरों और अंडरग्राउंड शेल्टर की ओर भागने पर मजबूर कर दिया। यह खौफनाक मंजर कीव के लोग महीनों से झेल रहे हैं, लेकिन इस बार हमले की तीव्रता और योजना बहुत अधिक थी, जिसे हाल के समय के सबसे बड़े हमलों में से एक माना जा रहा है।
दिलचस्प बात यह है कि राष्ट्रपति वलोडिमिर जेलेंस्की को इस हमले की आशंका पहले से थी। उन्होंने ‘X’ (पूर्व में ट्विटर) पर चेतावनी दी थी कि रूस किसी बड़ी सैन्य कार्रवाई की तैयारी कर रहा है। जेलेंस्की ने इसकी रणनीति को डिकोड करते हुए कहा कि पुतिन का यह पुराना तरीका है—अमेरिकी स्वतंत्रता दिवस (4 जुलाई) के तुरंत बाद और नाटो समिट से पहले हमला करना। इसका मुख्य उद्देश्य इमारतों को नष्ट करने के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक दबाव बनाना और शिखर सम्मेलन से पहले डर का माहौल पैदा करना है।
इस पूरे घटनाक्रम में दुनिया की नजरें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर टिकी हैं। अपनी आक्रामक विदेश नीति के लिए मशहूर ट्रंप नाटो के मंच पर क्या रुख अपनाते हैं, यह देखना महत्वपूर्ण होगा। अंकारा में जब ट्रंप अन्य नाटो नेताओं के साथ बैठेंगे, तो यूक्रेन को सैन्य सहायता और वैश्विक सुरक्षा का मुद्दा सबसे ऊपर होगा। पुतिन ने इस हमले के जरिए ट्रंप के सामने एक सीधी चुनौती पेश की है, यह परखने के लिए कि क्या नाटो इस दबाव में अपनी रणनीति बदलता है या नहीं।
अंकारा में होने वाला यह शिखर सम्मेलन ऐतिहासिक महत्व रखता है, जिसे कीव हमले ने और भी गंभीर बना दिया है। इसमें यूक्रेन युद्ध के भविष्य को लेकर बड़े फैसले लिए जा सकते हैं। यूरोपीय नेता और अमेरिका इस बात पर चर्चा करेंगे कि रूस के इस बढ़ते आक्रमण का जवाब कैसे दिया जाए। पुतिन जानते हैं कि नाटो देश यूक्रेन को लंबी दूरी के हथियारों और नए डिफेंस सिस्टम देने पर विचार कर रहे हैं, इसलिए यह हमला एक चेतावनी है कि यदि रेड लाइन क्रॉस की गई, तो रूस भी पीछे नहीं हटेगा।
जमीन पर लड़ रहे यूक्रेनी सैनिकों और नागरिकों के लिए यह समय बहुत कठिन है। एयर डिफेंस सिस्टम ने कीव को पूरी तरह तबाह होने से तो बचा लिया, लेकिन लगातार बढ़ते हवाई हमलों को रोकना चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है। रूस अब केवल फ्रंटलाइन पर नहीं लड़ रहा, बल्कि वह यूक्रेन के पावर ग्रिड्स और एनर्जी इन्फ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाकर देश को भीतर से कमजोर करने की कोशिश कर रहा है।
यह घटना दर्शाती है कि आधुनिक युद्ध केवल हथियारों से नहीं, बल्कि टायमिंग और कूटनीति से भी लड़ा जाता है। मिसाइलें कीव में गिरी हैं, लेकिन उनकी गूँज अंकारा से वाशिंगटन तक है। कूटनीति की इस बिसात पर रूस ने अपनी चाल चल दी है, अब देखना है कि नाटो और डोनाल्ड ट्रंप इसका जवाब किस तरह देते हैं। क्या ट्रंप अपनी चिर-परिचित शैली में रूस को कोई कड़ा अल्टीमेटम देंगे या युद्ध कूटनीतिक बयानों में ही उलझा रहेगा?
अगले 24 से 48 घंटे वैश्विक राजनीति के लिए अत्यंत निर्णायक होंगे। कीव के आसमान से धुआं भले ही छंट जाए, लेकिन अंकारा समिट के बंद दरवाजों के पीछे लिए गए फैसले इस दशक के सबसे बड़े युद्ध की दिशा और दशा तय करेंगे। पूरी दुनिया अब यह देख रही है कि मिसाइलों की इस भाषा का जवाब कूटनीति के मंच से कैसे दिया जाता है।

