क्या किम जोंग उन के गुप्त गलियारों में बैठकर भारत अब उस परमाणु नेटवर्क को डिकोड करने की तैयारी में है, जिसे दुनिया की सबसे ताकतवर खुफिया एजेंसियां भी नहीं समझ पाईं? क्या उत्तर कोरिया के उस अभेद्य किले में भारत ने अपना सबसे बड़ा ‘इंटेलिजेंस लिसनिंग पोस्ट’ स्थापित कर लिया है? सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस तानाशाह को अमेरिका सुरक्षा के लिए खतरा और चीन अपना मोहरा मानता है, उसी के गढ़ में भारत के एक साइलेंट नेगोशिएटर की एंट्री का असली मकसद क्या है? क्या भारत की नजर अब उत्तर कोरिया के उन अरबों डॉलर के ‘रेयर अर्थ मिनरल्स’ पर है, जिन पर अब तक चीन की मोनोपोली रही है?
दुनिया के सबसे रहस्यमयी देश में एक ऐसा गुप्त ऑपरेशन शुरू हो चुका है, जिसका नियंत्रण सीधे दिल्ली के साउथ ब्लॉक से हो रहा है। यह कोई साधारण कूटनीतिक फेरबदल नहीं है, बल्कि एक ऐसा मास्टरस्ट्रोक है जिसने बीजिंग से लेकर इस्लामाबाद तक हड़कंप मचा दिया है। आज हम उस भू-राजनीतिक बिसात को समझेंगे जिसे मुख्यधारा की मीडिया अक्सर नजरअंदाज कर देती है।
हम बात कर रहे हैं उत्तर कोरिया (DPRK) की, एक ऐसा देश जो दुनिया से पूरी तरह अलग-थलग है। वहां न स्वतंत्र मीडिया है और न ही आम इंटरनेट। ऐसे चुनौतीपूर्ण माहौल में भारत के विदेश मंत्रालय ने संजीव जैन को अपना नया राजदूत नियुक्त किया है। हालांकि यह एक प्रशासनिक फैसला लगता है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में जो दिखाई देता है, असलियत अक्सर उससे कहीं अधिक गहरी होती है।
कोविड-19 के दौरान उत्तर कोरिया ने अपनी सीमाओं को पूरी तरह सील कर दिया था, जिससे भारतीय दूतावास का कामकाज भी प्रभावित हुआ था। लेकिन जैसे ही किम जोंग उन ने देश के दरवाजे फिर से खोलने शुरू किए, भारत ने बिना देरी किए अपने सबसे अनुभवी राजनयिक को प्योंगयांग भेज दिया। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बदलते समीकरणों के बीच यह टाइमिंग बेहद महत्वपूर्ण है।
भारत और दक्षिण कोरिया के बीच 1973 से मजबूत संबंध हैं और 2015 में इसे ‘स्पेशल स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप’ का दर्जा दिया गया। लेकिन भारत की असली कूटनीतिक कुशलता इसमें है कि वह एक तरफ दक्षिण कोरिया के साथ अरबों का व्यापार कर रहा है और दूसरी तरफ उत्तर कोरिया में भी अपनी प्रभावी मौजूदगी दर्ज करा रहा है। इसे ‘स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी’ कहते हैं, जहां भारत अब केवल प्रतिक्रिया नहीं देता, बल्कि वैश्विक समीकरणों को आकार देता है।
उत्तर कोरिया में भारत की दिलचस्पी का सबसे बड़ा कारण पाकिस्तान और उत्तर कोरिया के बीच का वो पुराना ‘प्रॉक्सी नेटवर्क’ है। 1990 के दशक में ए. क्यू. खान ने परमाणु तकनीक के बदले प्योंगयांग से ‘नोडोंग’ बैलिस्टिक मिसाइलें ली थीं, जिन्हें पाकिस्तान ने ‘गौरी’ मिसाइल का नाम दिया। सुरक्षा विशेषज्ञों को आज भी डर है कि इनके बीच तकनीक का यह गुप्त आदान-प्रदान पूरी तरह रुका नहीं है, इसलिए वहां निगरानी रखना भारत के लिए अनिवार्य है।
प्योंगयांग में भारत का दूतावास एक ‘लिसनिंग पोस्ट’ की तरह काम करेगा। एक ऐसे बंद समाज में जहां बाहरी एजेंसियां प्रवेश नहीं कर सकतीं, वहां भारतीय दूतावास दिल्ली को रियल-टाइम इंटेलिजेंस दे सकता है। भारत वहां किसी को खुश करने नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने और पाकिस्तान की साजिशों पर नजर रखने गया है। यह ‘नए भारत’ की नीति है, जो दुश्मन की साजिशों का जवाब उनके बैकयार्ड में ही तैयार करता है।
अब बात करते हैं चीन की। पूरी दुनिया को लगता है कि उत्तर कोरिया पूरी तरह बीजिंग के नियंत्रण में है, लेकिन हकीकत में प्योंगयांग अपनी आर्थिक निर्भरता से चिढ़ता है। किम जोंग उन को पता है कि चीन उनका इस्तेमाल केवल अमेरिका के खिलाफ एक मोहरे के रूप में करता है। इसलिए, वे हमेशा एक ऐसे न्यूट्रल विकल्प की तलाश में रहे हैं जो उन्हें चीन की शर्तों पर झुकने से बचा सके।
यहीं भारत की भूमिका अहम हो जाती है। भारत दुनिया के उन गिने-चुने देशों में से है जिसके संबंध अमेरिका और रूस से लेकर उत्तर व दक्षिण कोरिया तक संतुलित हैं। प्योंगयांग में सक्रिय मौजूदगी के जरिए भारत ने बीजिंग को साफ संदेश दिया है कि यदि वह भारत के पड़ोसी देशों (मालदीव, श्रीलंका, पाकिस्तान) में हस्तक्षेप करेगा, तो भारत भी चीन के सबसे करीबी पड़ोसी के घर में अपनी पकड़ मजबूत कर सकता है।
इस मिशन के लिए संजीव जैन का चयन बहुत सोच-समझकर किया गया है। वे आसियान डेस्क का नेतृत्व कर चुके हैं और दुबई, पेरिस, बर्लिन और टोक्यो जैसे प्रमुख केंद्रों में सेवाएं दे चुके हैं। एक ऐसे देश के लिए जहां हर कदम का वैश्विक प्रभाव होता है, भारत को एक ‘साइलेंट नेगोशिएटर’ की जरूरत थी। संजीव जैन बिना शोर मचाए जटिल स्थितियों को भारत के पक्ष में मोड़ने में माहिर माने जाते हैं।
हालांकि, संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों के कारण भारत वहां कोई बड़ा रक्षा समझौता नहीं कर सकता, लेकिन भारत ‘स्ट्रैटेजिक रियलिज्म’ पर काम कर रहा है। असली खेल लंबी अवधि के पावर बैलेंस और भविष्य के संसाधनों का है।
इसमें पहला कदम है ‘मेडिकल और फूड डिप्लोमेसी’। जब पूरी दुनिया उत्तर कोरिया का बहिष्कार करती है, तब भारत मानवीय आधार पर दवाइयां और अनाज भेजकर वहां के सिस्टम में एक ‘सॉफ्ट कॉर्नर’ तैयार करता है। यही सॉफ्ट पावर भविष्य में कठिन कूटनीति के लिए दरवाजे खोलती है।
दूसरा सबसे बड़ा कारक है ‘रेयर अर्थ मिनरल्स’। वर्तमान में इन पर चीन का एकाधिकार है, जो भविष्य की तकनीक (स्मार्टफोन, ईवी, डिफेंस) के लिए बेहद जरूरी हैं। उत्तर कोरिया के पास इनका विशाल भंडार है। जैसे ही वैश्विक प्रतिबंध हटेंगे या स्थितियां बदलेंगी, भारत की वहां पहले से मौजूद मौजूदगी उसे चीन के एकाधिकार को चुनौती देने का मौका देगी।
इसके अलावा, भारत एक भरोसेमंद ‘बैकचैनल’ के रूप में भी उभरा है। जब पश्चिमी देश उत्तर कोरिया से सीधे बात नहीं कर पाते, तो वे भारत जैसे न्यूट्रल देश का सहारा लेते हैं। यह भारत के कूटनीतिक कद को उस स्तर पर ले जाता है जहां दुनिया समाधान के लिए दिल्ली की ओर देखती है।
भारत की नीति उत्तर कोरिया को ‘बेस्ट फ्रेंड’ बनाने की नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय शतरंज पर अपने मोहरे को सही जगह बिठाने की है। प्योंगयांग में नया दूतावास भारत का वह रडार है जो चीन की चालों और पाकिस्तान की परमाणु साजिशों की हर खबर तुरंत नई दिल्ली पहुंचाएगा।
यह केवल एक नियुक्ति नहीं, बल्कि भारत के नए रणनीतिक आत्मविश्वास का प्रतीक है। अब फैसले दिल्ली के साउथ ब्लॉक में होते हैं और उनका प्रभाव वैश्विक मानचित्र पर दिखाई देता है। भारत ने कूटनीति की इस बिसात पर अपना वजीर चल दिया है, और अब ड्रैगन और पाकिस्तान को अपनी चालें बचानी होंगी।

